कैसा इस्तीफा, राहुल गांधी कांग्रेस के जन्मजात अध्यक्ष हैं, आजीवन अध्यक्ष हैं
   दिनांक 26-मई-2019
शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक की कार्यवाही देख लें, आप समझ जाएंगे. राहुल गांधी के नेतृत्व में 42 चुनाव में लड़ चुकी कांग्रेस पार्टी को 36 में हार मिली है. इसके बावजूद वह कांग्रेस अध्यक्ष हैं और रहेंगे. असल में कांग्रेस के लिए राहुल गांधी जन्मजात अध्यक्ष हैं, आजीवन अध्यक्ष हैं.

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद से ही सोशल मीडिया पर ही पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी पर चुटकी ली जा रही थी. लोग कह रहे थे, राहुल गांधी इस्तीफा देंगे, फिर राहुल उस इस्तीफे पर विचार करेंगे, और आखिरकार राहुल गांधी उस इस्तीफे को अस्वीकार कर देंगे. शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक की कार्यवाही कुछ-कुछ ऐसी ही तो थी. राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की, और जैसा कि अपेक्षित था....इस्तीफा नामंजूर हो गया. कांग्रेस की हार के कारण तलाशने के लिए किसी शोध की जरूरत नहीं है. शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक की कार्यवाही देख लें, आप समझ जाएंगे. राहुल गांधी के नेतृत्व में 42 चुनाव में लड़ चुकी कांग्रेस पार्टी को 36 में हार मिली है. इसके बावजूद वह कांग्रेस अध्यक्ष हैं और रहेंगे. असल में एक परिवार में पैदा होने के कारण कांग्रेस के लिए राहुल गांधी जन्मजात अध्यक्ष हैं, आजीवन अध्यक्ष हैं.
इस्तीफे की नौटंकी
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी 52 सीटों पर सिमट गई. हार के कारणों पर विचार के लिए शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई. लेकिन ये हार के कारण दूर करने कम, राहुल गांधी का कवच बनने की एक्सरसाइज ज्यादा बन गई. सुबह से खबर फैली कि राहुल गांधी इस्तीफा देने वाले हैं. फिर वही हुआ, जो कांग्रेस में होता है. कांग्रेस प्रेमी मीडिया ने अंदर की खबरों का अंबार लगा दिया. जैसे, राहुल को मनाने की कोशिशें. कैसे प्रियंका पहुंचीं. कैसे सोनिया गांधी ने दो बार राहुल के साथ मीटिंग करके समझाया कि वह सार्वजनिक रूप से इस्तीफा न दें. मनमोहन सिंह भी इस काम में लगे. आखिरकार वह हुआ, जो होना था. राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देने की जिद छोड़ दी. कार्यसमिति की बैठक का हाल सुनिए. राहुल गांधी ने इस्तीफा देने की बात कही भी नहीं थी कि हर सदस्य मनुहार पर उतर आया. इस्तीफा मत दीजिए. आप अध्यक्ष नहीं रहेंगे, तो कौन होगा. हमारा क्या होगा. जेल के दरवाजे पर खड़े पी. चिदंबरम की सुनिए-आपने अगर इस्तीफा दे दिया, तो तमिलनाडु का पार्टी कैडर तो आत्महत्या कर लेगा. राहुल गांधी तुनके रहे. उन्होंने रूठे बच्चे की तरह कहा-मुझे नहीं रहना अध्यक्ष. प्रियंका को भी बीच में मत लाइएगा. किसी नॉन गांधी को अध्यक्ष बना लीजिए. बैठक का अंत भी वही हुआ, जैसा तय था. राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया और वह फिर भी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. प्रेस कान्फ्रेंस में इस्तीफे के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यह मेरे और कांग्रेस कार्यसमिति के बीच का मामला है.
राहुल ने उठाए नेताओं के बेटों पर सवाल
जिस नेता के नेतृत्व में पार्टी बार-बार हार रही है. ऐतिहासिक पराभव को प्राप्त हो गई है. मुख्य विपक्षी दल तक नहीं रह गई है. उस नेता को अपना नेता बनाए रखने के पीछे क्या मजबूरी हो सकती है. इसे समझने के लिए आपको एक कांग्रेसी मानसिकता के हवाले होना पड़ेगा. कैसे सोचना होगा, इसे समझने के लिए यह उदाहरण काफी होगा. अपनी माता से विरासत में पार्टी अध्यक्ष का पद पाने वाले राहुल गांधी बैठक में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ से नाराज थे. शिकायत ये कि दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने अपने बेटों को टिकट दिलाने और चुनाव जिताने में ज्यादा जोर लगाया. एक परिवार का बेटा होने के कारण पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना शख्स अपने ही नेताओं पर बेटों को आगे बढ़ाने के लिए नाराज हो सकता है, यह कांग्रेस में ही संभव है. कांग्रेस पार्टी के नेहरूकरण के बाद लाल बहादुर शास्त्री वाले थोड़े से वक्त को यदि छोड़ दें, तो पार्टी गांधी परिवार के हाथ में रही है. सीताराम केसरी ने खड़े होने की कोशिश की थी, तो उनका हश्र सबको पता है. एक लंबे कालखंड में दमदार विपक्ष के अभाव में एक परिवार के नाम पर पार्टी की नैया पार लगती रही. लेकिन ज्यों ही कोई दमदार चुनौती आई, कांग्रेस की नैया डगमगा गई. इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ जब गुस्सा फूटा, तो परिवार का नाम भी कांग्रेस को नहीं बचा सका. बोफोर्स के बहाने कांग्रेसी भ्रष्टाचार के खिलाफ जब जनादेश आया, तो परिवार नहीं बचा सका. अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में कद्दावर चुनौती आई, तो कांग्रेस का बेड़ा पार परिवार नहीं कर सका. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी दो बार कांग्रेस को धूल चटा चुकी है. फिर क्यों, एक परिवार के साए से कांग्रेस के नेता बाहर नहीं निकलना चाहते. असल में कांग्रेस परजीवी नेताओं की पार्टी है. एक परिवार से निकटता, एक परिवार के नाम पर जिन नेताओं की राजनीतिक दुकानें चल रही हैं, वह कैसे किसी नॉन गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बन जाने देंगे.
तो क्या आ सकता है रिमोट अध्यक्ष
कांग्रेस में परिवार कोटरी को एक बात बिल्कुल रास नहीं आ रही. हर चुनाव के बाद हार का जिम्मा राहुल गांधी पर आ जाता है. पार्टी अध्यक्ष हैं, हर अच्छे-बुरे के लिए वह जिम्मेदार हैं. इसके लिए नया फार्मूला तलाशा जा रहा है. एक तीर से दो शिकार की रणनीति. कांग्रेस पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दस साल तक मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर रिमोट से सरकार चलाई. सब कुछ सोनिया गांधी की मरजी से होता था, लेकिन घोटालों के दाग और सरकार की नाकामी का ठीकरा मनमोहन सिंह के सिर पर फूटा. कोई बहुत ताज्जुब नहीं होगा कि कांग्रेस पार्टी में रिमोट अध्यक्ष आ जाए. राहुल गांधी के बारे में कांग्रेसी मीडिया का दावा है कि वह इस्तीफे पर अड़े हुए हैं. उनका इस्तीफा स्वीकार कर एक रिमोट अध्यक्ष की स्थापना हो सकती है. ऐसी स्थिति में हर हार के बाद की जिम्मेदारी से राहुल गांधी बच जाएंगे. साथ ही कांग्रेस के ऊपर एक ही परिवार की जागीर होने का ठप्पा भी हट जाएगा. लेकिन अब जमाना बदल चुका है. ये नया भारत है. यह सब देखता है, समझता है.