पहले नक्सलियों को खत्म करो फिर विकास करो
   दिनांक 02-मई-2019
छत्तीसगढ़ के बस्तर में वहां के एकमात्र भाजपा विधायक भीमा मंडावी समेत पांच हुतात्माओं का दशगात्र अभी संपन्न ही हुआ था कि छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली से एक और बुरी खबर आई। गढ़चिरौली में बुधवार को नक्सलियों द्वारा किए गए भीषण नक्सल हमले में सुरक्षा बलों के 15 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए. निस्संदेह हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों खासकर तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम के बाद इनके हौसले और बुलंद हुए हैं, लोकतंत्र के खिलाफ इनकी लड़ाई को और ज्यादा ताकत मिली है.
सवाल महज़ इतना है कि जब आज हमारी ताकत का डंका सारी दुनिया में बज रहा हो, पाकिस्तान के पसीने छूट रहे हों, चीन जैसा भी अदब से पेश आने पर विवश हो, पिछले दो दशक से बार-बार लगाए जा रहे वीटो को वापस ले कर अगर चीन जैसा देश मसूद अज़हर को अंततः ग्लोबल आतंकी का टैग लगा देने के अपने अभियान को सम्पूर्णता दे रहा हो, जब आज हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाने की तरफ तेज़ी से अग्रसर हों, ऐसे में आखिर क्या कारण है कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कुछ मुट्ठी भर लोकतंत्र विरोधियों के हाथों इस हद तक पस्त (परास्त नहीं लेकिन पस्त) होता जा रहा है.
पिछले लगभग दो दशक से एक नक्सल प्रभावित प्रदेश में रहने और इसे करीब से महसूस करने के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि हमारी कमज़ोर समझ- जी हां – फिर दोहरा दूं, हमरी कमजोर समझ ही नक्सल संकट के लिए जिम्मेदार है. अगर अपनी बातों को एक वाक्य में कहना चाहें तो यही समझ लीजिये की आज कहा जाता रहा है कि विकास की कमी के कारण नक्सलवाद पैदा हुआ और फैला है, आप जैसे-जैसे कथित विकास करेंगे, वैसे-वैसे नक्सल खत्म होते जायेंगे, बस..... बस यही वह बिंदु है जहां हमें विचारों का शीर्षासन कराना होगा. हम बस एक छोटा सा सूत्र पकड़ लें कि – विकास से नक्सल समस्या का समाधान नहीं होगा बल्कि नक्सल को ख़त्म कीजिये, फिर विकास होगा. इस एक वाक्य को जिस दिन हमने अंगीकार कर लिया, नक्सलवाद मुश्किल से छः महीने का मेहमान होगा.
हम सब जानते हैं कि नक्सलियों को वसूली के रूप में एक बड़ी रकम (एक गुप्त रिपोर्ट के अनुसार केवल बस्तर से ही लगभग पंद्रह सौ करोड़ रुपया) मिलती है, ज़ाहिर है यह रकम कथित विकास से ही पैदा होती है. आप पुल, सड़क, भवन आदि बनायेंगे .. वे ठेकेदार से वसूली के रूप में पंद्रह प्रतिशत की रकम कमाएंगे. फिर वे इन सबको विस्फोटक लगा कर उड़ा देंगे, फिर नया बनाने के लिए टेंडर होगा, फिर पंद्रह प्रतिशत उनके हिस्से में जाएगा और यह क्रम अनंत काल तक चलता रहेगा, विकास और नक्सलवाद संगी होकर साथ चलते रहेंगे.
गढ़चिरौली, जहां यह हमला हुआ है वहीं आजीवन काम करते रहे बाबा आमटे. उनका आश्रम ऐसा रहा जहां बाघ-बकरी के एक ही घाट पर पानी पीने की कहानी सच होती रही. आज भी उन्हीं जंगलों में बाबा के डॉक्टर बेटे-बहु उनके पदचिन्हों पर चलते हुए काम कर रहे हैं. उन्हीं बाबा आमटे से किसी पत्रकार ने कभी पूछा था कि आखिर नक्सल समस्या का समाधान क्या है? बाबा का कहना था – आप आदिवासियों को दो जून का चावल पंहुचा दीजिये, नक्सलवाद खुद खत्म हो जाएगा. छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने ऐसा प्रयोग प्रदेश भर में किया था. बस्तर समेत समूचे छग में चावल देने की शुरुआत हुई और एक छोटा सा कहा जाने वाला प्रदेश देखते ही देखते अपने एक इसी काम की बदौलत समूची दुनिया में प्रसिद्ध हो गया.
इस बीच विकास भी शुरू हुआ बस यहीं से नक्सलियों ने विकास किए जाने की एवज में ठेकेदारों से और ज्यादा वसूली शुरू कर दी. नक्सलियों के पास पैसा बढ़ता रहा। यदि विकास किए जाने से नक्सलवाद खत्म हो जाता तो ऐसा हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
जबकि तथ्य यह है कि विकास नहीं होने के कारण नहीं बल्कि उसके बहाने बस्तर-गढ़चिरौली जैसे क्षेत्रों में नक्सलियों ने और पैर पसरे. नक्सलियों को छिपने की जगह चाहिये थी, तो उन्होंने बस्तर में वनवासियों का शोषण किए जाने को बहाना बनाया. जबकि हम सब जानते हैं कि नक्सलवाड़ी में ज़मींदारों के खिलाफ नक्सल का जन्म हुआ और बस्तर जैसे क्षेत्रों में कोई ज़मींदार हो ऐसी स्थिति ही नहीं है. इसके अलावा जिस कॉरपोरेट द्वारा जमीने छीने जाने का हल्ला शहरी नक्सली दुनिया भर में करते हैं, सच तो यह है कि ऐसा कोई उद्योग भी बस्तर में नहीं है. हां, यहां के लोहंहीगुडा में टाटा का एक बड़ा संयंत्र लगना था ताकि बस्तर के भीतर एक ‘टाटानगर’ जैसा विकसित टाउनशिप हो जाता लेकिन उसे भी वापस जाना पड़ा और अब ज़मीन की चार गुनी कीमत लेने के बावजूद वह ज़मीनें भी वहां के आदिवासियों को वापस की जा चुकी है यानी पांच गुना का फायदा. ऐसे हज़ार जवाब हैं, अगर झूठ का कोई मीनार बनाया जा सकता तो शहरी नक्सलियों द्वारा फैलाए झूठ से अभी तक अंतरिक्ष में पहुंचा जा सकता था.
प्रसंगवश यह भी बता दें कि आदिवासियों की आराध्य मां दंतेश्वरी होने के बावजूद नक्सली बस्तर के आदिवासियों को हिन्दू भी नहीं मानते. विधायक भीमा मंडावी की हत्या के बाद नक्सल विज्ञप्ति जारी कर उनका ‘अपराध’ यही बताया गया कि वह ‘कट्टर हिंदू नेता’ थे.
झूठ और फरेब, एक से एक दुष्प्रचार के सहारे दिल्ली तक में बैठे नक्सली विलासिता की सारी हदों को पार कर रहे हैं और मर रहे हैं. वहीं वे वनवासी, जिनके भले के लिए यह काम करने का दावा करते हैं दो दिन पहले ही बस्तर में जनता अदालत में भीड़ के सामने पेड़ से उलटा लटका कर पीट-पीट कर एक व्यक्ति की हत्या कर देने की वारदात सामने आई है. वहां लगातार ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. हमें इन सबसे निबटने के लिए पहले शहरों में छिपे कथित नक्सलियों को खत्म होगा इसके बाद सख्ती से उन लोगों से निबटना होगा जो गरीब वनवासियों को डरा—धमकाकर आतंक का यह खेल खेलते हैं.