मुस्लिम बहुल सीटों पर भी मोदी-मोदी
   दिनांक 30-मई-2019
खतरा-खतरा चिल्लाने वाले दलों को समझना होगा कि घर में गैस सिलेंडर, पक्का मकान, बिजली का कनेक्शन और शौचालय जैसी सुविधाएं जब हर घर तक पहुंचती हैं, तो आप विभाजनकारी राजनीति नहीं कर सकते.
आपको याद होगा, लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने सहारनपुर की रैली में कहा था-सारे मुस्लिम एकजुट होकर गठबंधन को वोट करें. मुस्लिम वोटबैंक भारतीय राजनीति की ऐसी मरीचिका है, जिसके पीछे भाजपा और उस जैसी विचारधारा के कुछ दलों को छोड़ दिया जाए, तो हर पार्टी दौड़ती है. लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मुस्लिम अब बस वोट बैंक नहीं रह गए हैं. देश में 92 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जिन पर मुस्लिम वोटर की तादाद 20 फीसद से ज्यादा है. बावजूद इसके इनमें से 45 सीटें 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खाते में गई हैं. इसके दो निष्कर्ष हो सकते हैं. पहला तो यही कि मुस्लिम वोट भाजपा को भी गया है. दूसरा ये भी कि भाजपा का डर दिखाकर न तो मुस्लिम वोटों की लामबंदी हो सकी है, न ही भाजपा को हराया जा सका है.
41 सीटों पर 21 से 30 प्रतिशत मुस्लिम वोटर
भोपाल, जालना, औरंगाबाद, मुंबई साउथ-सेंट्रल, मुंबई साउथ, बागपत, बुलंदशहर, बदायूं, पीलीभीत, मोहनलालगंज, लखनऊ, गोंडा, डुमरियागंज, संतकबीरनगर, जम्मू, दक्षिण कन्नड, कुन्नूर, वायनाड, पलक्कड, अलाथूर, कूचबिहार, बलूरघाट, वर्धमान, कोलकाता उत्तर, कोलकाता दक्षिण, हावड़ा, उलुबेडिय़ा, दुर्गापुर, आसनसोल, बोलपुर, बीरभूमि, मोवेलिक्करा, कृष्णानगर, राणाघाट, बणगांव, बैरकपुर, दमदम, बारासात, नैनीताल, नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली, चंडीगढ़ लोकसभा सीटों पर मुस्लिम मतों की तादाद 21 से तीस फीसद है. इनमें से 25 सीटें भाजपा ने जीती हैं. पांच कांग्रेस व उसके सहयोगियों को मिली. बाकी 11 सीटें अन्य दलों के खाते में गईं.
24 सीटों पर 31 से 40 प्रतिशत मुस्लिम वोटर
मंगलदोई, सिलचर, पुर्णिया, गुडग़ांव, उधमपुर, कासरगोड, वडाकरा, कोझीकोड, सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, अमरोहा, मेरठ, आंवला, बरेली, बहराइच, श्रावस्ती, हरिद्वार, चांदनी चौक, बशीरहाट, जॉयनगर, मथुरापुर, डायमंड हार्बर, जाधवपुर लोकसभा सीटों पर मुस्लिम वोटों की संख्या 31 फीसद से 40 प्रतिशत तक है.
इनमें से 13 सीटें भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने जीती हैं. कांग्रेस व उसके साथी दलों को बस तीन सीटें मिलीं. आठ सीटें अन्य दलों के खाते में गईं.
11 सीटों पर 41-50% मुस्लिम वोटर
अररिया, कटिहार, लद्दाख, बिजनौर, नगीना, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, रायगंज, सिकंदराबाद, हैदराबाद सीटों पर 41 से पचास फीसद मुस्लिम वोटर हैं.
भाजपा गठबंधन को इसमें से पांच सीट मिलीं. इन सीटों पर कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई. अन्य क्षेत्रीय दलों को छह सीटों पर सफलता मिली.
16 सीटों पर 50% से ज्यादा मुस्लिम वोटर
विभिन्न राज्यों की करीमगंज, धुबड़ी, बारपेटा, नौगांव, किशनगंज, श्रीनगर, बारामुला, अनंतनाग, मल्लापुरम, पुन्नानी, लक्ष्यद्वीप, बहरामपुर, मुर्शिदाबाद, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण और जंगीपुर सीटें ऐसी हैं, जिनपर मुस्लिम वोटों की तादाद पचास प्रतिशत के आंकड़े को पार कर गई है.
इन सीटों पर भाजपा गठबंधन का प्रदर्शन उतना प्रभावी नहीं रहा है. इनमें बस दो सीटों पर भाजपा को जीत मिली. कांग्रेस गठबंधन ने दस सीटें जीतीं. 4 अन्य के खाते में गईं.
 
इन नतीजों का विश्लेषण
इन नतीजों का विश्लेषण करते हैं. बात आगे बढ़ाने से पहले बताते चलें कि ये सीटें कांग्रेस की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रही थीं. इन सीटों की पहचान यूपीए के कार्यकाल में की गई थीं. मुस्लिम तुष्टिकरण की यूपीए की नीति के तहत इन 92 लोकसभा सीटों को अल्पसंख्यक बहुल जैसा आपत्तिजनक नाम दिया गया था. कांग्रेस की रणनीति ये थी कि इन सीटों पर मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण उसे आधी से ज्यादा सीटें जिता देगा. लेकिन कांग्रेस कुल 92 में से 18 सीटों पर सिमटकर रह गई.
चुनाव के ताजा नतीजों का एक बहुत अहम पहलू है, जिसे विश्लेषक जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं. 2014 के चुनाव में भाजपा को इन 92 लोकसभा सीटों में से 41 पर सफलता मिली थी. लेकिन इस चुनाव में उसकी तीन सीटें बढ़ गईं. यानी आंकड़ा 45 पहुंच गया. इनमें से पचास फीसद से ज्यादा सीटें जीतने का मतलब ये है कि मुस्लिम मतों के बीच भाजपा और नरेंद्र मोदी को लेकर फैलाए गए डर को मुस्लिम मतदाताओं ने नकार दिया. 2014 के मुकाबले इस चुनाव में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ी है.
इस बदले ट्रेंड को समझने के लिए पश्चिम बंगाल का उदाहरण लेते हैं. पश्चिम बंगाल में ऐसी 18 सीटें हैं, जिन पर मुस्लिम आबादी बीस फीसद से अधिक है. रायगंज लोकसभा सीट पर मुस्लिम वोटर की तादाद 49 फीसद है. यहां से भाजपा के देबश्री चौधरी निर्वाचित हुए हैं. इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था. इस सीट से भाजपा की जीत में मुस्लिम वोट शामिल हैं. ऐसी ही एक और सीट मालदा उत्तर है. यहां मुस्लिम वोट पचास फीसद हैं. भाजपा को यहां लगभग एक लाख वोटों से जीत मिली है, जो मुस्लिम वोटों के बिना संभव ही नहीं थी. भाजपा ने बालुरघाट, विष्णुपुर, हुगली, दुर्गापुर और जलपाई गुड़ी सीटों पर भी जीत हासिल की है. पश्चिम बंगाल का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां ममता बनर्जी ने सांप्रदायिकता का जहर बोने की हर कोशिश की थी. बांग्लादेशी घुसपैठियों के जरिये मुस्लिम वोटों की तादाद बढ़ाने की कोशिश पर इस चुनाव ने पानी फेर दिया है. साथ ही चुनाव के नतीजे इस बात के लिए भी सबक हैं कि अब बस भाजपा का डर दिखाकर मुस्लिम वोटों की फसल नहीं काटी जा सकती. सबका साथ-सबका विकास जैसा विजन जातीय दीवार गिरा चुका है और अब सांप्रदायिक दीवार में सुराख कर रहा है. खतरा-खतरा चिल्लाने वाले दलों को समझना होगा कि घर में गैस सिलेंडर, पक्का मकान, बिजली का कनेक्शन और शौचालय जैसी सुविधाएं जब हर घर तक पहुंचती हैं, तो आप विभाजनकारी राजनीति नहीं कर सकते.