क्या लेनिनवादी और मार्क्सवादी होने पर शर्मिन्दा है मार्लेना!
   दिनांक 03-मई-2019

दिल्ली के अंदर व्यवस्था परिवर्तन का हवाला देकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी की लोकसभा चुनाव की उम्मीदवार आतिशी मार्लेना को अपने मार्लेना सरनेम से इतनी शर्मिन्दगी हुई कि उन्होंने वह सरनेम हटा लिया। क्या शर्मिन्दगी की वजह सिर्फ इतनी है कि मार्लेना सरनेम उनके क्रिश्चियन होने का भ्रम पैदा होता है ? क्या आतिशी और उनकी पार्टी यह मानती है कि उनका मतदाता उनके और उनकी पार्टी के पिछले चार साल के काम काज को छोड़कर उनके मार्लेना होने और न होने से तय करेगा कि उन्हें वोट करना है या नहीं करना। यदि इस सोच की वजह से उन्होंने अपने नाम से मार्लेना हटा लिया इसका सीधा सा अर्थ है वह जाति या मजहबी समीकरण के आधार पर चुनाव लड़ना चाहती हैं न कि आम आदमी पार्टी द्वारा किए गए काम को लेकर। यदि क्रिश्चियन नेताओं की बात करें तो कर्नाटक में जन्मे पूर्व भारत के रक्षामंत्री रहे जॉर्ज फर्नाडिस को कौन भूल सकता है। वह महाराष्ट्र में मजदूर संगठन के नेता रहे। उनका नाम पूरी मुम्बई के अंदर चलता था। जॉर्ज जनता दल के महत्वपूर्ण नेताओं में से रहे और समता पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे। समता पार्टी बाद के दिनों में दो दलों में बंट गई। एक बना राष्ट्रीय जनता दल और दूसरी पार्टी का नाम था, जनता दल यूनाइटेड। जॉर्ज जदयू के साथ खड़े हुए। मतलब क्रिश्चियन नेता जॉर्ज दक्षिण भारत से निकल कर महाराष्ट्र आते हैं और फिर बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह सब किसी जाति या मजहबी समीकरण से नहीं हुआ। यह सब संभव हुआ जार्ज के करिश्माई व्यक्तित्व से। जॉर्ज भारत सरकार में रेल मंत्री और रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। उसके बावजूद आतिशी ने अपना सरनेम बदल लिया क्यों ? मार्लेना के इस प्रकरण से कुछ बातें स्पष्ट होती हैं, पहला उनका अपनी मेहनत से विश्वास उठ चुका है। उन्हें लगता है कि वे अब जातीय समीकरण से जीतेंगी। इसलिए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया लिखते हैं कि आतिशी क्रिश्चियन नहीं राजपूत हैं। क्या मार्लेना का देश की पंथ निरपेक्षता से विश्वास उठ चुका है ? ऐसा नहीं होता तो मार्लेना नाम के साथ चुनाव लड़ने में कोई बुराई नहीं थी। तीसरी बात विचारधारा जैसी कोई चीज उनके लिए मायने नहीं रखती। यह बात पूरी आम आदमी पार्टी पर लागू होती है। ऐसी ही कहानी आतिशी मार्लेना की है। जिन्होंने कम्युनिस्ट विचार से प्रेरित होकर क्रिश्चियन नाम से मिलता जुड़ता सरनेम मार्लेना लगाया। बाद में इसके लिए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि मार्क्स का मार और लेनिन का लेना लेकर मार्लेना बना। अब आतिशी अपनी विचारधारा को ताक पर रख कर चुनाव जीतने के लिए आतिशी बन गई हैैं, आतिशी राजपूत। मतलब आम आदमी पार्टी जो देश में व्यवस्था परिवर्तन के सवाल के साथ सत्ता में आई थी। सत्ता में आते ही पार्टी विचार और विचारधारा को ताक पर रख कर जातिवादी और साम्प्रदायिक राजनीति में शामिल हो गई। आतिशी ने अपने एफिडेविट में अपना नाम आतिशी मार्लेना बताया है। जबकि उन्होंने नॉमिनेशन में अपना नाम आतिशी लिखा। अब अपने प्रचार में वे आतिशी नाम का ही इस्तेमाल कर रहीं हैं। अपने कम्युनिस्ट होने पर सार्वजनिक जीवन में आते ही इतनी शर्मिन्दगी आतिशी को है तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार करना चाहिए। 28 अप्रैल को आतिशी ने ट्वीटर पर लिखा— ''मैं पंजाबी हिन्दू परिवार से हूं ये जानते हुए भी कॉंग्रेस के पूर्व विधायक आसिफ खान झूठ बोल कर मुझे यहूदी बता रहे हैं।

भाई चारे की बात करने वाले @RahulGandhi से मेरे 3 सवाल है:

1. क्या वे इस बयान से सहमत है?

2. क्या वो मुझसे माफी मांगेंगे?

3. आसिफ मोहम्मद खान पर क्या कार्रवाई होगी?''

आतिशी को बताना चाहिए कि मार्क्स और लेनिन पर यकीन करने वाले कब से जाति और मजहब में यकीन करने लगे? या मार्लेना लेनिनवादी और मार्क्सवादी होने पर अब शर्मिन्दा हैं? ''इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रवीण शर्मा का बयान है— आम आदमी पार्टी की नेता जब राजनीति में आई थी, उनका नाम अतिशी मार्लेना था। कुछ दिनों बाद वह पार्टी के प्रचार में आतिशी सिंह हो गईं और ट्वीटर पर वे आतिशीआप हैं। अब फिर वह आतिशी मार्लेना चुनाव नॉमिनेशन में हो गई हैं। इस मार्लेना का राज क्या है?''