सर्जिकल स्ट्राइक: सेना ने खोली कांग्रेस के झूठ की पोल
   दिनांक 03-मई-2019

कांग्रेस के दावों से खुद सेना ही हैरान है। कांगेस ने भूतपूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह से बयान दिलवाया है कि उनकी सरकार के समय भी सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी। ये बयान भी संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दुर्दांत पाकिस्तानी आतंकी अज़हर मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के अगले दिन आया, जब सारा देश भारत की इस कूटनीतिक जीत का जश्न मना रहा था। इसके कुछ ही देर बाद कांग्रेस नेता और पूर्व पत्रकार राजीव शुक्ला ने पत्रकारवार्ता में कहा कि कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान छः सर्जिकल स्ट्राइक्स हुई थीं। शुक्ला ने बकायदा एक सूची भी जारी कर दी, इन तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक्स की। लेकिन सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने कांग्रेस के इस झूठ की पोल खोल दी।
सेना न खोल दी पोल-
मनमोहन सिंह के समय डीजीएमओ याने डायरेक्टर जनरल मिलिटरी ऑपरेशंस रहे जनरल भाटिया का एक बयान यूट्यूब पर मौजूद है जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि मोदी सरकार के पहले कभी भी सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई। दरअसल डायरेक्टर जनरल मिलिटरी ऑपरेशंस सेना का वो ओहदा होता है जहां सेना द्वारा की गई हर कार्रवाई का पूरा ब्यौरा होता है| जिन सैन्य अधिकारियों ने कांग्रेस के दावे को नकारा उनकी सूची काफी लंबी है| गौरतलब है कि कांग्रेस या मनमोहन सिंह के दावे के समर्थन में कोई भी सैन्य अधिकारी आगे नहीं आया। डीजीएमओ याने डायरेक्टर जनरल मिलिटरी ऑपरेशंस ने भी अप्रैल 2018 में एक आरटीआई के जवाब में बतलाया था कि 29 सितंबर 2016 के पहले भारत की ओर से पाकिस्तान पर कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई|
सवाल ये है कि फिर राजीव शुक्ला ने जो सूची जारी की है वो क्या है? इसका जवाब कोई भी सैनिक दे सकता है जो सीमा पर तैनात रहा है| बॉर्डर की छुटपुट कार्रवाई और सर्जिकल स्ट्राइक में बहुत बड़ा अंतर है। सीमा पर पाकिस्तान की सैन्य टुकड़ियों पर हमारी सेना सदा कार्यवाही करती रहती है। ऐसे हमलों का दायरा पांच-सात सौ मीटर तक होता है। ये कार्रवाई भारत में घुसपैठ करवाने वाले सीमा पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों या हमारी पेट्रोलिंग पार्टी पर हमला करने वाले पाक फौजियों पर की जाती है। ये छोटी कार्रवाई होतीं हैं जिन्हें करने या न करने का फैसला सीमा पर तैनात सेना के अधिकारी अपने स्तर पर करते हैं। अपनी पोस्ट और सैनिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर | ऊपर किसी से पूछे बिना।
यहां तक कि सेना मुख्यालय से भी पूछे बिना। ये वैसे ही फैसले होते हैं, जिस प्रकार से सीमा पर दोनों ओर से गोलीबारी चलती रहती है। पाकिस्तान की तरफ से गोली चलती है, तो यहां से भी गोली चलती हैं। पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसे निर्णय प्रधानमंत्री के स्तर पर होते हैं| सर्जिकल स्ट्राइक राजनैतिक इच्छाशक्ति से होती है| इसको करने का फैसला सेना नहीं लेती, क्योंकि इसका परिणाम युद्ध भी हो सकता है।
मनमोहन सिंह के समय के डीजीएमओ जनरल भाटिया ने कहा है कि “2016 में पहली बार आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया गया। इसके पहले छोटे-छोटे स्थानीय ऑपरेशन हुए। उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक नहीं कहा जा सकता। ये ऑपरेशन, क्रॉस बॉर्डर ऑपरेशन कहलाते हैं, जो स्थानीय होते हैं। ये ऑपरेशन सीमा पर तैनात पकिस्तान के सैनिकों को दबाकर रखने के लिए किये जाते हैं। उनकी तरफ से सीज फायर तोड़ने के जवाब में किये जाते हैं।”
कांग्रेस द्वारा पिछले दो सालों से किये जा रहे दावों पर जनरल भाटिया ने मुस्कुराकर कहा कि कि “इन ऑपरेशन की सर्जिकल स्ट्राइक से कोई तुलना ही नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक बहुत बड़ी योजनाबद्ध कार्यवाही होती है। उसके बड़े दूरगामी परिणाम होते हैं। रणनीतिक-सामरिक लाभ होते हैं। मैं एक सैनिक के रूप में 29 सितंबर 2016 को हुई पहली सर्जिकल स्ट्राइक पर गर्व महसूस करता हूं| किसी को भी हमारे (वर्तमान) डीजीएमओ पर सवाल नहीं करने चाहिए। उन्होंने जो कहा, सही कहा। सेना झूठ नहीं बोलती| सेना पर ऊँगली नहीं उठानी चाहिए।”
मेजर जनरल जी डी बक्शी को देशभर में लोग जानते हैं। उन्होंने मनमोहन सिंह और कांग्रेस के दावों के जवाब में कहा कि “मैंने कश्मीर में सेना की कमान संभाली है, और मैं स्पष्टता से कहना चाहता हूँ कि पहली सर्जिकल स्ट्राइक 29 सितंबर 2016 में (मोदी सरकार द्वारा) ही की गई। जिसमें पैरा कमांडोज़ की दो टीमों को लगाया गया था| (कांग्रेस द्वारा) जिनकी बात की जा रही है, वो छोटे तकनीकी ऑपरेशन थे, जो छोटे स्तर पर सेना द्वारा हमेशा किये जाते हैं, जिनमे सीमा पर मौजूद दुश्मन के 2-3 लोगों को निशाना बनाया जाता है। लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक में पाकिस्तान में गहरे घुसकर आतंकियों के 7 ठिकाने तबाह किये गए।”
लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा ने कहा कि “ 2016 के आक्रमण का फैलाव, मारकता एक अलग ही स्तर की थी। एक ही समय पर अनेक आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया|“ साहा ने श्रीनगर में सेना की 15वीं कॉर्प का नेतृत्व किया है। वो एडिशनल डायरेक्टर जनरल मिलिटरी ऑपरेशंस रह चुके हैं। 
इतना ही नहीं, लेफ्टिनेंट जनरल आर आर निम्भोरकर का, जिन्होंने उस 16 वीं कॉर्प का नेतृत्व किया है जिसने सर्जिकल स्ट्राइक की, कहना है “सेना सीमा पर छोटी कार्रवाई करती रहती है। पर सितंबर 2016 में हमने पहली बार पाकिस्तान में अन्दर घुसकर आतंकियों का खात्मा किया। जिसका निर्णय सर्वोच्च राजनैतिक स्तर पर लिया गया”
राजीव शुक्ला की लिस्ट में दिए गए नाम खुद ही कांग्रेस के झूठ की पोल खोलते हैं। इस लिस्ट में भारत के सीमावर्ती सेक्टरों (सीमावर्ती क्षेत्रों) के नाम दिए गए हैं, जैसे शारदा, भट्टल, सावन, नीलम, बारोह आदि। ये नाम ही बतला रहे हैं कि ये कार्रवाई सेना के द्वारा खुद से किये गए स्थानीय ऑपरेशन थे, जिनसे मनमोहन सरकार का कोई लेना-देना नहीं था| यहाँ तक कि सरकार से से पूछा भी नहीं गया था| लेकिन आतंकवाद पर ढोलमपोल के आरोपों से तिलमिलाई कांग्रेस पार्टी सेना के द्वारा लिए गए फैसलों का श्रेय लेना चाह रही है,परंतु खुद सेना के वर्तमान और पूर्व डीजीएमओ और अन्य अधिकारियों ने कांग्रेस की पोल खोल दी है।
तीन, छह, आठ या पंद्रह ?
पर कांग्रेस तो दावे किये जा रही है। और हमेशा की तरह उसके आंकड़े भी बदलते जा रहे हैं, जैसे राहुल गांधी राफेल की कीमत बदलते रहते हैं। 1 दिसंबर 2018 को राहुल गाँधी ने बयान दिया कि यूपीए सरकार ने तीन सर्जिकल स्ट्राइक की थीं। राजीव शुक्ला कह रहे हैं कि छह की थीं। जून 2018 में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बयान दिया कि यूपीए सरकार ने आठ सर्जिकल स्ट्राइक की थीं। मार्च 2019 में राजस्थान के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत बोले कि कांग्रेस सरकार ने 15 सर्जिकल स्ट्राइक्स की थीं |
कांग्रेस सरकार का आतंकवाद पर क्या रवैया था इसका प्रमाण है सैन्य अधिकारियों का वो बयान कि 26/11 के मुंबई हमले के बाद भारत की सेना पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों का खात्मा करना चाह रही थी लेकिन मनमोहन सरकार ने अनुमति नहीं दी। वो पाकिस्तान को डोजियर देते रहे। “अमन” की बातें करते रहे। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह 
का बयान उपलब्ध है जिसमें उन्होंने साफ़ साफ़ कहा है कि सेना को कार्रवाई करने की जितनी छूट मोदी सरकार ने दी है, उतनी अन्य किसी सरकार ने नहीं दी थी।
सारा देश जानता है.....
मनमोहन सरकार के दौरान तो सेना गोला-बारूद मांगती रही, पर सरकार द्वारा सेना की मांग पर कान नहीं दिया गया। राफेल विमान सौदे को पूरे दस साल लटकाकर रखा गया| सोनिया गाँधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के उड़ने के लिए मंहगे हैलीकॉप्टर खरीदे जाते रहे, उसमें भी घोटाले (आगस्टा वेस्टलैंड) होते रहे, पर आतंकियों का सामना कर रहे जवानों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं खरीदे गए। सेना की इस पुरानी मांग को भी मोदी सरकार ने पूरा किया है। हमारे वैज्ञानिकों ने हाल ही में उपग्रह को सैटेलाइट से नष्ट करने का जो अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षण किया है, उसे करने की अनुमति मनमोहन सरकार ने नहीं दी थी| जबकि चीन कई साल पहले ये प्रयोग कर चुका था, और भारत के लिए भारी ख़तरा उत्पन्न हो गया था|
देश की सुरक्षा और सेना को लेकर मनमोहन सरकार और मोदी सरकार में क्या अंतर है, ये आप अपने आस-पास के किसी भी सेना के जवान से पूछ लें। अकारण ही नहीं है कि सैनिकों में अन्दर प्रधानमन्त्री मोदी की लोकप्रियता चरम पर है। कांग्रेस के नेता भी ये बात जानते हैं, और शायद इसीलिए वो सेना पर भी उंगली उठाते रहते हैं, अपशब्द बोलते रहते हैं| याद करें जब कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने सेनाध्यक्ष को “सड़क का गुंडा” कहा था| तुष्टीकरण की होड़ में गुलाम नबी आज़ाद ने यहाँ तक कह डाला था कि सेना कश्मीर में जितने आतंकी मार रही है, उससे ज्यादा नागरिकों को मार रही है।
राहुल गांधी की शह पर दिग्विजय सिंह ने सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत माँगे थे| केजरीवाल, शरद पवार, मायावती आदि के साथ सुर में सुर मिलाकर कांग्रेस के कई बड़े नेता बढ़चढ़कर बयान दे रहे थे। इन सबका नेतृत्व कर रहे थे राहुल गांधी, जिनके मुंह से “खून की दलाली” जैसे शब्द निकल रहे थे। 
मोदी द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति किये जाने के आरोप भी जनता को अपील नहीं कर रहे हैं, क्योंकि सभी ने देखा था कि उरी और पुलवामा में सुरक्षाबलों पर हुए हमलों के बाद विपक्ष ने सरकार का साथ देने के स्थान पर किस तरह कीचड़ उछालने का अभियान शुरू किया था। तब मोदी से पूछा जा रहा था कि “कहाँ गई 56 इंच की छाती” और “आतंकियों के सर कब काटोगे?” इत्यादि। आम देशवासी भी समझता है कि जब ये सवाल मोदी से किये गए तो उन सवालों जवाब भी मोदी से ही सुनना पड़ेगा|
फिर जब सर्जिकल स्ट्राइक की खबर आई तो सेना को ही संदेह के घेरे में खडा किया जाने लगा। दुःख की बात है कि पूर्व प्रधानमन्त्री डॉ मनमोहन सिंह भी इस कीचड़ उछालने के अभियान का हिस्सा बने, और ऐसा बयान दिया जिसका स्वयं सेना के अधिकृत कार्यालय द्वारा पहले ही खंडन किया जा चुका है।
ये महज़ इत्तेफाक नहीं......
कांग्रेस कुछ ख़ास मौकों पर मनमोहन सिंह को आगे करती है। ये महज़ इत्तेफाक नहीं है कि अज़हर मसूद पर प्रतिबंध के अगले दिन मनमोहन सिंह से ये बयान दिलवाया गया| मजेदार बात ये है कि “तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक्स की लिस्ट मनमोहन सिंह ने जारी नहीं की| उसके लिए आए राजीव शुक्ला। क्योंकि कांग्रेस जानती थी कि इसका सेना की तरफ से खंडन सालभर पहले ही आ चुका है। 
चुनाव में राष्ट्रवाद की बयार बह रही है। कांग्रेस की हाल की कोशिशों से लगता है कि उसे भी कांग्रेस को इसका अहसास हो चला है। पर अपने घोषणापत्र को लेकर विवाद में घिर चुकी अब शायद बहुत देर हो चुकी है। आफ्सपा हटाने, सेना पर मुक़दमे चलाने की छूट और देशद्रोह के क़ानून को ख़त्म करने के चुनावी वादे उसका पीछा करते रहेंगे।