मोदी ने बनाया विजय का विश्व रिकॉर्ड
   दिनांक 30-मई-2019
                 
मोदी इस महाविजय के बाद विश्व के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गए हैं जिन्होंने देश में जीएसटी लागू करने के बाद भी अपनी और अपनी सरकार की प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की है
इन लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत पाकर भारत में तो कई रिकॉर्ड बनाए ही हैं. साथ ही पीएम मोदी की इस विजय से एक ऐसा विश्व रिकॉर्ड भी बन गया है जो अपने आप में अद्धभुत है.
असल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस महाविजय के बाद विश्व के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गए हैं जिन्होंने देश में जीएसटी लागू करने के बाद भी अपनी और अपनी सरकार की प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की है. अन्यथा बरसों से विश्व में यह एक अजब सी परंपरा सी बन गई थी कि जो भी सरकार अपने देश में जीएसटी व्यवस्था लागू करती थी, उसे अगले चुनाव में पूरी तरह हार का सामना करना पड़ता था या बहुमत नहीं मिलता था. जनता का कोप भाजन बनने से वह राजनीतिक दल और शासक सत्ता से बाहर हो जाते थे या अकेले अपने बल पर सरकार बनाने में असमर्थ रहते थे. इसलिए सभी देशों में वहां की सरकारें और वहां के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जीएसटी लागू करने से अक्सर बचते भी रहे. हालांकि बहुत लोगों ने इस परंपरा की परवाह किये बिना इस तरह की बातों को भ्रम, बकवास या अंधविश्वास बताकर, जीएसटी लागू करने का साहस जुटाया, लेकिन लाख प्रयासों के बाद भी कोई भी आगामी चुनावों में अपनी जीत दर्ज नहीं करा सका. लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अब इस मिथक को तोड़कर एक नया इतिहास लिख दिया है.
निश्चय ही यह दुखद होने के साथ आश्चर्यजनक भी रहा कि विश्व में भारत से पूर्व जहां भी जीएसटी प्रणाली व्यवस्था लागू हुई वहां सभी जगह इतिहास खुद को दोहराता रहा. इसलिए भारत में भी विपक्षी दल लोकसभा के इन आम चुनावों से पूर्व यही सोचकर खुश हो रहे थे कि नरेन्द्र मोदी कितना भी कर लें,उन्हें बहुमत नहीं मिलेगा. उनकी वापसी नहीं होगी. क्योंकि जब अभी तक किसी अन्य देश में जीएसटी लागू करने वाली सरकार की वापसी नहीं हुई तो मोदी की वापसी भला कैसे हो सकती है?
इसीलिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो चुनाव परिणाम से पहले ही नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में 23 मई की तिथि को उनकी ‘एक्सपायरी डेट’ तक कह दिया था. बंगाल में भारी तूफ़ान को लेकर वहां सहायता प्रदान करने के लिए जब पीएम मोदी ने ममता से फ़ोन पर बात करनी चाही तो तब भी ममता ने अहंकार भरे लहजे में कहा था-“एक्सपायरी पीएम से क्या बात करना”. लेकिन चुनाव परिणामों के बाद ममता बनर्जी की सारी अकड़, सारी धौंस धरी की धरी रह गयी है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो पहले नोटबंदी के खिलाफ अपना राग अलापते रहे और पिछले करीब दो बरसों से जीएसटी के विरुद्द भी लगातार अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे. यहां तक जीएसटी यानी ‘गुड्स एंड सर्विसिज टैक्स’ को राहुल हमेशा अत्याचार के प्रतीक के रूप में ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहकर पुकारते रहे.
राहुल गांधी ने तो अपने भाषणों में यहाँ तक कह दिया कि अब नरेन्द्र मोदी सिर्फ 23 मई यानी चुनाव परिणाम आने तक ही पीएम हैं. उसके बाद यदि कांग्रेस सरकार आती है तो वह जीएसटी को समाप्त कर देंगे. लेकिन राहुल गांधी या अन्य किसी भी विपक्षी दल के नेताओं के बुने भ्रम जाल का मतदाताओं पर बिलकुल भी असर नहीं हुआ.
 
मोदी सरकार ने इससे जुड़ी तमाम पूर्व मान्यताओं को बदल कर न सिर्फ फिर से अपनी शानदार वापसी की, बल्कि पिछले 2014 के आमचुनावों से अधिक मत, अधिक सीट और अधिक बहुमत पाकर वापसी की. जो यह बताता है कि देश की जनता को प्रधानमन्त्री मोदी पर पूरा भरोसा है. उनके किये गए सभी काम जनता को पसंद हैं. चाहे वह नोटबंदी या जीएसटी ही क्यों न हों. देखा जाए तो यह अभूतपूर्व विजय बताती है कि जीएसटी प्रणाली से मतदाता खुश हैं. मोदी की यह विजय इस बात पर बाकायदा अपनी मुहर लगाती है.
फ्रांस ने शुरू किया था सबसे पहले जीएसटी
गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स व्यवस्था विश्व में सबसे पहले फ़्रांस ने सन 1954 में आरम्भ की थी. उसके बाद धीरे धीरे सन 1970 से 1980 के बीच बहुत से यूरोपीय देशों ने जीएसटी लागू कर दिया था. अब तो फ्रांस के साथ जर्मनी, इटली, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, स्पेन, विएतनाम, नाइजेरिया और ब्राज़ील सहित बहुत से देशों में जीएसटी जैसे कर ढांचे की व्यवस्था चल रही है. लेकिन जहां भी जीएसटी शुरू किया गया लोगों को इससे शुरू में काफी परेशानी हुई.
न्यूजीलैंड में जीएसटी एक अक्टूबर 1986 को लागू हुआ तो जापान में कन्जेम्प्शन टैक्स के नाम से 1989 में. जबकि रूस और कनाडा में 1991 में और चीन तथा सिंगापुर में 1994 को. ऑस्ट्रेलिया में सन 2000 में जीएसटी आया तो पाकिस्तान में 2013 में और मलेशिया में 2015 में.
बात फ़्रांस से ही शुरू करें तो जब वहां 1954 में जीएसटी आया तो फ़्रांस के 93 वें पीएम के रूप में वहां रेडिकल पार्टी के पियरे मेंडेस विराजमान थे. लेकिन जीएसटी आने के बाद फ़्रांस के लोगों ने उन्हें इतना नकार दिया कि उनकी सत्ता कुल 8 महीने ही चल पाई. उनके बाद एडगर पिनेऔ को सत्ता संभालनी पड़ी.
उधर न्यूजीलैंड में जब एक अक्टूबर 1986 को जीएसटी को अपनाया गया, तब वहां लेबर पार्टी के डेविड लेंज सत्ता में थे. शुरू में वहां जीएसटी की दर 10 प्रतिशत थी. लेकिन जीएसटी के बाद जब वहां काफी उथल पुथल होने लगी. सन 1987 में तो जैसे तैसे डेविड ने अपनी कुर्सी बचाए रखी क्योंकि उनका कहना था जीएसटी अभी लागू हुआ ही है. वह इसे दो साल में पूरी तरह व्यवस्थित और सरल कर देंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और सन 1989 में डेविड की जगह ज्योफ्रे पामर पीएम बन गए.लेकिन ज्योफ्रे को भी एक साल बाद सत्ता गंवानी पड़ी. उनके बाद माइक मोरे पीएम बने लेकिन वह भी 60 दिन ही पीएम रह पाए. और जब 1990 में चुनाव हुए तो सत्ता लेबर पार्टी की जगह नेशनल पार्टी के जिम बोल्गेर के हाथों में चली गयी. हालांकि बाद में न्यूजीलैंड में जीएसटी की दरें बढाकर 12.5 प्रतिशत कर दीं और सन 2010 में और भी बढ़ाकर इन्हें 15 प्रतिशत कर दिया गया. पर तब तक वहां सभी लोग जीएसटी के अभ्यस्त हो गए थे.
कनाडा में पीएम ब्रेन मुलरोनी ने अपने दूसरे कार्यकाल में देश में मेन्युफेकचर्स सेल्स टैक्स (एमएसटी) के स्थान पर सन 1991 में जीएसटी शुरू किया तो वहां तूफ़ान सा आ गया. कनाडा के करीब 80 प्रतिशत लोगों ने जीएसटी का विरोध किया. हालात ऐसे बने कि ब्रेन को राजनीति से संन्यास लेना पड़ा. उनके स्थान पर 25 जून 1993 को किम कैंपबेल पीएम बन गयीं. लेकिन जीएसटी ने उनका भी पीछा नहीं छोड़ा. चार महीने बाद वह जब कनाडा के आम चुनाव में उतरीं तो उन्हें जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा. इससे किम को उसी बरस 4 नवम्बर को अपने पद से त्यागपत्र देने के लिए विवश होना पड़ा.
ऐसे ही ऑस्ट्रेलिया में जब जीएसटी लागू हुआ तो वहां इसकी दरें सिर्फ 10 प्रतिशत थीं. लेकिन इसके चलते वहां की जॉन हॉवर्ड सरकार बहुत मुश्किलों में आ गयी. उन्हें अगले चुनावों में बहुमत नहीं मिला. इसके लिए उनकी लगातार काफी आलोचना भी होती रही.
 
उधर मलेशिया में संघीय सरकार के पीएम नजीब रजाक ने जब अपने यहां एक अप्रैल 2015 को जीएसटी लागू किया तो लोग उनसे नाराज हो गए. इसलिए जब 2018 में रजाक आम चुनाव में उतरे तो उन्हें जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा, इससे वह सत्ता से विमुख हो गए.
यहां तक पाकिस्तान में भी जीएसटी को जनरल सेल्स टैक्स के नाम से जून 2013 में लागू किया तो तब वहां नवाज़ शरीफ वजीरे आज़म थे. लेकिन वहां की जनता को भी 17 प्रतिशत जीएसटी बहुत भारी लगा और इसका तब काफी विरोध हुआ. उधर नवाज़ शरीफ को भी जुलाई 2017 में सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा.
फिर भी दुनिया अपना रही है जीएसटी
जीएसटी के बाद चाहे कई सरकारें चली गयीं लेकिन आज जीएसटी या वैट टैक्स प्रणाली को विश्व के अधिकतर देश अपनाने में लगे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ में आज कुल 193 देश सदस्य हैं. इनमें से करीब 165 देशों में कहीं जीएसटी लागू है तो कहीं वैट भी है. भारत में भी पहले वैट प्रणाली सन 2005 में लागू हो गयी थी. लेकिन जीएसटी एक जुलाई 2017 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लागू किया. जिसके लिए तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपनी टीम के साथ दिन रात एक करके बहुत काम किया.
इस समय जीएसटी या वैट प्रणाली को जिन जिन देशों ने अपनाया हुआ है उसमें एशिया के भारत, जापान, चीन, पाकिस्तान के साथ इरान, बांग्लादेश, नेपाल,दक्षिण कोरिया,श्रीलंका,मंगोलिया,तज़ाकिस्तान,ताइवान,उज्बेकिस्तान,जोर्डन,लेबनान, कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान भी शामिल हैं. जबकि यूरोप के तो सभी देशों में अब यह कर व्यवस्था लागू हो गयी है. लेकिन दो बरस पहले तक अफ्रीका के अंगोला,लीबिया.लाइबेरिया,सोमालिया, कोमोरोस, इरिट्रिया जैसे 10 देशों को छोड़कर अन्य सभी अफ़्रीकी देश इस आधुनिक कर प्रणाली को अपना चुके थे. लेकिन सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में न तो अभी तक जीएसटी है और न ही वैट. वहां अभी भी विभिन्न राज्यों के अनुसार पुरानी बिक्री कर प्रणाली ही चल रही है.
भारत में 17 साल बाद पूरा हुआ जीएसटी का सपना
भारत में भी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के पहले भी कई बार प्रयास किये गए थे. जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सन 1999 से इसके लिए प्रयास किये. फिर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए एक और दो के समय भी इसके लिए कुछ कोशिशें हुईं लेकिन सफलता नहीं मिली. लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मई 2014 में सत्ता संभाली तब उन्होंने जीएसटी को भी अपनी प्राथमिकताओं में रखा. देश स्वतंत्र होने के बाद देश में पहली बार इतने व्यापक स्तर पर कर सुधार करने का काम कोई छोटा काम नहीं था. सबसे बड़ा भय तो यही था कि कहीं इससे देश में वैसे ही सभी वस्तुओं की कीमतें न बढ़ जाएं, जैसे अब तक अन्य देशों में बढ़ती रहीं. यदि ऐसा होता तो देश में अफरातफरी के वातावरण के साथ लोगों का आक्रोश भी फूट सकता था. लेकिन इस तरह की अव्यय्वस्था से बचने के लिए प्रधानमन्त्री मोदी ने स्वयं जीएसटी के कार्यों पर बारीकी से नज़र रखी.
उधर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसके लिए जमकर परिश्रम किया. राज्यों के वित्त मंत्रियों की समिति अक्टूबर-नवम्बर 2015 में जीएसटी का अध्ययन करने के लिए ऑस्ट्रेलिया भी गयी. जिससे वहां इसे लागू करते समय जिस तरह की समस्याएं आयीं उनसे अपने यहाँ बचा जा सके. जबकि इससे पहले भी समिति के मंत्री सदस्य 8 देशों की यात्रा कर चुके थे. सभी अध्ययनों के बाद जीएसटी को देश में लागू करने का कार्यक्रम बनाया गया. संविधान संशोधन करके जीएसटी को सक्षम बनाया गया. जिसे संसद के दोनों सदन द्वारा सर्वसम्मति से मंजूरी दिलाई गई.
पीएम् मोदी ने जीएसटी लागू करने के कार्य को महाउत्सव के रूप में मनाने के लिए 30 जून 2017 की अर्धरात्रि में संसद का विशेष अधिवेशन रखा. जैसे ही रात को 12 बजते ही एक जुलाई आरम्भ हुई तभी तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री मोदी ने इसे लागू कर दिया.
जीएसटी से पहले 17 प्रकार के कर थे उन सभी को एक करके इंस्पेक्टर राज को समाप्त किया गया. पहले बहुत सी जगह कर दरें 31 प्रतिशत तक थीं. सिनेमा टिकटों पर तो 35 से 110 प्रतिशत तक के मनोरंजन कर वसूले जा रहे थे. लेकिन अब जीरो से 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत तक के विभिन्न स्लेब बना दिए गए थे. हालांकि शुरू में सबसे ज्यादा परेशानी 28 प्रतिशत के स्लेब से हुई और कुछ अन्य वस्तुओं और सेवाओं पर भी कर की अधिक दरों से विभिन्न समस्याएं आयीं. लेकिन मार्च 2019 तक जीएसटी परिषद् की हुई कुल 34 विभिन्न बैठकों में हर बार कमियों और समस्याओं को लेकर सुधार एवं संशोधन होते रहे. जिससे 28 प्रतिशत कर का स्लेब तो अब बहुत ही सीमित हो गया है. बाकी बहुत सी वस्तुओं में भी कर की दरें काफी कम की गयीं हैं. यहां तक रेस्टोरेंट में खाना खाने पर भी न्यूनतम 5 प्रतिशत जीएसटी रह गया है. आज़ादी के बाद यह देश में पहली बार हो रहा है कि उपभोक्ता को करों में बढ़ोतरी की जगह व्यापक स्तर पर कमी देखने को मिल रही है.
असल में जीएसटी हमारे देश में इतनी जल्दी सफल भी इसलिए हो पाया क्योंकि इसके लिए वर्तमान भारत सरकार ने पहले से ही गहन अध्ययन किया. साथ ही बाद में नियमित विभिन्न सुधारों से महंगाई पर लगाम भी कसी रही. इससे जहां उपभोक्ताओं को राहत मिल रही है, वहां जीएसटी से देश के राजस्व में भी बढ़ोतरी हो रही है. साथ ही जीडीपी में भी. पहले साल जहाँ प्रतिमाह जीएसटी से औसतन 89700 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ वहां दूसरे वर्ष में यह प्राप्ति बढ़कर 97100 करोड़ रूपये प्रति माह हो गयी है.
भाजपा को पहले से पौने 6 करोड़ अधिक वोट मिले
बड़ी और दिलचस्प बात यह है कि नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद भाजपा को इन लोकसभा चुनावों में 2014 के पिछले आम चुनावों के मुकाबले 5.74 करोड़ अधिक मत मिले. प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस जीत के बाद 25 मई को संसद में एनडीए गठबंधन का नेता चुने जाने पर अपने संबोधन में हँसते हुए कहा भी था –“अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प को कुल जितने वोट मिले थे, उतना तो हमारा इन्क्रीमेंट ही हो गया.”
इन अधिक मतों के चलते भाजपा अकेले अपने दम पर 303 सीट जीतने में सफल रही. सन 1971 के करीब 48 बरस बाद देश में नरेन्द्र मोदी और भाजपा को दो बार लगातार बहुमत से विजयी होने का नायाब अवसर मिला है. यह सब बताता है कि लगभग पूरे देश में मोदी और उनके कार्यों की स्वीकार्यता पहले से भी ज्यादा बढ़ी है. हिमाचल प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड में तो भाजपा को इस बार 60 प्रतिशत से भी अधिक मत मिले हैं. जबकि अन्य कई राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक मत भाजपा की झोली में आये. इस सबको लेकर भी पीएम नरेन्द्र मोदी ने 23 मई शाम को चुनाव परिणाम आने के बाद, दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था –“देश के कोटि कोटि नागरिकों ने इस फ़क़ीर की झोली को भर दिया.”
आज पूरा देश ही नहीं पूरा विश्व, महानायक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस महाविजय को देख रहा है. जिसमें भारत में तो उनकी विजय ने रिकॉर्ड बनाया ही साथ ही पूरे विश्व में भी वह अपनी विजय का अविस्मर्णीय रिकॉर्ड बनाने में सफल रहे हैं.