'अलवर' नहीं दिखा दिल्ली के मीडिया को
   दिनांक 22-मई-2019
कांग्रेस पोषित दर्जनों वेबसाइट और पत्रकार चुनाव में खुलकर उसके समर्थन में उतरे

 
बीते 70 साल की कांग्रेसी व्यवस्था ने न सिर्फ मीडिया को गुलाम बनाया, बल्कि उन संस्थाओं को भी कठपुतली बना दिया जिनकी जिम्मेदारी है कि वे लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करें। ऐसी ही एक संस्था है एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया। कुछ गिने-चुने संपादकों की यह जेबी संस्था कथित तौर पर पूरे भारतीय मीडिया जगत के प्रतिनिधित्व का दावा करती है। इसके कामकाज पर ध्यान दें तो यह समझते देर नहीं लगती कि पिछली कांग्रेस सरकारों ने कितनी सफाई के साथ विभिन्न संस्थाओं को अपने चंगुल में फंसाया है। प. बंगाल में लोकसभा चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर मीडिया को शिकार बनाया गया। कई पत्रकारों की पिटाई हुई। इंडिया टुडे की महिला पत्रकार समेत कई मीडियाकर्मियों को कैमरे के सामने थप्पड़ मारा गया। हैरानी तब होती है जब आप यह देखते हैं कि इन हमलों के खिलाफ न तो वे मीडिया समूह आवाज उठाते हैं और न ही एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाएं।
बंगाल में हिंसा के एक हफ्ते से भी अधिक बीत जाने के बाद एडिटर्स गिल्ड ने एक 'डरा हुआ बयान' जारी किया जिसमें तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की 'कथित' हिंसा का जिक्र था। पर इसे खुलेआम बढ़ावा दे रहीं ममता बनर्जी का जिक्र तक नहीं था। एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष शेखर गुप्ता ने कुछ दिन पहले एक लेख लिखकर ममता की इस बात के लिए तारीफ की थी कि वे 'आग का मुकाबला आग' से कर रही हैं। इसी तरह न्यूज चैनलों की संस्था एनबीएसए भी आए दिन कांग्रेस के लिए अपनी निष्ठा को खुलकर जताती रही है। कुछ दिन पहले रिपब्लिक चैनल की रिपोर्टर के साथ जिग्नेश मेवाणी के समर्थकों ने बदसलूकी की। जब चैनल ने इस खबर को दिखाया तो एनबीएसए ने उलटे चैनल से माफी मांगने को कहा। ऐसा न करने पर उसे बंद करने तक की धमकी दी गई। जबकि यही संस्थाएं आतंकवादियों की मदद करते रंगे हाथ पकड़े गए एनडीटीवी के खिलाफ सरकार की कार्रवाई को मीडिया की आजादी पर हमला बता रही थीं।
मीडिया किस तरह से इस चुनाव में कांग्रेस की मदद कर रहा है इसका एक बड़ा उदाहरण है अलवर बलात्कार मामला। दिल्ली से मात्र 4 घंटे की दूरी पर एक दलित जोड़े के साथ दरिंदगी हुई। राजस्थान का पूरा सरकारी तंत्र इस खबर को दबाने में जुट गया। क्योंकि उन्हें इससे चुनाव में नुकसान का डर था। इस खेल में कांग्रेस के साथ मीडिया भी शामिल था। राजस्थान के किसी भी बड़े अखबार ने यह खबर तब तक नहीं छापी जब तक मामला सार्वजनिक नहीं हो गया और पीडि़त परिवार ने खुद जाकर रिपोर्ट नहीं लिखवा दी। जबकि घटना 26 अप्रैल को हुई और 30 अप्रैल तक ही मीडिया को पूरी जानकारी पहुंच चुकी थी। उधर दिल्ली के मीडिया का एक बड़ा वर्ग अब भी इस खबर को दबाने में जुटा है। क्या इस घटना पर प्रियंका वाड्रा से प्रतिक्रिया नहीं ली जानी चाहिए, जो दूसरे राज्यों में घूम-घूमकर महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं?
एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने राजीव गांधी के भ्रष्टाचार की चर्चा छेड़ दी तो कांग्रेस से ज्यादा मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग तिलमिला उठा। यह तिलमिलाहट संपादकीय लेखों से लेकर कार्टूनों तक में दिखाई दी। मर्यादा का मीडिया का यह पैमाना सिर्फ गांधी परिवार के लिए ही है। सरदार पटेल, नरसिम्हा राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक न जाने कितने बड़े नेताओं को निधन के बाद कांग्रेस ने अपमानित किया। लेकिन उनके लिए मीडिया ने कभी वह पैमाना इस्तेमाल नहीं किया जो भ्रष्टाचार के कारण ही सत्ता से बाहर हुए राजीव गांधी के लिए होता है। इस बीच यौन शोषण के आरोपी पत्रकार विनोद दुआ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया जिसमें वे वाजपेयी के निधन के बाद उनकी आलोचना की वकालत कर रहे हैं, जबकि राजीव गांधी की आलोचना को गलत बता रहे हैं। कांग्रेस के पाले-पोसे ऐसे पत्रकारों का ये दोमुंहापन आज लोग समझ चुके हैं।
ऐसे ही एक कथित बड़े पत्रकार हैं राघव बहल, जिनकी वेबसाइट 'क्विंट' पर बाकायदा हिंदू धर्म के खिलाफ दुष्प्रचार किया जाता है। नवरात्र से पहले इस वेबसाइट ने एक लेख के जरिए बताया था कि उपवास करना सेहत के लिए ठीक नहीं है। इसके बाद रमजान शुरू होते ही उन्होंने 'रोजे और उपवास की वैज्ञानिकता' पर लंबा-चौड़ा लेख लिखा है। यह वेबसाइट नियमित रूप से हिंदुओं के देवी-देवताओं और त्योहारों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करती है। दूसरी तरफ पैगम्बर मुहम्मद की शिक्षाओं को 'प्रगतिशील' बताती है। समझा जा सकता है कि ऐसी करीब दर्जन भर वेबसाइटों की फंडिंग कौन कर रहा है और क्या यह भी एक संयोग मात्र है कि ये सभी कांग्रेस पार्टी की समर्थक हैं।