ममता राज में खतरे में है लोकतंत्र
   दिनांक 16-मई-2019
-अनिमित्रा चक्रबर्ती                                 
गाली-गलौज। यह शब्द बहुतों को अजीब लग सकता है लेकिन यदि इसका भाषिक मूल्य जान लिया जाए तो यह पूरे संदर्भ को समझने में मददगार हो सकता है। यह शब्द-युग्म विशेष रूप से क्या दर्शाता है? संक्षेप में, इसका अर्थ है किसी पर आक्षेप करने, उस पर रोक लगाने या उसके विरुद्ध मन में गहरे बैठी दुर्भावना को व्यक्त करने के लिए अपमानजनक या विषाक्त भाषा का प्रयोग करना। पूरा बंगाल राज्य इस समय इसी मनोदशा की गिरफ्त में है और आग की लपटें उठने का इंतजार कर रहा है। खैर, इस राज्य की हिंसापूर्ण विरासत का कभी कोई अंत नहीं हुआ है।
20 जून, 1947 को अपनी स्थापना के बाद से यह क्रम निर्बाध रूप से चल रहा है और अब हर बीतते दिन के साथ यह पीड़ा बढ़ती जा रही है। जिस समय डायमंड हार्बर निर्वाचन क्षेत्र के गांवों के हिंदू तृणमूल कांग्रेस-समर्थित मुस्लिम पड़ोसियों के घातक हमले सह रहे हैं, न केवल कोलकाता बल्कि राज्य के कोने-कोने में लोग पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने से क्षुब्ध हैं। गलियों में ही नहीं, बल्कि घरों में भी लोग बेहद क्रुद्ध हैं और घटना के दोषियों का पता लगाना चाहते हैं। बंगाल समेत सम्पूर्ण भारत में 19वीं शताब्दी के नव-जागरण काल की महान विभूति रहे बंगाल के इस महान पुत्र का अपमान ज्यादा नहीं तो सभी बंगालियों का घोर अपमान करने के समान है।
क्या पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता है? सच कहें तो ऐसी विद्वता हजारों सालों में बिरले ही सामने आती है। जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी सफलता के चरम पर था और तत्कालीन भारत को ब्रिटिश ताज के सबसे चमकीले रत्न के रूप में देखते हुए दुनिया भर में अपने पांव पसार रहा था, तब इस छोटे कद वाले हिंदू ने बड़ी-से-बड़ी बाधाओं के खिलाफ खड़े होने का साहस किया था। अपनी प्राचीन विरासत और वेशभूषा पर बेहद गर्व करने वाले इस व्यक्ति को कभी भी अपनी धोती-चादर की पोशाक में वायसराय के महल में प्रवेश करने में कोई परेशानी नहीं हुई थी। मानवीयता की दुर्लभ भावना से ओतप्रोत उनकी विद्वता का सभी सम्मान करते थे। यहां तक कि उनके सबसे बड़े शत्रु भी उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। बंगाल पुनर्जागरण काल के बेहतरीन योगदानों में से एक माने जाने वाले ईश्वर चंद्र विद्यासागर अपने पीछे एक अपरिभाषेय और विशाल विरासत छोड़ गए थे जिसके प्रति बाद की पीढ़ियां श्रद्धा भाव रखते हुए उनका संरक्षण कर सकती थीं। अफसोस की बात यह है कि उसी संत की प्रतिमा चुनावी हिंसा की भेंट चढ़ गई।
निश्चित रूप से राजनीतिक विकास के क्रम में भारतीय जनता पार्टी लगातार कभी सर्वशक्तिमान रहे वामपंथियों को प्रतिस्थापित करती हुई बंगाल के राजनीतिक केंद्र में पहुंच रही है। यह कोई नया विकास भी नहीं है क्योंकि हिंदुत्व अंतर्धारा के रूप में राज्य में मौजूद रहा है। हिंदुत्व के विचार में सबसे प्राचीन विचारधारा बंगाली विचारकों की रही है और सबसे बड़ी बात कि यह डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का गढ़ रहा है। फिर भी, डॉ. मुखर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने सात दशकों से इस विचार को यहां पनपने नहीं दिया था। वामपंथी शक्तियों के निरंतर समापन और हिजाब-पहनने वाली दीदी के शासनकाल में हिंदुओं के अलग-थलग पड़ जाने के बाद भाजपा अब राज्य की राजनीति के केंद्र में है जिससे राज्य के कुछ हिस्सों में गहरी अनिश्चितता पैदा हो गई है।
दो दिन पहले क्या हुआ था? भारतीय जनता पार्टी के अखिल भारतीय अध्यक्ष अमित शाह का रोड शो पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के अलावा हजारों उत्साही लोगों का ध्यान आकृष्ट कर चुका था। उनका जुलूस बड़ी धूमधाम के साथ जोर-शोर से आगे बढ़ता हुआ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलकत्ता विश्वविद्यालय और विद्यासागर कॉलेज तक पहुंच गया। इसके बाद अचानक जुलूस पर अज्ञात स्थानों से पत्थर बरसाए जाने लगे। विद्यासागर कॉलेज के भीतर से पत्थर फेंके जा रहे थे, जो जुलूस में शामिल लोगों को लग रहे थे। 
पहले सभी को लगा कि छात्र ऐसा कर रहे हैं लेकिन बाद में पता चला कि महाविद्यालय में छात्रों के रहने का वह समय ही नहीं है। दरअसल अंदर से जो पत्थर फेंके जा रहे थे वह पत्थर फेंकने वाले तृणमूल के कार्यकर्ता थे। अतीत के कई मौकों के उलट बंगाल की मुख्यमंत्री ने इस बार बिना कोई देरी किए बेहिचक भारतीय जनता पार्टी को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां सोचने वाली बात है कि ममता बनर्जी पुलवामा हमले और बालाकोट में भारत के जवाबी हमले को बिना सबूत मानने को तैयार नहीं हुई हों वह बिना किसी साक्ष्य के तुरंत भाजपा पर कैसे आरोप लगा सकती हैं ? पूरे घटनाक्रम के प्रमुख साक्ष्य के रूप में जिस सीसीटीवी फुटेज की तलाश है वह अभी तक नहीं मिला है। तो क्या यह घटनाक्रम पहले से ही निर्धारित था? क्या तृणमूल कांग्रेस ने स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर भाजपा को बदनाम करने का षड्यंत्र रच रखा था? यह उस घटनाक्रम पर बनाई कोई धारणा नहीं बल्कि चश्मदीदों से मिली जानकारी के आधार पर लगाई गई अटकलें हैं।
जब यह सब कहा और किया जाता है, तो घटनाक्रम संकेत करता है कि तृणमूल कांग्रेस, और मुख्यतः इसकी सुप्रीमो ममता बनर्जी, राज्य पर किसी भी हाल में अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए बेताब हैं। बड़े-बड़े दावों के बावजूद पार्टी मुस्लिम सांप्रदायिकता की ओर लगातार बढ़ते झुकाव से पैदा हो रही टूटनों से निपटने में फंसी है। पता चला है कि इन दिनों तृणमूल कांग्रेस को हिंदुओं का विरोध करने वाली जमात या इस्लामवादियों की पार्टी जैसा समझा जा रहा है।
इस मोड़ पर क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? सच यह है कि बहुत आसानी से कोई भरोसेमंद निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता सिवाए इसके कि अपनी सर्वशक्तिमान नेता के इशारे पर तृणमूल कांग्रेस एक खतरनाक खेल में लगी है और वह सत्ता पर काबिज रहने के प्रयास में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। ऐसे में बंगाल का भविष्य और लोकतंत्र खतरे में है।