ध्रुव त्यागी की जिहादी हत्या पर क्यों खामोश है सेकुलर मीडिया
   दिनांक 15-मई-2019
यही है जिहादी सोच. वो लड़कियां छेड़ेंगे, यदि जुबान खोलोगे तो कत्ल कर दिए जाओगे. मुजफ्फरनगर के कवाल कांड के पीछे भी क्या यही सोच नहीं थी. लेकिन मरने वाला हिंदू है और मारने वाला मुसलमान. सेकुलरिज्म का चश्मा लगाए चैनलों पर बहस करने वाले पत्रकार ऐसी घटनाओं पर खामोश हो जाते हैं। कथित बुद्धिजीवी दलीलें देते हैं कि मामले को हिंदू—मुस्लिम के नजरिए से न देखा जाए.
मृतक ध्रुव त्यागी (बाएं) बेटा अनमोल ( दाएं ) 
रात के तीन बजे. बीमार बेटी को डॉक्टर के यहां से दिखाकर लौटे दिल्ली के बसई दारापुर स्थित लौटे थे ध्रुव त्यागी. मोहल्ले के ही एक आपराधिक मुस्लिम परिवार के युवकों ने बाप के साथ जाती बेटी को छेड़ने की हिमाकत की. एतराज किया, तो पूरा परिवार उन पर टूट पड़ा. 11 लोगों ने घेरकर ध्रुव त्यागी और उनके बेटे को चाकुओं से गोद दिया. चार महिलाएं भी इसमें शामिल थीं. ध्रुव का पेट चीर डालने के लिए बड़ा चाकू एक महिला ने ही घर से लाकर दिया था. रमजान के महीने में सरे राह पूरा परिवार इस हत्या को अंजाम देने में जुटा था.
यही है जिहादी सोच. वो लड़कियां छेड़ेंगे, यदि जुबान खोलोगे तो कत्ल कर दिए जाओगे. मुजफ्फरनगर के कवाल कांड के पीछे भी क्या यही सोच नहीं थी. लेकिन मरने वाला वाला हिंदू है और मारने वाले मुसलमान. तो आप समझ सकते हैं कि खान मार्केट गैंग खामोश हो गया है. स्क्रीन काली कर डालने वालों, हर चीज में लिंचिंग ढूंढने वाले मीडिया के एक खास वर्ग के लिए यह खबर नहीं है.सेकुलरिज्म का चश्मा लगाए चैनलों पर बहस करने वाले पत्रकार ऐसी घटनाओं पर खामोश हो जाते हैं। कथित बुद्धिजीवी दलीलें देते हैं कि मामले को हिंदू—मुस्लिम के नजरिए से न देखा जाए. सलेक्टिव जर्नलिज्म(मजहब, जात, सुविधा देखकर होने वाली पत्रकारिता) और सलेक्टिव क्रिटिसिज्म (सुविधा के हिसाब से मुद्दों को आलोचना के लिए चुनना) वाला एक तबका लंबे समय से देश के मीडिया पर काबिज है. ये वही लोग हैं, जिनकी चर्चा आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खान मार्केट गैंग के रूप में करते हैं. बहुत ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है. अपराध में जहां मुसलमान शामिल हों, उसके लिए इनकी परिभाषा बहुत सरल है. अपराध का और अपराधियों का कोई मजहब नहीं होता. जैसे पूरी दुनिया में फैले इस्लामिक आतंकवाद का इनकी निगाह में कोई मजहब नहीं है. लेकिन ये किस हिसाब से कथ्य निर्धारित करते हैं, जरा गौर कीजिए. 21 मार्च 2019 को गुरुग्राम में एक घटना हुई. क्रिकेट खेलने को लेकर विवाद हुआ, जिसने दो पक्षों के बीच मारपीट का रूप ले लिया. इस मामले का वीडियो सामने आने पर बार—बार इस घटना को प्राइम टाइम में चैनलों पर दिखा गया गया। दो पक्षों में हुए इस झगड़े पर इस तरह का नैरेटिव सेट किया गया मानो मुसलमानों पर बड़ा जुल्म हुआ हो। अखबारों में पहले पेज पर इस खबरें की गईं. कई दिनों तक मामला लगातार सुर्खियों में रहा.
फरवरी 2018 में दिल्ली में एक मुस्लिम परिवार द्वारा अंकित सक्सेना की सरेराह हत्या कर दी गई थी. मुसलमान लड़की से दोस्ती के चलते दिल्ली में सरेराह हुई अंकित की हत्या को लेकर मीडिया ने जिस तरह रिपोर्टिंग की थी उस देखकर मीडिया का पक्षपात पूर्ण रवैया स्पष्ट नजर आता है। क्योंकि यहां मरने वाला हिंदू युवक था और मारने वाले मुसलमान इसलिए यह खबर सेकुलर मीडिया के एजेंडे में फिट नहीं बैठी. न इस पर चैनलों में पैनल बिठाए गए न ही संपादकीय लिखे गए. वहीं 22 जून 2017 को ट्रेन में सीट के विवाद के चलते जुनैद की हत्या को तुरंत असहिष्णुता करार दे दिया था. मीडिया ने मामले को भीड़ द्वारा नफरत के चलते मुसलमान युवक की हत्या की गई यह धारणा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐसा ही अखलाक और पहलू खान की हत्या के मामले में मीडिया ने किया और मामले को पूरी तरह हिंदू और मुस्लिम बना दिया था।