विचारधारा और समर्पण
   दिनांक 15-मई-2019
माहौल चुनावी है। सो, जिन्हें कभी श्रीराम काल्पनिक लगते थे, अब उन्हें भी राम से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक, तमाम नैतिक-सांस्कृतिक संदर्भ याद आ रहे हैं।
 
भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की सजा काट रहे लालू के सुपुत्र तेजप्रताप ने कुनबे की रार के बाद अपने छोटे भाई तेजस्वी को दिनकर की पंक्तियां और कृष्ण-अर्जुन की उपमाएं याद दिलाईं। इसके बाद प्रियंका वाड्रा के मस्तिष्क में भी 'जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है'- पंक्तियां कौंधी और उन्हें देश के प्रधानमंत्री में 'दुर्योधन' दिखने लगा!
इसकी प्रतिक्रियास्वरूप राजनीति के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया के मंच तक गहरे आक्रोश की लहर फैल गई। स्वाभाविक है, जब मक्खन-मलाई पर पले और साधन-संपन्न होने पर भी अपने बूते जीवन में कुछ न कर पाने वाले लोग दृढ़जीवी, परिश्रमी और पारदर्शी जीवन के प्रतीक राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति अपना ओछापन दर्शाते हैं तो उनका हल्कापन पूरे समाज पर जाहिर हो जाता है।
लालू परिवार के भ्रष्टाचार और व्यथा-कथा को तो सब जानते ही हैं, प्रियंका-राहुल के तेजाबी बयानों को भी केवल चुनावी आहट नहीं बल्कि संभावित नतीजों को लेकर उपजी छटपटाहट के तौर पर देखा जाना चाहिए। चुनाव के पांच चरण बीत जाने के बाद नतीजों से पहले ही महागठबंधन के वजन और समीकरणों को खंगालता कांग्रेसी उद्वेग बताता है कि जनमत के और छीजने की बात अंदरखाने साफ हो चुकी है। बहरहाल, गांधी-वाड्रा कुनबे को दिनकर को याद करने की बजाय उन दिनों को याद करना चाहिए जो देश के लिए बुरे और उनके लिए बहुत अच्छे थे। देश की शान कहे जाने वाले युद्धपोत आइएनएस विराट को 'टैक्सी' की तरह बरतने वाले दिन, भोपाल गैस त्रासदी में हजारों घरों को झुलसाने और उनमें मातम फैलाने के दोषी एंडरसन को चिडि़या की तरह फुर्र कर देने वाल चेहरेे, बोफर्स दलाली मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने से परहेज करने वाले और 10 जनपथ से जुड़े, इटैलियन दलाल क्वात्रोक्की का जब्त खाता खोलने में मददगार हाथों को इस देश के लोगों को क्यों भूल जाना चाहिए?
खैर! चुनावी लड़ाई और दलीय जनसमर्थन अपनी जगह, किन्तु भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे दलों और लोगों को ऊंची साहित्यिक-सांस्कृतिक उपमाएं देने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि उपमाओं की चमक में खुद उनके दागी व्यक्तित्व के सार्वजनिक होने का खतरा ज्यादा रहता है। बात भाजपा या कांग्रेस से ज्यादा इस बात की है कि इस देश के मानस ने, वैश्विक प्रतिमानों और आंकड़ों की कसौटियों पर किसके शासन में कैसा अनुभव किया! मीडिया न्यूजरूम में शासकीय भ्रष्टाचार में कमी का ही उदाहरण लें तो कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार की सफाई और प्रशासनिक गति-संवेदनशीलता की दृष्टि से पिछले पांच वर्ष बेमिसाल रहे हैं।
बहरहाल, कांग्रेस या किसी और दल को भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना है तो अतीत की अकर्मण्यता के इतिहास तथा बजबजाती कलंक-कथाओं के साथ यह मुकाबला मुश्किल है। तकनीक, तर्क और तुलना के इस जागरूक दौर में बैठे-ठाले मौज कराने के वादों और राजनीति के झुनझुनों से भी अब बात बनती नहीं लगती। भाजपा से आगे निकलना है तो उससे बेहतर करने तथा उससे भी ज्यादा पारदर्शी व्यवहार रखने की बात अब राजनैतिक दलों को कहनी ही होगी। उसके बाद भी सवाल यह आएगा कि इन बातों और चेहरों पर जनता कितना भरोसा करती है! आज यह बात भाजपा के विरोधी भी मानते हैं कि इसने भारत की राजनीति में प्रदर्शन आधारित एक संघर्ष, एक अंतर और लोकतंत्र के प्रति उत्साह पैदा किया है। यह कहने में संकोच नहीं है कि विचारधारा पर चलने और महलों की बजाय समर्थकों के कांधे-कुटियाओं में पलने वाले दल और नेता ही यह अंतर पैदा कर सकते हैं।
उपेक्षाओं-उलाहनों और विपरीत परिस्थितियों के बियाबान में विचारधारा और समर्पण के ध्रुवतारे पर अटल दृष्टि जमाकर भाजपा ने एक लंबी दूरी तय की है, भारतीय राजनीति में परिवारवाद और स्वार्थ के सामने नया ध्रुव तैयार किया है, तब जाकर जनमानस को स्वीकार्य, सच्ची लोकतांत्रिक राजनीति का भाग्य जगा है।
 
राष्ट्रकवि 'दिनकर' की इसी कविता की कुछ और पंक्तियां स्मरित हो उठती हैं-
वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आए कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है!