मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा की विनम्र, विराट विजय
   दिनांक 27-मई-2019
जातिवाद, विभाजक, विद्वेषी राजनीति को नकारकर जनता ने विकास की राह पर बढ़ते भारत में फिर जताया विश्वास. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग ने लोकसभा चुनाव जीतकर दर्ज किया इतिहास।कुनबे और कोटरियों में पलने वाली राजनीति को जनता ने सिरे किया परास्त
विजय के बाद भाजपा मुख्यालय में यूं हुआ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपाध्यक्ष अमित शाह का अभिनंदन
इस चुनाव में क्या हुआ, यह देखना है तो नीचे जमीन पर औंधी पड़ी कुछ निशानियों, कुछ कारकों पर नजर जमाना जरूरी होगा। जब आप लोकतंत्र के कदमों पर धूल चाट रहे इन प्रतीकों को देखेंगे तो उनमें एक से एक धुरंधर दिखेंगे। नफरत की खेती से सियासी ढांचा खड़ा करने के मंसूबे, हिंदू असहिष्णुता और तथाकथित उग्र हिंदुत्व के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया विमर्श, उग्र राष्ट्रीयता को देश के टुकड़े करने की कुंजी बताने वाले कुतर्क, भारतीय व्यवस्था से देशद्रोह का कानून समाप्त कर इसे टुकड़े-टुकड़े करने वालों को कानूनी संरक्षण देने का कुचक्र, कश्मीर में चंद ‘भटके हुए लोगों’ के पत्थरों और उनकी गोलियों से बलिदान हो रहे जवानों के सीने से अफ्स्पा का कवच हटाने का ऐलान... देश को बांटने वाले ऐसे तमाम अस्त्र-शस्त्रों को जनमत ने अपने पैरों पर ला पटका है।
इन नतीजों ने लोगों, राजनीतिक दलों, वैचारिक गुट-लामबंदियों में झुंझलाहट की स्थिति उत्पन्न की है, जो सरकार के काम पर चर्चा करने की बजाय भाजपा के नाम से खीझे बैठे थे और 'कामदार' को पानी पी-पीकर कोस रहे थे। साथ ही देश का वह बहुमत इस जनादेश से झूम रहा है जिसे गत पांच वर्ष के दौरान भाजपा की अगुवाई और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राजग का राज संप्रग शासन की तुलना में प्रशासनिक तौर पर ज्यादा चुस्त, ज्यादा पारदर्शी और राहत भरा लगता रहा। किन्तु इन पालेबंदियों और भंगिमाओं से इतर भविष्य के वे संकेत हैं जो इन चुनावों से हमें प्राप्त हुए हैं।
ये नतीजे सदियों से लगातार कुचले गए भारत के आत्मविश्वास की जीत हैं। इनमें आप भारत की उस अभारतीय अवधारणा की हार को भी देख सकते हैं जिसे जबरन दशकों तक इस देश पर थोपा गया। परिणाम बताते हैं कि औपनिवेशिक सोच की जकड़न को उतार फेंकने के लिए यह देश तैयार हो रहा है। सर्व समावेशी हिंदू दर्शन को ’उग्र हिंदुत्व’ के तौर पर प्रचारित करने और इसके नाम पर बाकी समाज में भय भरने वाली हिंदू फोबिक लामबंदी की यह हार है। इन नतीजों से देश के सांस्कृतिक संदर्भ दोबारा ताजा हुए हैं, उन पर विमर्श खड़े हुए हैं, साथ ही ये इस मामले में भी खास हैं, कि इन चुनावों में हर राजनीतिक दल अपने आप को हिंदुत्व के ‘फ्रेम’ में पुन:परिभाषित करता हुआ दिखाई दिया। केरल में मुस्लिम लीग से गठबंधन के बावजूद कांग्रेस का इस्लामी झंडे से परहेज और उत्तर प्रदेश में अफजाल अंसारी का रैलियों में मुसलमानों से टोपी न लगाने का आग्रह, रोजा इफ्तार में डूब जाने वाले दलों का मुस्लिमों से दूरी बनाना, इससे जुड़े कुछ संदर्भ हैं।
यह चुनाव इसलिए भी भारतीय इतिहास में दर्ज किया जाएगा, क्योंकि जाति पर आधारित गठबंधन, कुनबे और कोटरी पर पलने वाली राजनीति या लैंगिक भाषाई और क्षेत्रीय मतभेदों पर पलने वाले राजनीतिक स्वार्थ इस चुनाव में शांत और पस्त देखे गए। यानी समाज ने विभाजक- विद्वेषी राजनीति के खांचे में बंटने के बजाय विकास और समरसता की राजनीति का रुख किया है। कहा जा सकता है कि जातिवाद से लड़ने का गांधी-आंबेडकर का सपना इस चुनाव में जीता है।
चुनाव को ‘मोदी’ बनाम अन्य का नाम दिया जा रहा था। ‘अन्य’ का अर्थ ही था कि मिलकर ताल ठोक रहे और पसीने-पसीने होते गुट जानते थे कि अकेले अपने दम पर चुनौती देने की क्षमता उनमें से किसी की नहीं थी। इसमें भी कांग्रेस को यह बात हैरान-परेशान कर रही थी कि गैर कांग्रेसी राजनीति का कोई चेहरा अभूतपूर्व स्तर पर जनादेश के आकर्षण का केंद्र बिंदु बना। किंतु भाजपा में व्यक्ति और संगठन की शक्ति को द्विगुणित करने वाला, इस दल की दृढ़ता और जिजीविषा को अभिव्यक्त करने वाला सूत्र समझे बिना बात नहीं बनती। पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा के शलाकापुरुष अटल बिहारी वाजपेयी यह सूत्र गुनगुनाते भी थे- ‘‘ना हार में न जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं..’’
 
भाजपा को अभूतपूर्व बहुमत की खुशी मानते भाजपा कार्यकर्र्ता 
यह पंक्ति हर चुनावी प्रदर्शन के बाद अडिग, परिश्रमी वैचारिक, विनम्र बने रहने का संबल हैं। गौर कीजिए, हार या जीत, भाजपा का कार्यकर्ता, उसका ठोस मतदाता अपनी जगह कभी नहीं छोड़ता। यह बात चुनाव दर चुनाव बार-बार साबित हुई है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद अपना मत प्रतिशत बनाए रखना, बिहार में हार के बीच भी प्रदर्शन का स्तर बनाए रखना इसके कुछ उदाहरण हैं। ‘मोदी फैक्टर’ ने भाजपा के ठोस वोट बैंक के इर्द-गिर्द एक से ज्यादा नई पर्तें जमाने, नई जगहों पर कमल खिलाने का काम नि:संदेह किया है।
कुछ लोगों को यह आपत्ति भी रही कि राष्ट्रवाद का मुद्दा आगे करते हुए भाजपा ने अन्य महत्व के मुद्दों को घुमा दिया, किंतु यह बात सच नहीं है। भाजपा अपने विकास कार्यों के जिन ठोस आंकड़ों के साथ इस मतदान में आई और अंतिम रैली तक उसने अपनी विकास योजना के तथ्य लोगों के मध्य रखे, वह नि:संदेह देश के लोगों के दैनंदिन जीवन से जुड़े और उन्हें राहत पहुंचाने वाले काम हैं। यह जीत इंडिया शाइनिंग के दौर के प्रचार और परिणाम से अलग इसलिए भी गिनी जानी चाहिए क्योंकि तब स्वर्णिम चतुर्भुज से लेकर बुनियादी ढांचे पर जो काम किए गए थे, उनका सीधा असर जनता ने अपने जीवन पर अनुभव नहीं किया था। महत्वपूर्ण होने पर भी स्वर्णिम चतुर्भुज और आयुष या ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ योजनाओं की तुलना करेंगे तो पाएंगे किस सरकार में लोगों ने अपने जीवन में ज्यादा बड़े स्तर पर सार्थक क्रांतिकारी बदलाव अनुभव किया है। रही बात राष्ट्रवाद के मुद्दे की तो यह कहना जरूरी है कि निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव भी स्थानीय मुद्दों पर लड़े जा सकते हैं, परंतु लोगों को तंत्र से जोड़ने वाला सबसे बड़ा चुनाव उस राष्ट्र की भावना से दूर नहीं किया जा सकता, जिसके लिए लोकतंत्र की कल्पना की गई है। राष्ट्र केवल आबादी, भूगोल और शासन व्यवस्था से नहीं बनते, इन्हें परस्पर जोड़ने वाला भाव ही राष्ट्र भाव है। इसलिए यदि चुनाव में जनता देश से अपने जुड़ाव को महसूस करती है तो यह देश और लोकतंत्र के लिए स्वस्थ सकारात्मक जुड़ाव कहा जाएगा और इससे बचने या परहेज करने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
वामदलों का हाशिए पर जाना, बंगाल से वाम राजनीति का समूल नाश होना, त्रिपुरा से भाजपा द्वारा उसे बुहार दिया जाना और केरल में अरसे से गहरे जमे कांग्रेस-वाम गठबंधन समीकरणों में हिंदुत्व और राष्ट्रभाव का विस्तार विश्लेषण की अपेक्षा रखता है। इसे वामपंथी नकारात्मक एजेंडे पर सकारात्मक राष्ट्रीय एजेंडे की बढ़त के तौर पर देखा जा सकता है।
 कार्यकर्ताओं का अभिवानदन स्वीकारते प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपाध्यक्ष अमित शाह 
मुस्लिम तुष्टीकरण और कट्टरवाद की हार इस चुनाव में हुई है। यह बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक के चुनावों में दिखाई देती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री का यह मासूम बयान कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिले और यह कांग्रेस को चले गए, ये भी इंगित करता है कि इनकी प्रगतिशील राजनीति में मजहबी खाते में बंधे मुस्लिम वोटों को सहज स्वीकार्य और पूरी तरह सेकुलर मान लिया गया है। क्या वास्तव में यह वोट बैंक ऐसा ही है! क्या राजनीति मुस्लिम वोट बैंक के साथ वास्तव में सेकुलर बर्ताव ही करती है! और इस बर्ताव का वह क्या लाभ लेना चाहती है, यह भी इस चुनाव का एक विश्लेषण बिंदु है। समग्र आकलन के अतिरिक्त लोकसभा चुनाव के परिणाम राज्य स्तर पर भी कुछ संदेश देते हैं।
फासीवादी ममता, बंगाल का जंगल महल मॉडल
बिहार-उत्तर प्रदेश राजनीतिक तौर पर बदनाम ज्यादा हैं, किंतु सचाई यह है कि बंगाल की बदहाली की चिंता कभी मीडिया और राजनीतिक दलों ने नहीं की। वाम दलों की हिंसा तले कराहते और 20,000 से ज्यादा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की जान लेने वाला राज तो ममता बनर्जी ने बदला किंतु तृणमूल के शासन में वही हिंसक रास्ता अपनाया गया, जिसे ममता पहले सदा कोसती रही थी। पंचायत चुनावों में 80 से ज्यादा हत्याओं की बात सामने आई थीं। इस बार भी दुर्भाग्य से यह राज्य 40 से ज्यादा हत्याओं का साक्षी रहा। बर्दवान हो या झाड़ग्राम, नृशंस हत्याएं हुर्इं। भाजपा कार्यकर्ताओं को मारकर, गांव-टोले के बाहर उनके शव लटका दिए गए। परंतु दुर्गाग्य से मीडिया या राजनीतिक दलों ने इस पर जिस तरह चुप्पी साधी, उस चुप्पी में लोकतंत्र के लिए बड़े खतरों की आहट को सुना जा सकता है। बंगाल में हर चरण में शेष देश के मुकाबले सबसे ज्यादा मतदान हुआ, फिर भी यह पिछली बार से कम है। ऐसे में पिछली बार के मतदान की सत्यता को लेकर भी सवाल बंगाल के समाज में उठ रहे हैं। लोगों को धमकाने के लिए क्रूर राजनीति का खुलकर ऐलान करने के लिए, फासीवादी ममता का चेहरा सामने लाने के लिए भी इस चुनाव को याद किया जाएगा। बंगाल का जनादेश बड़ा और स्पष्ट है। जनता ने बता दिया कि भारत में आने वाले मुस्लिम घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने और उनके लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए अपनाई जा रही ममता की नीतियां उसे पसंद नहीं।
किंतु बंगाल के चुनाव की बात निर्वाचन आयोग को इस राज्य के लिए विशेष बधाई दिए बगैर पूरी नहीं होगी क्योंकि कुछ लोगों ने सात चरण के चुनाव को बहुत लंबा, उबाऊ और अनावश्यक बताया था। हर चरण में बंगाल में हुई हिंसा और हर चरण के साथ चुनाव आयोग का ध्यान बताता है कि आयोग ने जो निर्णय लिया था, उसे बंगाल ने सही साबित किया है।
पूर्वात्तर का विकास तथा शरणार्थी और घुसपैठिए में अंतर
‘लुक ईस्ट, एक्ट ईस्ट’ की नीति पर काम करते हुए गत पांच वर्ष में पूर्वोत्तर राज्यों के प्रति उपेक्षा, उनींदापन टूटा है, यह बात इन राज्यों को उत्साहित करती है। हर माह दो केंद्रीय मंत्रियों का दौरा इन राज्यों के विकास कार्यों पर नजर रखने के लिए तय किया गया है। इन राज्यों के विकास में आर्थिक अड़चनें न आएं, इसलिए विशेष कोष प्रबंधन कार्य भी राजग शासन में हुए। ब्रह्मपुत्र पर चिरप्रतीक्षित विशाल अनूठे पुल से लेकर छोटी सड़कों और बड़े राजमार्गों पर जिस तेजी से हाल के वर्षों में काम हुआ है, उसने यहां के लोगों को राहत दी है तथा क्षेत्र में असंतोष का ताप घटाया है।
खास बात यह कि डोकलाम विवाद के दौरान अरुणाचल-सिक्किम के लोगों ने चीन के सामने भारतीय शासन की जिस दृढ़ता को अनुभव किया, उससे इस क्षेत्र को बांधे रखने वाला राष्ट्रभाव और मजबूत हुआ है। साथ ही असम-त्रिपुरा सहित इस क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने वाले घुसपैठियों के मुद्दों पर भाजपा की स्पष्टता ने जनसमर्थन पाया है। नागरिकता संशोधन विधेयक पर भाजपा जिस सैद्धांतिक दृढ़ता के साथ खड़ी रही, वैसा उदाहरण भारतीय राजनीति में सरलता से नहीं मिलता। घुसपैठियों और शरणार्थियों में स्पष्ट अंतर करते हुए भाजपा ने यह बात जिस तरह पूर्वोत्तर में जनता के सामने रखी, वह एक बड़ा कदम था। देश का नागरिक कौन और देश के संसाधन पर किसका अधिकार, इसकी बात करने वाली भाजपा ने लोगों को बताया कि कैसे बाहर से आ रही इस बाढ़ में देश की सुरक्षा को बहा ले जाने की ताकत है और कैसे यह सैलाब पूरे इलाके में नफरत की फसल के लहलहाने के लिए सारी अनुकूल स्थितियां पैदा करता है। लेकिन खास धारा के बुद्धिजीवियों से लेकर घुसपैठी मुसलमानों के एक-एक वोट को गिनकर राजनीति की अपनी दुकान चमकाने वाली पार्टियां नागरिकता संशोधन विधेयक को देश तोड़ने वाला कदम बताने में जुटी थीं। लोग मुसलमानों को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे थे। इन्हीं उद्देश्यों के लिए देश के इस कोने में नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ उग्र प्रदर्शन कराए गए, आगजनी कराई गई। विरोध की वे घटनाएं उन तत्वों की चिंता का परिणाम थीं, जिन्हें अपनी सियासी जमीन के खिसकने का डर सताने लगा था। नागरिकता संशोधन विधेयक पर एक सोचा-समझा विवाद खड़ा किया गया। इसी का नतीजा था, विरोध-आगजनी-प्रदर्शन की ये घटनाएं पूरे देश में सुर्खियां बनीं और रिले रेस की तरह बैटन एक से दूसरे हाथों में बढ़ाते हुए ‘भारत तोड़ो ब्रिगेड’ देश के टुकड़े करने के मंसूबे पाले दौड़ पड़ी।
जनमत को गिनती में देखा जाता है और इस कारण इसे किसी की हार तो किसी की जीत के संदर्भ में तौला जाता है, लेकिन इस बार का यह चुनाव किसी भी पार्टी की हार-जीत से ज्यादा इस लिहाज से जरूरी था क्योंकि यह बैरोमीटर था यह जानने का कि इलाके के लोगों ने नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे को देश के लिए कितना बड़ा खतरा समझा और क्या भाजपा नीत राजग सरकार इस खतरे के प्रति लोगों को जागरूक कर पाई? यह एक ऐसा मुकाम था, जहां एक छोटी सी भूल भारत तोड़ने वाली ताकतों के इरादों को बुलंद कर देती। पूर्वोत्तर के नतीजे बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं कि लोग सीमा पार से आ रहे मुसलमान घुसपैठियों के कारण देश के साथ-साथ समाज की संरचना को होने वाले नुकसान के प्रति संवेदनशील हैं। लोगों को अंदाजा है कि देशहित के इस मुद्दे पर कौन और क्यों सियासत कर रहा है। जनादेश और क्षेत्रीय आकांक्षाआें का राष्ट्रीय हितों के साथ कदमताल पूर्वोत्तर की परिपक्वता का परिचायक है।
दक्षिण के समीकरण
केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि दक्षिण के राज्यों में राजनीतिक समीकरण सदा से अलग रहे हैं। परंतु इस पूरी पट्टी में इस चुनाव के दौरान मिशनरी छटपटाहट सतह पर थी। राजनीति चलाने की चर्च की इच्छा और परिचय लोगों के मध्य चर्चा का विषय बने थे। हैरानी की बात है कि सेकुलर राजनीति का दम भरने वाले किसी खेमे से इसके विरोध में कोई आवाज नहीं उठी। कर्नाटक नतीजों ने विधानसभा चुनाव में बने कांग्रेस-जेडीएस मौकापरस्त गठबंधन के सामाजिक आधार के खोखले होने की ही पुष्टि की। साथ ही कर्नाटक के नतीजे यह साफ कर देते हैं कि मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदुओं को खांचों में बांटकर सियासी उल्लू सीधा करने की रणनीति लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं। पिछले चुनाव में कांग्रेस-जेडीएस को प्राथमिकता देने वाला मतदाता अगर इतना निष्ठुर होकर व्यवहार करे तो यह कांग्रेस गठबंधन के लिए बेशक सावधान होने की बात हो, लेकिन यह इस तरह से सकारात्मक है कि देश को बांटने वाली कोशिशों का प्रतिकार हो रहा है। शैव और लिंगायत के बीच फांस पैदाकर हिंदुओं को ठेस पहुंचाने वाली राजनीति का, हिन्दू विरोधी टीपू को महानायक बनाने की जिद पाले बैठी राजनीति का इस सूबे में परास्त होना अच्छी बात है।
तमिलनाडु में भाजपा नहीं है, क्योंकि थी भी नहीं। किन्तु यह सच है कि चुनाव में भाजपा के कारण एआईएडीएमके का क्षरण रुका है। जयललिता और करुणानिधि के अवसान के कारण पहले यह लगा था कि तमिलनाडु की राजनीति दिशाहीन और बेलगाम हो सकती है। बाद में डीएमके नेता स्टालिन के नेतृत्व में लोगों ने इसका एक सिरा ढूंढ लिया किंतु एआईएडीएमके के तीन हिस्से हो जाने पर आशंकाओं के बादल गहरा गए थे। निश्चित ही भाजपा ने उस बिखराव को रोकते हुए तमिलनाडु की राजनीति में एक नया ध्रुव खड़ा किया है। पहले कहा गया था कि द्रमुक को सभी सीटें मिल सकती हैं परंतु परिणाम बता रहे हैं की तमिलनाडु की राजनीति उस तरह एक ध्रुवीय नहीं बन सकी जैसा कि वाम विश्लेषकों का अनुमान था। केरल में वाम का क्षय, भाजपा का वोट बढ़ना और सबरीमाला मुद्दा विश्लेषण की अपेक्षा रखता है। हमें यह जानना चाहिए कि केरल में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच जिस तरह बारी-बारी सत्ता परिवर्तन होता रहा है, उसमें राष्ट्रीय आग्रहों और सबरीमाला जैसे मुद्दे ने नए समीकरण पैदा किए हैं। यूडीएफ यानी कांग्रेस नीत गठबंधन इस राज्य में ईसाई मुस्लिम वोट लेता रहा है और एलडीएफ यानी वामदलों का आधार हिंदू वोटों के जातिगत समीकरण पर टिका होता है। इस बार वाम समीकरणों में भारी सेंध लगी है।
आंध्र को जगन पसंद है
चंद्रबाबू नायडू के राजद से रूठने- छिटकने के कारण क्या थे, यह अब छिपी हुई बात नहीं है। राज्य की राजनीति में तेलुगु देशम पार्टी के आधार में लगातार छीजन इसका बड़ा कारण थी। तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान संप्रग के अघोषित संयोजक की भूमिका निभाते चंद्रबाबू नायडू आंध्र और तेलंगाना दोनों ही राज्यों में गठबंधन की आकांक्षाओं पर पानी फेरने वाले ही साबित हुए, यह बात रेखांकित करने वाली है। नतीजे बताते हैं कि आंध्र में चंद्रबाबू नायडू या बंगाल में ममता बनर्जी ‘एंटी फेडरल पॉलिटिक्स’ यानी भारतीय संघवाद पर हमला करने वाले को जनता स्वीकार नहीं कर रही, इसलिए यह एंटी फेडरल पॉलिटिक्स की हार भी कही जा सकती है। राष्ट्रीय एकात्मता को नकारने वाले दल और नेता जनता को स्वीकार नहीं। जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व में जनता नए राजनीतिक विकल्पों को आजमाना चाहती है, उसे मौका देना चाहती है, यह बात साफ हो गई है। वैसे भी, वाईएसआर के बेटे जगन के साथ लोगों की सहानुभूति रही है और उनके उत्थान के लिए कांग्रेस को अपनी ही पीठ ठोकनी चाहिए। अपने खेमे के लोगों पर अविश्वास करने की प्रवृत्ति और क्षेत्रीय क्षत्रपों के कद को उसी डर के कारण समय-समय पर काटने-छांटने की कांग्रेसी नीति का ही नतीजा है कि जगन जैसे विद्रोही खड़े हुए। लोगों ने जिस तरह जगन का समर्थन किया, उससे साफ है कि उन्हें इस तरह की नीति से विरोध है।
तेलंगाना नया राज्य है और उसका कोई लंबा राजनीतिक इतिहास नहीं है, इसलिए चुनाव के परिणामों के विश्लेषण का एक ही दृष्टिकोण बनता है, टीआरएस ने अपनी कितनी जमीन किन आधार पर बचाई और भाजपा ने क्यों और कैसे इसमें सेंध लगाई। नतीजों से स्पष्ट है कि लोगों ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मतदान किया, जिसकी वजह से भाजपा के हिस्से अच्छी-खासी जमीन आई। लेकिन इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि बेशक लोकसभा के लिए ही सही, जब किसी राज्य का मतदाता उस प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के अलावा किसी और को चुनता है तो उसके साथ यह अघोषित सी चेतावनी भी नत्थी होती है कि अगर राज्य के लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हुईं तो विधानसभा में समर्थन का स्वरूप कुछ और हो सकता है। तेलंगाना में ऐसा ही हुआ है।
महाराष्ट्र- प्रायोजित आंदोलन का हवाई किला ढहा
महाराष्ट्र में किसान आंदोलन, भीमा कोरेगांव और ‘दलितों’-वंचितों के नाम पर प्रायोजित आंदोलन पंचर हो गए। राष्ट्रीय विमर्श को हिंसक आक्रोश में धकेलने वाली साजिशों का जवाब देने वाला राज्य बना है महाराष्ट्र। आंदोलनों को जनज्वार के तौर पर पेश करके जनमत को प्रभावित करने का विपक्षी मंसूबा पूरा नहीं हो सका। कांग्रेस और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के गठजोड़ को ‘एक्सट्रा प्लेयर’ राज ठाकरे से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें थीं। उन्हें लग रहा था कि खुद को बालासाहब ठाकरे का उत्तराधिकार मानने वाला उनका भतीजा शिवसेना के वोट में सेंध लगाकर उसे कांग्रेस-राकांपा के खेमे की ओर मोड़ने में सहायक होगा। अंग्रेजों की बांटो और राज करो को अपनी कार्यशैली का मूलमंत्र मानने वाली ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ को साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी से भोपाल में नुक्सान और महाराष्ट्र में फायदे की उम्मीदें थीं। उसे लग रहा था कि भोपाल में उसे प्रत्याशी बनाने को मुद्दा बनाते हुए महाराष्टÑ के मुस्लिम वोट एकजुट किए जा सकते हैं। यह उसके पक्ष में तो आएगा ही, ‘हिंदू आतंकवाद’ की उलटबांसी पर भरोसा करने वाले हिंदू वोटरों का भी उसे साथ मिलेगा और इस तरह महाराष्ट्र में उसकी सियासी नईया पार लग जाएगी। लेकिन इस खेमे का अंदाजा गड़बड़ा गया है और लोगों ने साफ कर दिया है कि वे इन दलों की सियासी बिसात के मोहरे नहीं हैं। महाराष्ट्र का परिणाम लोगों की दृढ़ता और राष्ट्र-राज्य-समाज के प्रति उनकी प्राथमिकताओं को साफ कर देता है।
खोई जमीन पाना मुमकिन है
हाल ही में कांग्रेस के खाते में गए छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान ने बता दिया कि जब बात देश की हो तो उनके लिए प्राथमिकता क्या है। इन राज्यों के चुनाव परिणाम जैसे बता रहे हैं कि यहां के लोग प्रायश्चित कर रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को मौका दे दिया। विधानसभा चुनाव के बाद इन राज्यों से आ रही रिपोर्ट इस ओर इशारा कर रही थीं कि लोगों को गहरा झटका लगा है कि उनके कारण नतीजे उलट गए। इस कारण अंदाजा था कि लोग अपनी गलती को सुधारने के इरादे से लोकसभा चुनावों में वोट करेंगे और नतीजों को देखकर ऐसा ही लग रहा है। राजस्थान और मध्य प्रदेश तो जैसे अपनी गलती की मुनादी टीले पर चढ़कर कर रहे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में एससी-एसटी विधेयक की पृष्ठभूमि में उपजे आक्रोश के चलते लोगों ने जमकर नोटा का बटन दबाया था परंतु जो नतीजे हैं, वह बता रहे हैं कि नोटा दरअसल खोटा होता है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के परिणाम एक और आकलन की मांग रखते हैं की विधानसभा में किसी अन्य पार्टी को जिताने वाले लोग लोकसभा में किसी और को चुन रहे हैं यानी कांग्रेस किसी तरह चल भी जाए, देश का नेतृत्व राहुल के हाथ में जाए, यह बात जनता को मंजूर नहीं।
मध्य प्रदेश में उगाही और झूठे वादों की राजनीति चार माह में ही पस्त होती दिखती है और ऐसे में बहुमत की पतली रस्सी पर चलने की बाजीगरी करने वाली सरकार कितने दिन तक चलती है, यह अपने आप में देखने वाली बात होगी। राज्य के तमाम विधायक कांग्रेस से पल्ला छुड़ाने को बेताब हैं और आने वाले समय में कमलनाथ के लिए वाकई मुश्किल दिन साबित होने वाले हैं।
ओडिशा में भाजपा की पैठ
राजनीतिक नक्शे पर देखें तो एक और राज्य कांग्रेस मुक्त हुआ। बदहाली प्रशासनिक सुस्ती और 19 बरस की राजनीतिक एकरसता तोड़कर नया उभरता ओडिशा इन चुनाव परिणामों में हमें दिखता है। यहां लोकसभा और विधानसभा में विभाजित जनता का प्यार बताता है कि उन्हें नवीन बाबू की राजनीति चाहिए किन्तु मंथर गति अब नहीं चलेगी। उन्हें राज्य की आशाओं को तेज रफ्तार से राष्ट्रमार्ग पर भी ले जाना होगा।
मिल गया उत्तर !
उत्तर प्रदेश में भाजपा के खराब प्रदर्शन की आस में सपनों का महल खड़ा करने वाले बुआ-बबुआ और बुजुर्ग पार्टी के ‘ऐंग्री यंग अध्यक्ष’ की उम्मीदें धराशाई हो गईं। और तो और, कांग्रेस ‘वोटकटवा’ ही साबित हुई और उसने एक तरह से अपने ही पाले में खड़े पहलवानों कै पैरों के नीचे से दरी खींचने में हाथ बंटाया। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को जातीय-मजहबी खांचों में देखकर समीकरण बैठाने वालों को लोगों ने बता दिया कि उनके लिए क्या अहम है और खौफ की दुकान पर तथाकथित अमन बेचने की जुगत कर रहे तत्वों की असलियत उन्हें पता है। उत्तर प्रदेश के इन नतीजों का आकलन करने के साथ ही 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनावों का वोट प्रतिशत और भाजपा के प्रदर्शन पर हमें नजर जरूर रखनी चाहिए। लगातार बढ़ते कदम बताते हैं कि भाजपा का रुतबा बढ़ा है, उसकी नीतियों के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है। लोगों को महसूस होता है कि और कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निरा योगी ही समझ लिया था और उनकी प्रशासनिक सूझ-पकड़ की चर्चा ही नहीं की गई। यह प्रचारित किया गया की जाति और जातिगत लामबंदी के कारण भाजपा के लिए उम्मीदें कम हैं क्योंकि वह चंद चेहरों की पिछलग्गू है। यह गढ़ा गया झूठ है जो पूरी जाति को मूढ़ और उनके नेतृत्व को चतुर साबित करता है। 4जी के दौर में सिर्फ ‘नेताजी’ के आभामंडल का झूठ टिकता नहीं दिखता। उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा जैसी व्यक्ति और परिवार केंद्रित राजनीति का प्रदर्शन बताता है कि जनता जाग रही है और विकास का मुद्दा जातिवाद को हराने में सक्षम है।
बिहार गठबंधन और गफलत की जो कहानी बिहार में दिखती है उसने साफ कर दिया की जाति को अपनी पूंजी मान बैठे लोगों का भ्रम तोड़ने में यह प्रांत सक्षम है। बिहार जाति से आगे बढ़ गया है। यह इस चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रतीत होती है। गठबंधनों के प्रदर्शन में गड़बड़ी का एक मुख्य कारक यह भी रहा कि कुनबा राजनीति के लट्टू जिस कील पर घूम रहे थे उस कुनबे में भी पर्याप्त मतभेद थे। उत्तर प्रदेश में चाचा-भतीजा संग्राम का दूसरा चरण और बिहार में लालू प्रसाद यादव के कुनबे की कलह कथा इन दलों की राजनीति का दायरा और कमजोरियां दोनों बताती हैं।
दलदल से निकली दिल्ली
छल और नकारात्मकता की राजनीति का पटाक्षेप लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, दिल्ली नगर निगम के चुनाव और राजौरी गार्डन उपचुनाव के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन देखिए तो आपको पता चलेगा परिवर्तन के नाम पर उठी लहर वास्तव में बुलबुला बनकर रह गई है और यह क्षुद्र व्यक्तिगत आकांक्षाओं दोहरी कथनी करनी कथा, पारदर्शिता और अहंकार के चलते पैदा हुआ शून्य है। ऐसा जिसे कांग्रेस भी नहीं भर सकी और अब आकांक्षाओं का दारोमदार फिर भाजपा पर ही है।
हर्षित हरियाणा
हरियाणा की राजनीति पर केवल जाट केंद्रित और हद दर्जे तक असंवेदनशील होने का आरोप लगाया जाता था। राज्य ने इस चुनाव में इस मिथक को तोड़ दिया है। तथ्य देखें, भाजपा ने पिछली बार भी जाट उम्मीदवार दिए थे, इस बार भी जाट उम्मीदवार दिए हैं। ऐसे में विपक्ष के जाट हार रहे हैं और भाजपा के जाट जीत रहे हैं, तो इसे किसी जाति की बजाए जाति की राजनीति हार रही है इस तौर पर देखा जाना चाहिए। जाति में बंधने के लिए जाटव तैयार नहीं, हरियाणा अब तैयार नहीं, इसका श्रेय मुख्यमंत्री मनोहरलाल के नेतृत्व में सजग मुस्तैद होते प्रशासन को दिया जाना चाहिए। 55000 लोगों को सरकारी नौकरी, दंगों पर त्वरित कार्यवाही और असामाजिक तत्वों पर नकेल कसते हुए हरियाणा जिस तरह से कदम बढ़ा रहा है तो कहा जा सकता है कि खट्टर जी गुजरात के उस प्रशासनिक मॉडल को हरियाणा में सफलता से लागू कर रहे हैं जिसका ताना-बाना नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए बुना था।
पंजाब-जीती गैर-कांग्रेसी राजनीति
पंजाब में कहा जाए कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की ‘नॉन कांग्रेस पॉलिटिक्स’ की जीत हुई, तो यह गलत नहीं। राज्य में राहुल का प्रतिनिधित्व सिद्धू कर रहे थे तो बालाकोट और पुलवामा के समय राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व कैप्टन अमरिंदर सिंह कर रहे थे। उनके स्वर और भाजपा के बयानों में कोई अंतर नहीं था, इसलिए इसे ‘नॉन कांग्रेस पॉलिटिक्स’ की जीत निश्चित ही कहा जाना चाहिए। विधानसभा चुनाव प्रचार में भी कैप्टन ने राहुल को पंजाब में कोई मौका नहीं दिया था और यह बात समझते हुए राहुल गांधी ने भी पंजाब में रुचि नहीं ली थी। पंजाब में कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन कैप्टन अमरिंदर के बूते था और इस बार के प्रदर्शन में भी इसका श्रेय कांग्रेस के कुनबे की तरफ जाता नहीं दिखता।
जम्मू कश्मीर-राजनीति के नए समीकरण
पीडीपी और खासकर महबूबा मुफ्ती की अनंतनाग से हार जम्मू-कश्मीर की राजनीति में राष्ट्रीय विमर्श की जीत का बड़ा संकेत है। लोगों का पीडीपी को नकारना इस बात पर मुहर है कि महबूबा मुफ्ती का दोहरा रवैया राज्य में उनकी सरकार टूटने का कारण बना। साथ ही लद्दाख को श्रीनगर से अलग डिवीजन बनाते हुए, घाटी से बाहर राज्य की विकास केंद्रित आकांक्षों पर काम करते हुए भाजपा ने विकास और राष्टÑभाव की जो राह गढ़ी है उसपर जम्मू-कश्मीर का भरोसा बना हुआ है। भाजपा ने अपनी सीटें फिर से प्राप्त करने के अलावा भाजपा से नफरत न करने वाले, साथ मिलकर काम करने को तैयार सियासी समीकरणों की जो जमीन तैयार की है भविष्य में वह निश्चित ही फल देगी। अब बात दल विशेष की। अगर कांग्रेस को देखें तो क्षेत्रीय पार्टियों के साथ उसका तालमेल धृतराष्ट्र के उस आलिंगन जैसा रहा जिसमें उसने भीम को मसलकर चूर-चूर करना चाहा था। गठबंधन पर घात लगाने वाली कांग्रेस राहुल गांधी को केरल में वायनाड से चुनाव लड़ने पहुंचा देती है और पूरे देश के नक्शे से गायब हो रहे दम तोड़ते वामपंथ को दो लाठी और लगाने का काम करती है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका वाड्रा चंद्रशेखर रावण से मिलकर नया ध्रुव गढ़ने की कोशिश करती हैं और ‘दलित’ राजनीति कर रहीं मायावती की नींद उड़ा देती हैं। इसके अलावा कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में सपा के मुकाबले बसपा के सामने ज्यादा बड़ी चुनौती खड़ी करने की कोशिश की, उसके सामने कड़े उम्मीदवार उतारे, मसलन देवबंद में इमरान मसूद। मायावती ने इस खेल को समझा और कड़वाहट सतह पर भी आई। जौनपुर में बसपा ने गठबंधन में सीटों के बंटवारे के बावजूद अपना प्रत्याशी घोषित किया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी को रसातल में पहुंचाते हुए कांग्रेस ने फिर यह बात साबित की कि उसके अवचेतन में क्या कुछ चल रहा है। गठबंधन के साथियों के साथ सामंजस्य बैठाते हुए संयुक्त प्रयास को मजबूत करने की जगह कांग्रेस ने अपने भविष्य की घेराबंदी करना ज्यादा जरूरी समझा। वैसे, पार्टी के पचमढ़ी अधिवेशन का स्वर-सार यही तो था!
यानी तब गठबंधन को खुलकर नकारने वाली और अब इन्हें मजबूरी में स्वीकारने वाली कांग्रेस अंतत: शक्ति साझा करने की राजनीति के विरुद्ध है। गठबंधनों को कुचलकर अपना पहले सा कद वर्चस्व फिर हासिल करना ही पार्टी का अघोषित एजेंडा है। (वैसे, हाल में प्रियंका वाड्रा के एक साक्षात्कार में दबे शब्दों में यह बात मुखरित भी हुई है।)
बहरहाल, इन नतीजों में भविष्य के भारत और भारत में अनेक नेताओं के भविष्य के फलादेश कूटबद्ध हैं। जो इन्हें पढ़ लेगा आगे बढ़ सकेगा, बाकियों के लिए कहानी सिर्फ इतनी है कि - जो हुआ सो हुआ!
‘‘यह राष्ट्रीय शक्तियों की विजय है’’
 
श्री भैयाजी जोशी 
लोकसभा चुनाव में राजग को मिली अभूतपूर्व विजय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने कहा कि देश को एक बार पुन: स्थिर सरकार मिली है। यह करोड़ों भारतीयों का भाग्य है। यह राष्ट्रीय शक्तियों की विजय है। लोकतंत्र की इस विजय यात्रा में जिन जिनका योगदान रहा उन सभी का अभिनंदन है। लोकतंत्र का आदर्श विश्व के सम्मुख एक बार पुन: प्रस्तुत हुआ है। उन्होंने कहा कि हम विश्वास व्यक्त करते हैं कि नूतन सरकार जन सामान्य की भाव-भावनाओं के साथ ही इच्छा-आकांक्षाओं को भी पूर्ण करने में सफल सिद्ध होगी। साथ ही सम्पन्न निर्वाचन प्रक्रिया के साथ ही समस्त कटुताएं समाप्त हों और विनम्रता के साथ व्यक्त जन भावनाओं का स्वागत हो।
‘‘विकास के सूत्र को विजयी बनाया’’
 
डॉ. मनमोहन वैद्य 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने लोकसभा चुनाव के निर्णय के बाद कहा कि यह चुनाव भारत की दो भिन्न अवधारणाओं के बीच था। एक तरफ भारत की प्राचीन अध्यात्म आधारित एकात्म (कल्ल३ीॅ१ं’), सर्वांगीण और सर्वसमावेशी जीवनदृष्टि या चिंतन था। जिसे दुनिया में हिन्दू जीवन दृष्टि या हिन्दू चिंतन के नाम से जाना जाता रहा है। दूसरी ओर वह अभारतीय दृष्टि थी जो भारत को अनेक अस्मिताओं में बांट कर देखती रही है। और अपने निहित स्वार्थ के लिए समाज को जाति, भाषा, प्रदेश या उपासना पंथ के नाम पर बांटने का काम करती रही है। इस पृथक करने और बांटने की राजनीति करने वालों ने हमेशा समाज को जोड़ने वाली, एकात्म दृष्टि से देखने वाली शक्ति का विरोध ही किया है। और इस के बारे में तरह-तरह के आधारहीन, झूठे आरोप लगाकर गलतफहमी निर्माण करने का प्रयास किया है। स्वतंत्रता के साथ ही चल रही यह वैचारिक लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर आ पहुंची है। यह चुनाव इस लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। समाज एक होने लगा, तो बांट कर राजनीति करने वालों का धरातल खिसकने लगा। इसलिए सब बांटने वालों ने इकट्ठे आ कर, एक दूसरे का साथ देकर इस जोड़ने वाली शक्ति का सामना करने का प्रयास किया। भारत की सुविज्ञ, बुद्धिमान जनता ने जोड़ने वाले, सर्वसमावेशक भारत का समर्थन कर सभी के विकास के सूत्र को विजयी बनाया है। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत आश्वासक और आनंद का यह दिन है। भारत की जनता इसके लिए बधाई की पात्र है। इस वैचारिक लड़ाई में भारत के पक्ष के मजबूत नेतृत्व का और सभी कार्यकर्ताओ का हार्दिक अभिनंदन।
इन्हें देखना पड़ा हार का मुंह
कन्हैया कुमार, दिग्विजय सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा, शरद यादव, राज बब्बर, राहुल गांधी, जितिन प्रसाद, सलमान खुर्शीद, महबूबा मुफ्ती, शिबू सोरेन, हरीश रावत, मीसा भारती, शीला दीक्षित, अजय माकन, डिम्पल यादव, रघुवंश प्रसाद, कुमारी शैलजा, मल्लिकार्जुन खड़गे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रिया दत्त, मिलिंद देवड़ा, सुशील कुमार शिंदे, मीरा कुमार, एच.डी. देवगौड़ा, माधवेंद्र सिंह, शिवपाल यादव, आरपीएन सिंह, रेणुका चौधरी, उपेंद्र कुशवाह, संजय निरुपम, अशोक चव्हाण, भूपेंद्र हुड्डा, दीपेंद्र हुड्डा, कीर्ति आजाद, इमरान मसूद और अजित सिंह
अधिकतर राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ
नरेंद्र मोदी का जादू गुजरात में साफ दिखाई दिया। भाजपा ने क्लीन स्वीप किया. यहां 26 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की। राजस्थान में भी कांग्रेस खाता नहीं खोल पाई। यहां भाजपा को 25 सीटें मिलीं। हिमाचल प्रदेश में भाजपा ने 4 सीटें जीतीं यहां भी कांग्रेस जीरो पर आउट हो गई। उत्तराखंड की पांचों सीटों पर भाजपा का कब्जा। कांग्रेस को नहीं मिली एक भी सीट। अरुणाचल प्रदेश में भी कांग्रेस को जीरो मिला। यहां भाजपा ने दो सीट जीती। दिल्ली की सभी सात सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की। लेफ्ट के किले को दरका कर विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने त्रिपुरा की 2 लोकसभा सीटों पर भी कब्जा किया। दमन दीव की एकलौती सीट को भाजपा ने अपने नाम किया। मणिपुर में पहली बार कमल खिला है। यहां कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। यहां एनपीएफ और बीजेपी ने एक-एक सीट हासिल की। मिजोरम की एक मात्र सीट को कभी कांग्रेस के पास थी उसे भाजपा के सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट ने जीत लिया। यहां से लाल रोसंगा ने जीत दर्ज की।