भाजपा तो पहले ही मार चुकी डिजिटल मोर्चे पर बाजी
   दिनांक 18-मई-2019
चुनावी शोरगुल आपको अब गली-मोहल्लों में नहीं मिलेगा. चुनावी हल्ला डिजिटल दुनिया में जो मचा है. 56 करोड़ लोग भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. ये फेसबुक देख रहे हैं, ट्वीट कर रहे हैं, वाट्सएप चला रहे हैं, यू ट्यूब पर हैं. एक साथ इतनी बड़ी तादाद में लोगों तक सीधे पहुंच. तो कौन राजनीतिक पार्टी इसका फायदा नहीं उठाना चाहेगी.
भारतीय जनता युवा मोर्चा की कार्यकर्ता प्रियंका शर्मा को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के रास्ते रिहाई मिल गई. हर आवाज को कुचल देने पर आमादा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक मीम पोस्ट करने की सजा के तौर पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. ममता वैसे तो अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज से डरती हैं, लेकिन फेसबुक पर अपने मीम से वह बौखला गईं. यही है सोशल मीडिया की ताकत. चुनावी शोरगुल आपको अब गली-मोहल्लों में नहीं मिलेगा. चुनावी हल्ला डिजिटल दुनिया में जो मचा है. 56 करोड़ लोग भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. ये फेसबुक देख रहे हैं, ट्वीट कर रहे हैं, वाट्सएप चला रहे हैं, यू ट्यूब पर हैं. एक साथ इतनी बड़ी तादाद में लोगों तक सीधे पहुंच. तो कौन राजनीतिक पार्टी इसका फायदा नहीं उठाना चाहेगी. हर पार्टी के पास आईटी सेल है, आईटी योद्धा हैं. 2019 के चुनाव में डिजिटल प्लेटफार्म पर भी भारतीय जनता पार्टी बाजी मारती नजर आती है. भाजपा सोशल मीडिया पर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है.
डिजिटल दुनिया लिखेगी चुनाव का नतीजा
ये चुनाव इतिहास में सबसे बड़ी डिजिटल पहुंच वाला चुनाव बन गया है. पहले इंटरनेट जहां सीमित था, वहीं आज भारत में 45 करोड़ लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं. 2014 के चुनाव के समय जहां साढ़े पंद्रह करोड़ लोगों के पास स्मार्टफोन थे, वहीं आज ये आंकड़ा तीन गुना हो गया है. इंटनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक स्मार्टफोन की बदौलत ही इंटरनेट 56.6 करोड़ लोगों तक पहुंच चुका है. इस समय तीस करोड़ लोग देश में फेसबुक इस्तेमाल करते हैं. जबकि बीस करोड़ लोग वाट्स एप का इस्तेमाल कर रहे हैं. सोशल मीडिया की ताकत का नतीजा ये है कि दिल्ली में बैठे कुछ मीडिया हाउस पहले की तरह एजेंडा तय नहीं कर सकते. हर चीज सोशल मीडिया पर है. एक बार सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कोई तथ्य, फोटो या मुद्दा आ जाने के बाद ये कैसे तूल पकड़ता है, ये हाल ही में हुए ध्रुव त्यागी हत्याकांड़ से समझा जा सकता है. दिल्ली में बैठे मीडिया ने इस पहलू को दबाने की भरसक कोशिश की कि मुस्लिम परिवार ने छेड़छाड़ का विरोध करने पर ये हत्या की थी. लेकिन सोशल मीडिया पर ये मसला आ जाने पर सिर्फ सोशल मीडिया की मदद से 16 मई को दिल्ली में ऐतिहासिक पंचायत हुई.
युवा मतदाता हो रहा है सबसे ज्यादा प्रभावित
मैककिंस्की की हालिया रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एक व्यक्ति हफ्ते में 17 घंटे सोशल मीडिया पर बिता रहा है. यह परिवार के साथ एक कामकाजी व्यक्ति द्वारा बिताए गए समय से ज्यादा है. ये चीन और अमेरिका में सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले समय से भी ज्यादा है. अब जरा इस बात गौर कीजिए कि सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा उपस्थिति किन लोगों की है. फेसबुक के टेस्ट केस से इसे समझते हैं. सबसे ज्यादा फेसबुक का इस्तेमाल 18 से 24 उम्र वाले युवा कर रहे हैं. इसमें फर्स्ट टाइम या सेकेंड टाइम वोटर शामिल हैं. इनका आंकड़ा दस करोड़ है. 25 से 34 की उम्र वाले दूसरे नंबर पर हैं. इस आयु वर्ग के आठ करोड़ मतदाता फेसबुक इस्तेमाल कर रहे हैं. 35 से 44 साल के मतदाता को भी यदि आप युवा माने तो ढाई करोड़ मतदाता फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं. ट्वीटर के भी भारत में 34 करोड़ यूजर हैं. इनमें सबसे ज्यादा तादाद 25 से 44 साल के आयुवर्ग के यूजर्स की है. एक अन्य रिसर्च के मुताबिक सोशल मीडिया पर राजनीतिक चर्चा करने वालों की संख्या 40 करोड़ से ज्यादा है. इसके अलावा 25 करोड़ से अधिक यूजर राजनीतिक वीडियो देखते हैं और शेयर करते हैं. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फेसबुक, ट्विटर या वॉट्स एप पर कैसे चुनाव तय हो रहा है. यह किसी भी रैली और अन्य प्रचार माध्यम से संभव नहीं है.
भाजपा और मोदी का जलवा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डिजिटल दुनिया में जलवा है. उनके फेसबुक पेज को चार करोड़ 37 लाख लोग लाइक कर चुके हैं. फेसबुक पर ही भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक पेज को डेढ़ करोड़ से ज्यादा यूजर फॉलो करते हैं. ट्विटर पर भारतीय जनता पार्टी एक करोड़ से ज्यादा फॉलोअर का आंकड़ा पार कर चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आफिशियल ट्विटर एकाउंट को फॉलो करने वालों की संख्या 4.7 करोड़ हो चुकी है. जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी डिजिटल लोकप्रियता में नरेंद्र मोदी से बहुत पीछे हैं. उन्हें फॉलो करने वाले लोगों की संख्या साढ़े 94 लाख है. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि डिजिटल दुनिया में नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी किस तरह से छाए हैं. जाहिर है, जिसके जितने फॉलोअर हैं, उसकी बात उतने ही लोगों तक पहुंच रही हैं.
वॉट्स एप और बाकी प्लेटफार्म
वाट्स एप पर उत्तर भारत के राज्यों में भाजपा के 25 हजार से ज्यादा ग्रुप हैं. इनमें सबसे अधिक बीस हजार उत्तर प्रदेश में हैं. इन ग्रुप को भाजपा के आईटी सेल में काम करने वालों ने कुछ इस तरीके से जोड़ा है कि बूथ तक बात पहुंच सके. संवाद की इस श्रृंखला की खूबसूरती ये है कि बात दिल्ली से शुरू होकर चंद मिनटों में बूथ तक पहुंच जाती है. और अब बात सिर्फ फेसबुक, ट्विटर या वाट्स एप तक सीमित नहीं है. टिक टॉक के अलावा भारत की शेयर चैट, डेली हंट जैसे वीडियो शेयरिंग एप ने चुनावी दुनिया को बदल डाला है. इन एप के जरिये राजनीतिक संदेश बहुत बड़े स्तर पर प्रसारित किए जा रहे हैं. ऐसा संभव कैसे हुआ. ये फोन क्रांति असल में डाटा के रेट में कमी का नतीजा है. मैककिंसकी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से 2018 के अंत तक इंटरनेट डाटा के रेट में 95 फीसद की कमी आई है. भारत के मोबाइल डाटा यूजर हर महीने औसतन 8.3 गीगा बाइट (जीबी) डाटा का इस्तेमाल कर रहे हैं. जबकि चीन में ये औसत साढ़े पांच जीबी और दक्षिण कोरिया में साढ़े आठ जीबी है.