बुर्का बनाम घूंघट कन्हैया के बुर्के में जावेद!
   दिनांक 22-मई-2019
दिग्विजय सिंह का परोक्ष रूप से प्रचार करने भोपाल गए जावेद अख्तर ने वहां बयान दिया कि ‘बुर्के पर पाबंदी लगे तो राजस्थान में घूंघट पर भी पाबंदी लगनी चाहिए।’ जो अंतर उन्हें देखना चाहिए था वह है कि घूंघट के लिए फतवे नहीं निकलते। महिलाओं का खून नहीं होता। उन्हें तलाक नहीं दे दिया जाता। पर बुर्के के लिए यह सब होता आ रहा है
कम्युनिस्टों के दुलारे जेएनयू के टुकड़े-टुकड़े गैंग के नेता कन्हैया के साथ कॉमरेड जावेद अख्तर और उनकी बेगम कॉमरेड शबाना आजमी
 जावेद अख्तर (सिने पटकथा लेखक और गीतकार) तर्कों के धनी माने जाते हैं। गर्व से स्वयं को नास्तिक कहते हैं। कट्टरपंथ के खिलाफ बोलते हैं। इसीलिए जब उनके मुंह से ऐसी बातें निकलें जो उनके ही तर्कों और दृष्टिकोण का खंडन करती हों तो चर्चा आवश्यक हो जाती है।
पिछले दिनों वे जेएनयू कांड से कुख्यात हुए कन्हैया कुमार का चुनाव प्रचार कर रहे थे, और कह रहे थे कि ‘मैं प्रत्याशी का प्रचार करता हूं उसकी पार्टी का नहीं।’ यहीं से सवाल उठने शुरू हो जाते हैं। पर सबसे पहले चर्चा उनके बहुचर्चित बयान की।
भोपाल में उन्होंने बयान दिया कि ‘बुर्के पर पाबंदी लगे तो राजस्थान में घूंघट पर भी पाबंदी लगनी चाहिए।’ यहां उन्हें जो अंतर देखना चाहिए था वह यह कि घूंघट के लिए फतवे नहीं निकलते। महिलाओं का खून नहीं होता। उन्हें तलाक नहीं दे दिया जाता। पर बुर्के के लिए यह सब होता आ रहा है।
हिंदू महिला हिंदू कोड बिल से सुरक्षित है। पर मुस्लिम महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ के बोझ के नीचे पिसी जा रही है। हलाला की शर्मिंदगी झेल रही है। मुस्लिम महिला आज भी कानूनी बराबरी के लिए आस लगाए राज्यसभा के दरवाजे पर खड़ी है, जिस पर कन्हैया कुमार की कम्युनिस्ट पार्टी भी उसे न्याय देने के लिए तैयार नहीं है। जावेद कहते हैं कि वह प्रत्याशी का प्रचार करने जाते हैं, पार्टी का नहीं, लेकिन उनका प्रत्याशी तो उसी पार्टी का ही समर्थन करेगा न, जिससे वह कन्नी काटकर निकल जाना चाहते हैं।
बुर्के और घूंघट में एक और मूलभूत अंतर है जावेद जी! दरअसल बुर्का कपड़ों के ऊपर से पहना जाने वाला एक कपड़ा है, जिससे पूरे शरीर को ढका जाता है। कट्टरपंथियों का इस पर जोर होता है कि हाथ-पैर की उंगलियां भी न दिखें और न ही चेहरे पर आंखें। जबकि घूंघट, साड़ी या चुनरी का हिस्सा होता है जिससे चेहरे को तनिक ढक लिया जाता है। हाथ-पैर ढकने-ढकवाने का, देह को अदृश्य करने का जुनून उसमें नहीं होता। शहरी क्षेत्रों में तो घूंघट प्राय: समाप्त हो चला है, ग्रामीण क्षेत्रों से भी विदा हो रहा है। इसलिए घूंघट और बुर्के में कोई तुलना नहीं है। लेकिन आपके इस बयान ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को एक उथला बहाना उपलब्ध करवा दिया है, बुर्के को बरकरार रखने के लिए।
जावेद अख्तर शिकायत करते हैं कि ‘आजकल जो भाजपा के विचारों से सहमत न हो उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है’। साथ ही वे कन्हैया कुमार के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करते हैं कि वह प्रगतिशील सोच वाला है। कन्हैया कुमार के बारे में जो बात वे भुला देना चाहते हैं वह बहुत गंभीर है। जेएनयू के ‘टुकड़े-टुकड़े’ कांड की जांच के लिए विश्वविद्यालय की जो समिति बनी थी, उसने यह माना था कि तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की उपस्थिति में देशविरोधी नारे लगे थे, लेकिन जब उन नारों के बाद कन्हैया ने बोलना शुरू किया तो उन नारों के विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला, बल्कि सरकार और व्यवस्था के खिलाफ उत्तेजक भाषण दिया। यह नक्सली छाप राजनीति जावेद अख्तर को स्वीकार है क्या? कन्हैया और उसके साथी उमर खालिद आदि के बारे में बोलते हुए अदालत ने भी कहा था कि पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन यह बीमारी (देश विरोधी बातें) फैलती जा रही है।
एक बार जावेद अख्तर ने अरविन्द केजरीवाल से बहुत अच्छा सवाल पूछा था कि ‘आपको कुछ राजनीतिज्ञ पसंद नहीं हैं या आपको यह (लोक) तंत्र ही पसंद नहीं है, लोकसभा-राज्यसभा, न्यायपालिका आदि पसंद नहीं हैं। हिंदुस्तान के संविधान पर आप भरोसा रखते हैं या नहीं? आप कहते हैं कि जनता फैसला करेगी। जनता कैसे फैसला करेगी? सड़क पर फैसला करेगी? तो संसद को बंद करवा देना चाहिए। आप सिस्टम और व्यक्तियों को लेकर भ्रमित करते हैं। आपका विजन क्या है? आपके पास आदर्श भारत का नक्शा क्या है?’अब सवाल यह है कि कन्हैया कुमार भी तो इसी कहानी का हिस्सा है। जिस कम्युनिस्ट छात्र संगठन का वह नेता है, उसकी विचारधारा भी तो यही है। कम्युनिस्ट विचारधारा मूलत: लोकतंत्र विरोधी विचार है। व्यावहारिकता में भी वह जनतंत्र नहीं, कम्युनिस्ट तंत्र को महत्व देती है। कन्हैया कुमार की कम्युनिस्ट पार्टी कौन सा मॉडल खड़ा कर पाई है इस देश में, या दुनिया में कहीं भी? कन्हैया भी कौन-सा विकल्प प्रस्तुत कर रहा है देश के लिए या बेगूसराय के लोगों के लिए, जहां से वह चुनाव लड़ रहा है?
जावेद कहते हैं कि ‘वह प्रगतिशील विचारों वाला है।’ लेकिन उनका ‘प्रगतिशील’ कन्हैया कुमार तीन तलाक पर सीधे जवाब नहीं देता। गोलमोल बातें बनाता है। बुर्के पर बात घुमा देता है। पर ‘बीफ बैन’ पर उसे ऐतराज है। जावेद जी, कन्हैया कुमार भी उसी छद्म सेकुलरवाद का विद्यार्थी है, जिसे आप कोसते रहते हैं। उसके पास युवाओं के लिए वही ‘विजन’ है जो राहुल गांधी के पास है। वह राहुल गांधी के बयानों को ही दूसरे शब्दों में दुहरा रहा है-‘कब आएंगे 15 लाख? राफेल में घोटाला हुआ। देश में असहिष्णुता है।’ आदि।
वह उद्योग जगत को खलनायक बता रहा है। कम्युनिस्ट पर्चों में जो सौ सालों से छप रहा है, वही कन्हैया कुमार चीख-चीखकर बोल रहा है। फर्क इतना है कि अब ‘बुर्जुआ’ की जगह ‘कारपोरेट’ ने ले ली है। कन्हैया की भी वही रणनीति है जो अखिलेश यादव, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की है। यानी चुनाव भले ही केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पद के लिए हो रहा है लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों पर बात न हो। सुरक्षा, आतंकवाद, आधारभूत ढांचा, विदेश नीति की बात न हो। बस काल्पनिक असहिष्णुता, तथाकथित ‘लिंचिस्तान’ और राफेल पर देश की सबसे बड़ी अदालत में ढेर हो चुके आरोपों पर ही शोरगुल मचाया जाए।
3 मई को एक टीवी कार्यक्रम में जावेद अख्तर बोले कि ‘लोग नेता को राष्ट्र समझ लेते हैं और पार्टी को देश। इससे गड़बड़ होती है।’ यह बात जावेद कन्हैया कुमार से क्यों नहीं कहते, जो चुनावी भाषणों में जेएनयू कांड में अपने ऊपर लगे देशद्रोह के आरोपों को ‘बेगूसराय के ऊपर लगा देशद्रोह का आरोप’ बताता है?
राष्ट्रवाद की बात तो होगी
जावेद अख्तर का कहना है कि राष्ट्रवाद का मुद्दा चुनाव में नहीं उठाया जाना चाहिए और यह बेवजह बहस में है। जावेद भूल जाते हैं कि हम दशकों से अपने आस-पास क्या देख रहे हैं। राष्ट्रवाद का मुद्दा बहस में इसलिए है क्योंकि जेएनयू में भारत की बर्बादी के नारे लगते हैं और केजरीवाल-राहुल गांधी-वामपंथी नेता नारे लगाने वालों के समर्थन में जेएनयू पहुंच जाते हैं। बाटला हाउस के आतंकियों के लिए सोनिया गांधी के आंसू निकल आते हैं। राष्ट्रवाद का मुद्दा हवा में इसलिए है क्योंकि देश में वोट बैंक के लिए देश विरोधी बातों को स्वीकार कर लिया जाता है। क्योंकि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी दोनों अपने चुनाव घोषणा पत्र में ‘आफ्सपा’ हटाने की बात करती हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया अपने घोषणा पत्र में इस्रायल और अमेरिका से संबंध और रक्षा समझौते तोड़ने की बात करती है। क्यों? इसका चुनाव और जनता से क्या संबंध है? यही न कि मुस्लिम जगत में यहूदियों (इस्रायल) और अमेरिका को मुसलमानों का दुश्मन बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है? क्या यह देशहित की कीमत पर की जा रही सांप्रदायिक राजनीति नहीं है जावेद जी? परंतु जावेद कहते हैं कि उन्हें पार्टी से मतलब नहीं, बल्कि सांसदों से मतलब है। प्रश्न तो यही है कि देश की नीतियां तो सत्तारूढ़ पार्टी ही बनाएगी न। उन्होंने केजरीवाल से बहुत अच्छा सवाल किया था कि ‘देश को केंद्र्र सरकार चाहिए कि नहीं? आप दुनिया से बात करेंगे तो क्या ग्राम पंचायतों के माध्यम से करेंगे? प्रधानमंत्री ही बात करेगा न।’ लेकिन लोकसभा चुनाव में बयान देते हुए वे दरअसल इस तर्क को भूल जाते हैं।
जावेद राष्ट्रवाद और व्यवस्था, राष्ट्रवाद और प्रशासन को लेकर भ्रमित हैं। राज्य और राष्ट्र को लेकर भ्रमित हैं। वे 3 मई की एक टीवी चर्चा में बोले, ‘बेरोजगारी की बात करना, किसान की समस्या की बात करना, आधारभूत ढांचे की बात करना सच्चा राष्ट्रवाद है।’ यदि यही सच है तो जिनके हाथ में कुछ नहीं था वह वंदेमातरम् बोलकर विदेशी हमलावरों की संगीनों के सामने कैसे खड़े हो गए? फिर तो भगत सिंह को देश की आजादी की जगह नौकरी ढूंढने की चिंता पहले करनी चाहिए थी।
राष्ट्रवाद अपनी धरती और उसकी संस्कृति से भावनात्मक लगाव से उत्पन्न होता है। और भारत का राष्ट्रवाद यूरोपीय और अरब जगत की तरह आक्रामक नहीं हुआ तो उसका कारण यहां की प्राचीन संस्कृति है जिसे जावेद अख्तर ही इन शब्दों में स्वीकार कर चुके हैं-‘हिन्दू संस्कृति और परंपरा के बारे में सबसे खूबसूरत बात यही है कि वह इजाजत देती है कि कुछ भी कहो, कुछ भी सुनो, कुछ भी मानो। और यही परंपरा और मूल्य हैं जिसके कारण इस मुल्क में लोकतंत्र है। देश से बाहर निकलेंगे तो फिर भूमध्यसागर तक लोकतंत्र नहीं मिलता’ नवम्बर 2015 में जावेद अख्तर ने एक चैनल पर यह सब कहा था। अब कम्युनिस्ट विचारधारा तो इस संस्कृति से ही नफरत करती है, जिसका एक चेहरा कन्हैया कुमार हैं ।
जावेद कहते हैं कि ‘तथाकथित सेकुलर पार्टियों ने अल्पसंख्यकों में जो कट्टरपंथी हैं, उनसे आंखें चुरार्इं। उनकी उचित आलोचना नहीं की। उन्हें इस्तेमाल करने की कोशिश की।’ यह बात उन्हें कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से कहनी चाहिए जिनका अप्रत्यक्ष चुनाव प्रचार वे भोपाल में करके आए हैं। जो दिग्विजय सिंह कट्टरपंथी जाकिर नायक से गलबहियां करते हैं और लादेन को ‘ओसामा जी’ कहते हैं।
जावेद अख्तर बार-बार कह रहे हैं कि ‘सारा देश मोदी से डरा हुआ है।’ यह इतनी हास्यास्पद और उथली बात है कि इसका उत्तर कोई बालक भी दे सकता है। मोदी सरकार बनने के बाद एक ‘असहिष्णुता’ का प्रोपेगैंडा खड़ा किया गया था। सामान्य नागरिक हैरान था कि यह कौन—सी चीज है जो उसे कहीं नहीं दिख रही, लेकिन इन ‘बुद्धिजीवियों’ को उसके अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा है? जावेद साहब! देश मोदी से नहीं डरा हुआ है, बल्कि देशभर में सुनाई दे रही ‘मोदी—मोदी’ की गूंज से सिर्फ वे डरे हुए हैं, जिनकी राजनीतिक आकांक्षाएं चरमरा रही हैं। साफ है कि जावेद अख्तर का बयान किसी फिल्मी फंतासी जैसा है, जिसका अस्तित्व सिनेमाघर के बाहर निकलते ही समाप्त हो जाता है।
लेकिन जावेद राहुल गांधी के शब्द दुहराते घूम रहे हैं। वे कहते हैं कि ‘देश छोड़िए, बीजेपी में मोदी-अमित शाह से जो सहमत नहीं है वह डरा हुआ है।’ चलिए थोड़ी देर के लिए आप की बात मान लेते हैं जावेद जी। अब बताइये कि क्या कांग्रेस में जो सोनिया-राहुल से असहमत हैं वे उनका विरोध करने की हिम्मत दिखा सकते हैं? सपा में अखिलेश, मुलायम और राजद में लालू परिवार का कोई विरोध कर सकता है क्या? बसपा में मायावती से कोई नजरें मिलाकर बात कर सकता है क्या? मायावती के तो मंच पर चढ़ने से पहले सबको अपने जूते उतारने पड़ते हैं जबकि बहनजी ठाठ से सैंडिल कसे बैठी रहती हैं। इसके उलट भाजपा में तो कई नेता खुलेआम मोदी-अमित शाह पर निशाने साधकर सालों तक भाजपा में बने रहे और अब दूसरी पार्टियों से चुनाव लड़ रहे हैं। आप किस भय की बात कर रहे हैं? जावेद अख्तर शिकायत करते हुए कहते हैं कि ‘चुनाव मोदी पर केन्द्रित हो गया है।’ इसके पीछे दो कारण हैं। एक, मोदी जन-जन की आशाओं का केंद्र बनकर उभरे हैं। और ऐसा हर देश में, हर लोकतंत्र में होता है, जब कोई लोकप्रिय नेता उभरता है। अमेरिका में ओबामा का दौर गुजरा है। भारत में इंदिरा और नेहरू युग रहा। अटल युग भी आया। दूसरे, विपक्ष के पास भी सिवाय मोदी को बुरा-भला कहने के कोई और एजेंडा है क्या? जावेद अख्तर कहते हैं कि विरोधियों की आवाज दब गई है। ऐसा कभी नहीं होना चाहिए, और न ही ऐसा हुआ है। यदि विरोधियों की आवाज दब गई होती तो आप इतना कुछ कैसे बोल पाते जावेद? मोदी को रात-दिन अपशब्द कहने वाले लोग कैसे बोले चले जाते? आप जिसे भय कह रहे हैं वह वास्तव में जनमत का भय है। यह भारत देश है, यह भयभीत करने में विश्वास ही नहीं रखता।