1984 दंगा नहीं नरसंहार था !
   दिनांक 14-मई-2019

 
वर्ष 1984 में हुआ सिख नरसंहार एक ऐसा जख्म है. जब वह भरने पर आता है तो कांग्रेस उस जख्म को कुरेद कर उसे फिर से हरा कर देती है. उस नरसंहार में इस देश के सिखों को जो जख्म दिए गए वह भूलाए नहीं जा सकते. जब 1984 में सिखों के घर जलाए जा रहे थे. उनके घर के सामानों को लूटा जा रहा था. तब उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि "जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है.” अब इस मामले पर बहस दोहराए जाने की वजह यह है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह ने फेसबुक पर पोस्ट लिखा कि “वर्ष 84 में जो कुछ भी हुआ वह दंगा नहीं नरसंहार था.”
फेसबुक पर पोस्ट लिख कर उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह ने एक नई बहस छेड़ दी है. सुलखान सिंह ने लिखा कि “इंदिरा गांधी की हत्या के दिन 31 अक्टूबर 1984 को मैं पंजाब मेल ट्रेन से लखनऊ से वाराणसी जा रहा था. ट्रेन अमेठी स्टेशन पर खड़ी थी, उसी समय एक व्यक्ति जो वहीं से ट्रेन में चढ़ा था, उसने बताया कि इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई. वाराणसी तक कहीं कोई बात नहीं हुई . वाराणसी में अगले दिन सुबह तक कुछ नहीं हुआ. उसके बाद योजनाबद्ध तरीके से घटनाएं की गईं.
 
अपने पुलिस महकमे के अनुभव के आधार पर सुलखान सिंह ने लिखा कि “अगर जनता के गुस्से का ‘आउट बर्स्ट’ होता तो दंगा फौरन शुरू हो जाता. बाकायदा योजना बनाकर नरसंहार शुरू किया गया. तत्कालीन कांग्रेसी नेता भगत, टाइटलर, माकन, सज्जन कुमार मुख्य ऑपरेटर थे. राजीव गांधी के खास विश्वासपात्र कमलनाथ मॉनिटरिंग कर रहे थे. नरसंहार पर राजीव गांधी का बयान और उन सभी कांग्रेसियों को संरक्षण के साथ-साथ अच्छे पदों पर तैनात करना उनकी संलिप्तता के जनस्वीकार्य सबूत हैं. राजीव गांधी की मृत्यु के बाद भी कांग्रेस सरकारों द्वारा इन व्यक्तियों को संरक्षण तथा पुरस्कृत करवाना, इन सबकी सहमति दर्शाता है.
नोट - फेसबुक की पोस्ट वायरल होने पर सुलखान सिंह ने इस पोस्ट को डिलीट कर दिया है. इसका लिंक उपलब्ध नहीं है.