जो न रुके न थके वो हैं मोदी
   दिनांक 13-मई-2019
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और जामनगर से लेकर सिलचर तक मोदी ने देश का हर कोना नाप दिया. कार्यक्रमों को इस तरह से तैयार किया गया कि संवाद में विविधता बनी रहे और ये हर तबके तक पहुंचे. छात्रों से लेकर वैज्ञानिकों तक, किसानों से लेकर उद्यमियों तक. रैलियों से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं तक सभी जगह मोदी पहुंचे.
लोकसभा चुनाव 2019 के छह चरण पूरे हो चुके हैं. मतलब ये कि कुल जिन कुल 542 सीटों पर चुनाव हो रहा है, उनमें से 483 सीटों पर जनता अपना फैसला दे चुकी है. अंतिम चरण का मतदान 19 मई को है. इस दौर में 59 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. 2019 का लोकसभा चुनाव इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर केंद्रित चुनाव के रूप में दर्ज होने जा रहा है. 11 अप्रैल को शुरू हुआ मतदान का सिलसिला 19 मई को पूरा होगा. आखिर कैसे नरेंद्र मोदी ने चुनाव को अपने इर्द-गिर्द समेट लिया. कैसे वह अखिल भारतीय अपील वाले नेता के रूप में उभरे.
68 साल उम्र. कभी नवरात्र के व्रत तो कभी चिलचिलाती गर्मी. लेकिन असीम ऊर्जा से भरा वो शख्स देश की राजनीति में नई इबारत लिखता जा रहा है. आज पूरा विपक्ष एकजुट होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने बौना नजर आ रहा है, तो उसका वाजिब कारण है. कारण है, देश के हर कोने, हर शख्स तक पहुंचने की जुनून भरी जिद. और हां, चुनाव के बीच सरकार भी चल रही है, फनी जैसे चक्रवात से बचने के अभूतपूर्व इंतजाम हो रहे हैं. नुकसान के सर्वे और भरपाई चल रही है. साथ ही एक सधी हुई रणनीति. अब चुनाव का अंतिम चरण बचा है. 25 दिसंबर से शुरू हुई मोदी की चुनाव यात्रा बिना रुके, बिना थमे जारी है. अंतिम चरण की रणनीति भी बिल्कुल साफ है. भाजपा के लिए रणनीति का मतलब ही मोदी है. पांच महीने लंबे अपने चुनावी सफर में कैसे चुनाव को मोदी ने खुद पर केंद्रित कर लिया, ये देखना होगा.
 
25 दिसंबर से आ गए थे चुनावी मुद्रा में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेबसाइट पर यदि गौर करेंगे, तो पाएंगे कि मोदी ने बाकायदा चुनाव अभियान 25 दिसंबर को शुरू कर दिया था. एक मई को 125 दिन पूरे कर लेने के लक्ष्य के साथ ये अभियान शुरू हुआ था. असल में तब चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं हुआ था. कार्यक्रम इस हिसाब से तैयार किया गया कि एक मई को प्रचार की अंतिम तारीख माना गया. इसके बाद जो दिन मिले, वो बोनस. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन 125 दिन में मोदी ने 27 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में 200 सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. अकेले दिल्ली में 30 कार्यक्रम एक मई तक हो चुके थे. इस समयावधि में 14 कैबिनेट मीटिंग भी हुईं. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और जामनगर से लेकर सिलचर तक मोदी ने देश का हर कोना नाप दिया. कार्यक्रमों को इस तरह से तैयार किया गया कि संवाद में विविधता बनी रहे और ये हर तबके तक पहुंचे. छात्रों से लेकर वैज्ञानिकों तक, किसानों से लेकर उद्यमियों तक. रैलियों से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं तक सभी जगह मोदी पहुंचे.
चुनाव की घोषणा होने तक कर डाले थे 100 से ज्यादा कार्यक्रम
चुनाव की घोषणा होने तक मोदी सौ से ज्यादा सार्वजनिक कार्यक्रम कर चुके थे. जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव की घोषणा के बाद सक्रिय हुए. अंतिम दो चरण के चुनाव में तो हर जगह से मोदी की मांग है. भाजपा के दो प्रमुख कैंपेनर मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अंतिम दो चरण में 17 अतिरिक्त रैलियां करने वाले हैं. मोदी की पहले से निर्धारित रैलियों के अलावा छह और चुनावी सभाओं का कार्यक्रम तय किया गया है. फोकस पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा पर है. किसी भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी के मुकाबले मोदी ने ज्यादा चुनावी रैलियां की हैं.
 
रैलियों में भी राहुल को पीछे छोड़ा
11 मार्च को आचार संहिता लागू होने के बाद से मोदी 113 रैलियां कर चुके हैं. जबकि राहुल गांधी ने 103 रैलियों को संबोधित किया है. लेकिन ध्यान रखना होगा कि 11 मार्च से पहले ही मोदी सौ से ज्यादा सार्वजनिक कार्यक्रम कर चुके थे. मोदी का सबसे ज्यादा फोकस उत्तर प्रदेश पर रहा है. यहां वह 21 रैलियां कर चुके हैं. भाजपा की रणनीति में इस बार पश्चिम बंगाल एक अहम निशाना है. उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा 13 रैलियां मोदी ने पश्चिम बंगाल में की हैं. पश्चिम बंगाल को इतनी अहमियत देने से ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भाजपा इस सूबे में किस तरह के चुनावी नतीजों की अपेक्षा कर रही है. भाजपा को इस बार उत्तर प्रदेश में कुछ सीटों के नुकसान की आशंका है, तो वहीं इसकी भरपाई की उम्मीद वह पश्चिम बंगाल से कर रही है. मोदी की रणनीति में तीसरा नंबर ओडिसा का आता है. यहां प्रधानमंत्री ने आठ रैलियां की हैं. भाजपा को यहां भी बड़ी सफलता की उम्मीद है.
हर कोने में किया पहुंचने का प्रयास
जहां एक ओर मोदी भाजपा की सीटों का विस्तार पूर्वोत्तर से लेकर केरल तक करने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं राहुल गांधी का चुनावी अभियान मूल रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और केरल तक सीमित रहा है. राहुल गांधी और मोदी के चुनाव अभियान में एक और बड़ा अंतर है. मोदी की 110 रैलियां, अलग-अलग 110 लोकसभा क्षेत्रों में हुई हैं. जबकि राहुल गांधी ने कई सीटों पर एक से ज्यादा रैलियां की हैं. जैसे अमेठी, वायनाड, बाराबंकी, जयपुर, कोटा, कोझिकोड, कुरुक्षेत्र, रायबरेली और सुल्तानपुर सीट पर राहुल गांधी एक से अधिक रैली कर चुके हैं.
ट्वीटर पर भी मुकाबला एकतरफा
चुनाव का एक और अहम कोण है सोशल मीडिया. चुनावी जंग सिर्फ मैदान में नहीं, सोशल मीडिया पर भी लड़ी जाती है. तीस फीसद मतदाता की सोशल मीडिया पर पहुंच है. यहां भी प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी के बीच कोई मुकाबला नजर नहीं आता. एक पत्रिका द्वारा जारी किए गए अध्ययन के आंकड़ों के मुताबिक ट्वीटर पर मोदी बहुत आगे हैं. 10 मार्च से 21 अप्रैल तक के ट्वीट्स का अध्ययन किया गया. सिर्फ राजनीतिक ट्वीट की बात की जाए, तो इस समयावधि में मोदी ने 489 ट्वीट किए हैं, जबकि राहुल गांधी 72 ट्वीट किए हैं. मोदी औसतन प्रतिदिन 11 ट्वीट कर रहे हैं, वहीं राहुल बामुश्किल दो ट्वीट भी नहीं कर रहे हैं. ट्वीटर पर बात रखने की एक शब्दसीमा है. ऐसे में वीडियो एक अहम जरिया है. मोदी के कुल 489 ट्वीट्स में से 176 वीडियो से लैस हैं. ये कुल ट्वीट का 36 फीसद है. जबकि राहुल गांधी के सिर्फ 11 ट्वीट के साथ वीडियो है. साथ ही मोदी ने नौ भाषाओं में ट्वीट किया है, तो वहीं राहुल गांधी ने छह भाषाओं में. राहुल गांधी की ट्वीटर टाइमलाइन सिर्फ उनके विषय में है. जबकि मोदी की ट्वीटर टाइमलाइन हर तबके को छूती नजर आती है. कभी वह अपने साथी मंत्रियों को रिट्वीट करते हैं, तो कभी वह मशहूर लोगों से लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने की अपील करते हैं. ट्वीटर पर हैशटैग मैं भी चौकीदार टॉप ट्रेंडिंग में रहा. इसे पूरी भाजपा और कार्यकर्ताओं ने आक्रामक ढंग से अभियान के तौर पर लिया. जबकि राहुल गांधी के हैशटैग चौकीदार चोर है अभियान में वह भागीदारी नजर नहीं आई.