टुकड़े-टुकड़े गैंग की राह पर ईवीएम पर शोर मचाने वाले नेता
   दिनांक 22-मई-2019
ईवीएम को हैक करना असम्भव है. आज तक कोई इसे हैक करके नहीं दिखा सका. लेकिन चुनाव परिणामों से भयभीत नेता ईवीएम के बहाने भारतीय लोकतंत्र की साख हमारी चुनाव प्रक्रिया पर ही कीचड़ उछालने में जुटे. ये लोग देश के अन्दर भी अविश्वास का माहौल बनाने के खतरनाक खेल में कूद पड़े हैं. सडकों पर खून बहाने की धमकियां तक दी जा रही हैं.

ईवीएम को लेकर फिर हो हल्ला मचाया जा रहा है. सबसे खतरनाक बात ये है कि अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए राजनीतिज्ञों का एक वर्ग अपने समर्थकों में चुनाव और संसद के प्रति अविश्वास पैदा करने का प्रयास कर रहा है. ये नेता वही भाषा बोल रहे है, जो नक्सली आतंकी चुनाव और मतदान के विरोध में बोलते हैं. जो भाषा जैश ए मुहम्मद और लश्कर ए तैयबा जैसे आतंकी भारतीय गणतंत्र के खिलाफ बोलते हैं. ये नेता नक्सलियों, कश्मीरी आतंकियों, अलगाववादियों और पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा तंत्र को बहाने उपलब्ध करवा रहे हैं भारत की निर्वाचन प्रक्रिया और संसद के विरुद्ध जहर उगलने के लिए.
आश्चर्य ही क्या कि ये नेता अपने कारनामों से भारत के संघीय ढांचे पर चोट करते दिखाई पड़ते हैं. याद करें ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू के उस ऐलान को, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की केन्द्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को बंगाल और आंध्रप्रदेश में घुसने नहीं दिया जाएगा. याद करें जब दिसंबर 2016 में ममता बनर्जी ने भारतीय सेना के नियमित अभ्यास को पश्चिम बंगाल सरकार का तख्ता उलटने की साज़िश करार दे दिया था, और इस प्रकार अपना मतलब साधने के लिए सेना पर ही कीचड़ उछाल दिया था. याद करें जेएनयू में भारत की बर्बादी का नारा लगाने वाले छात्रों के समर्थन में पहुंचने वाले राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल और कम्युनिस्ट नेताओं को. याद करें सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाले नेताओं को. याद करें सेनाध्यक्ष को “सड़क का गुंडा” कहने वाली मानसिकता को. कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद के उस बयान को भी याद करें जब उन्होंने सेना पर गन्दगी उछाली थी कि वो आतंकियों से ज्यादा नागरिकों को मार रही है. याद करें “ओसामा जी” और “हाफ़िज़ सईद साहेब” कहने वाले कांग्रेस के वरिष्ठजनों को. इंडियन मुजाहिदीन और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से सहानुभूति दर्शाने वाले सियासतदानों को. कितनी लंबी सूची है और आज ये सभी नेता ईवीएम पर बेबुनियाद दुष्प्रचार करके देश के अन्दर चुनाव प्रक्रिया पर ही अविश्वास पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं| बिना तर्क, बिना सबूत, बिना शर्म |



एक बड़ा प्रहसन जारी है. मीडिया में सुर्खियाँ बन रही है. धरनों और ज्ञापनों की नौटंकी हो रही है. ‘हम जीते तो ईवीएम सही, और हारे तो ईवीएम गलत’ जैसे हास्यास्पद – स्तरहीन तर्क निर्लज्जता से दिए जा रहे हैं. तकनीकी जानकार उनकी बातों और दावों पर हँस रहे हैं, सर्वोच्च न्यायालय उनकी बेसिरपैरकी याचिकाओं को खारिज कर रहा है. चुनावायोग उनके हर आरोप का उत्तर दे रहा है. पर तमाशा जारी है.
असंभव है ईवीएम की हैकिंग -
ईवीएम हैकिंग असंभव है, और इसलिए आज तक कोई भी ईवीएम को हैक करके नहीं दिखा पाया. जो लोग ईवीएम पर होहल्ला मचा रहे हैं, वो इस बात को अच्छी तरह जानते हैं. इसीलिए जब चुनाव आयोग ने चुनौती दी थी कि कोई भी आकर ईवीएम को हैक करके दिखाए. तब इनमें से कोई भी दल उस चुनौती को स्वीकारने तक नहीं पहुंचा था.
तथ्य ये है कि ईवीएम या किसी भी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को हैक करने के लिए आपको उससे किसी न किसी प्रकार से जुड़ना पड़ेगा. तभी आप उसके डेटा से छेड़छाड़ कर सकते हैं. अब ईवीएम में ऐसी कोई व्यवस्था है ही नहीं. ईवीएम इंटरनेट से नहीं जुड़ सकता. बेतार से नहीं जुड़ सकता. इसमें कोई भी रेडियो तरंगे प्रयोग नहीं की जा सकती अर्थात ब्लूटूथ या वाईफाई से इसे नहीं जोड़ा जा सकता. उसमें पेनड्राइव नहीं जुड़ता. कोई डेटा केबल या तार नहीं जुड़ सकता.
ये मशीन अपने आप में एक छोटा सा, लेकिन स्वतंत्र-स्वयंभू कंप्यूटर है. इसका माइक्रोप्रोसेसर वन टाइम प्रोग्राम के आधार पर बना है. इसका मतलब हुआ कि मतदाता द्वारा एक बार बटन दबाने के बाद इसमें कोई बदलाव या छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. यदि बदलाव की कोई कोशिश की जाती है तो मशीन अपने आप बंद हो जाती है. इसकी कोडिंग-डिकोडिंग सिर्फ इसके निर्माता को पता होती है. इसलिए इसे हैक करना सौ प्रतिशत असंभव है.
थोड़ा कॉमनसेंस ही लगा लेते....
....और यदि ये तकनीकी जानकारी राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती आदि को समझ न भी आए तो कुछ सहजबोध (कॉमनसेंस) की बातें भी हैं, जिनके आधार पर दूध का दूध और पानी का पानी, किया जा सकता है. हर मतदान केंद्र पर एक पोलिंग टीम होती है. इस पोलिंग टीम में सुरक्षाकर्मियों को मिलाकर औसतन 7 से 8 व्यक्ति होते हैं. स्वाभाविक रूप से ये लोग अलग-अलग जाति, मज़हब और राजनैतिक झुकाव वाले होते ही हैं. अब यदि सिर्फ एक मतदानकेन्द्र पर ईवीएम हैक करनी है, तो इन सभी 7-8 लोगों को राज़ी करना पड़ेगा. एक लोकसभा में औसतन डेढ़ से दो हजार मतदान केंद्र होते हैं. यदि एक लोकसभा के सिर्फ पांच सौ केन्द्रों पर भी गड़बड़ी करनी हो तो इन साढ़े तीन -चार हजार सरकारी कर्मचारियों को पता चलेगा. उन्हें बतलाना पडेगा. क्या सारे के सारे चुप रह जाएँगे? इतने बड़े पैमाने पर हैकिंग करने के लिए जितने हैकर्स की आवश्यकता होगी, उतने देश में हैं ही नहीं| भारत में हैकर्स की संख्या लगभग 15 हज़ार है,जो पहले से ही मोटी तनख्वाहों पर नौकरी कर रहे हैं|
मतदान के बाद ईवीएम को सभी दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सील या मुहरबंद कर दिया जाता है. ये सील मतगणना वाले दिन प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ही खोली जाती है. मतदान के बाद मतगणना तक सभी ईवीएम मशीनों को कड़ी सशस्त्र सुरक्षा में स्ट्रांगरूम में तालाबंद-मुहरबंद कर दिया जाता है. वहां सीसीटीवी लगे होते हैं. सुरक्षाबल तैनात होते हैं. स्ट्रांगरूम के बाहर सुरक्षा के इंतजाम तो होते ही हैं, राजनैतिक दलों और प्रत्याशियों के कार्यकर्ता भी पहरे पर होते है.
भ्रम ऐसे फैलाए जाते हैं -
आज तक ईवीएम से छेड़छाड़ का एक भी आरोप साबित नहीं हुआ है. लेकिन भ्रम फैलाने के लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बड़े-बड़े नेता सोची-समझी बयानबाजी करते हैं और ‘आधा सच–पूरा झूठ’ की तर्ज पर चुनाव की प्रक्रिया के विरुद्ध दुष्प्रचार करते हैं, जैसे कि “ईवीएम मशीनों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों की शिकायतें आ रही हैं.” क्या हैं ये “गड़बड़ियां”?
दरअसल इन नेताओं द्वारा एक बड़ी स्वाभाविक सी बात को षडयंत्र बनाकर प्रस्तुत किया जाता है. भारत में दस लाख से भी अधिक मतदान केंद्र हैं. याने दस लाख से अधिक ईवीएम मशीनें चुनाव में तैनात होती हैं. अब इतनी सारी मशीनों में से कुछ में थोड़ी बहुत तकनीकी दिक्कतें आएँगी ही., जैसे कि कोई बटन ठीक से काम न करना, बीप की आवाज़ न आना, आदि. तब ऐसी मशीन को तत्काल बदलकर दूसरी अतिरिक्त मशीन लाई जाती है. और मतदान फिर शुरू हो जाता है. इस साधारण सी प्रक्रिया पर इन दलों के राष्ट्रीय कद के नेता ऊलजलूल बयानबाजी करके खबरें बनाते हैं, और मीडिया ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ दिखाने लगता है.
वीडियो की सचाई -
फैलाए जा रहे भ्रम का दूसरा आधार है सोशल मीडिया में चलने वाले कुछ वीडियो. गाड़ियों में ईवीएम लाने-ले जाने के जो वीडियो चल रहे हैं वो या तो मतदान कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए ले जाई जा रही ईवीएम मशीनों के हैं, या फिर खराब या अतिरिक्त मशीनों के हैं, जिन्हें मतदान की प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है और जिन पर सील नहीं होती. सील न होने का मतलब है कि उन मशीनों को मतगणना के दौरान उपयोग में नहीं लाया जा सकता. इन मशीनों को इधर-उधर ले जाने के दौरान, प्रक्रिया और तकनीक के बारे में मामूली जानकारी भी न रखने वाले राजनैतिक कार्यकर्ता बेसिरपैर के वीडियो बना लेते हैं, और सोशल मीडिया पर डाल देते है. फिर उनके नेता उस फर्जी वीडियो को लेकर तिल का ताड़ बनाने लगते है.
देश को भ्रमित करने के लिए वो नारा देते हैं कि चुनाव एक बार फिर बैलेट पेपर से करवाए जाएँ. ईवीएम के पहले चुनाव में कैसे बूथ कैप्चरिंग और धाँधली होती थी वो सारे दृश्य देश को याद हैं| मीडिया आर्काइव्स में, उनके फोटो- वीडियो आज भी मौजूद हैं| इन नेताओं से पूछना चाहिए कि क्या मतपत्र से चुनाव इसलिए करवाए जाएँ ताकि जगह-जगह मतपत्र लूटे जा सकें? मतगणना पेटी में केरोसिन डालकर उन्हें जलाया जा सके? स्याही या पानी डालकर उन्हें बर्बाद किया जा सके? ताकि मतगणना में तीन गुना समय लगे और वोट काउंटिंग के समय मतपत्र इधर-उधर करके आखिरी समय तक धांधली की जा सके|...... ?
कांग्रेस याद करे...
ईवीएम पर बेबुनियाद आरोप लगाने में कांग्रेस भी सबसे आगे चल रही है. ध्यान रहे, कि ईवीएम पर स्वीकृति की मुहर राजीव गांधी की सरकार ने लगाई थी. तब लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के पास 414 सांसदों का प्रचंड बहुमत था.
हुआ ये कि बूथ कैपचरिंग और दूसरी गडबड़ियों से बचने के लिए चुनाव आयोग ने ईवीएम तकनीक से चुनाव कराने का फैसला लिया. मई 1982 में केरल की एक विधानसभा सीट के लिए पहली बार ईवीएम से चुनाव हुए.चुनाव आयोग की इस पहल पर राजीव गांधी सरकार ने दिसंबर 1988 में अपनी मुहर लगाई. जनवरी 1990 में चुनाव सुधार पर बनी दिनेश गोस्वामी कमेटी के सुझाव पर ईवीएम का विशेषज्ञ कमेटी द्वारा परीक्षण किया गया. कमेटी ने पाया कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित है| नवंबर 1998 के बाद सभी उपचुनावों में ईवीएम का प्रयोग होने लगा और साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद सभी चुनावों में इसका प्रयोग होने लगा| इसी ईवीएम के माध्यम से ही कांग्रेस की दो-दो बार केंद्र में सरकार (यूपीए) बनी |
देश को चुनावी हार-जीत से ऊपर रखें...
विपक्षी नेताओं को सीखना होगा कि देश चुनाव और कुर्सी से बहुत बड़ा होता है. किसी समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था का बड़ा महत्त्व होता है. इस विश्वास को हिलाना बहुत गंभीर मुद्दा है. ये नेता अपने समर्थकों के सामने अपनी नाक बचाने के लिए जिस रास्ते पर चल पड़े हैं, वो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है. विपक्षियों को समझना होगा कि जनादेश को स्वीकार करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना जरुरी चुनाव लड़ना. पर अभी तो आलम ये है कि चुनाव का परिणाम आने से पहले ही ईवीएम पर छाती पीटना शुरू हो जाता है. और कुछ नहीं तो कम से कम अपने बहानों का स्तर तो सुधारें.