2019 की जीत भारतीयों के विश्वास की जीत है
   दिनांक 30-मई-2019
- रतन शारदा                         
यह कहना कि 2014 के चुनाव ऐतिहासिक हैं, एक सत्य का दोबारा कहना मात्र होगा. परन्तु फिर भी कुछ बातें ऐसी हुई हैं, कि यह कहना ही पड़ रहा है.1984 के बाद पहली बार एक पार्टी की सरकार दोबारा चुन कर आई है. हालांकि यह भी इतना सही उदाहरण नहीं है. 1984 की जीत श्रीमती गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के कारण हुई थी. परन्तु नेहरू जी के बाद पहली बार अपने विचारों और अपने कार्यों के बलबूते पर एक सरकार फिर न केवल अकेले पूर्ण बहुमत से आई है, बल्कि अधिक प्रतिशत मतों से आयी है. ऐसे क्षेत्रों से जीत कर आई है, जहां उसका वजूद न के बराबर था.
बंगाल और ओडिशा की जीत न केवल बहुत बड़ी जीत है, बल्कि एक राजनीतिक दल की सोची समझी संगठनात्मक रणनीति का नतीजा है. तीन महीने पहले तीन प्रांतों में हार का सामना किया हुआ दल इतनी बड़ी जीत हासिल करे, यह भी उसके कार्यकर्ताओं की जिद्द और उसके नेताओं द्वारा किए गए जनहित के कार्यों के कारण है. भाजपा के धुर समर्थक भी ऐसी जीत की अपेक्षा नहीं कर रहे होंगे यह एक सत्य है. राजस्थान इसका सबसे मुखर उदाहरण है ,जहां के नए चुने मुख्यमंत्री अपने बेटे को नहीं जिता पाए.
यह जीत निश्चित ही मोदी जी की नीतियों, उनके कठिन तप की है. साथ ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की बारीक योजनाओं और जमीनी काम की जीत है. परन्तु इसके पीछे कई आयाम हैं जिन्हें समझना होगा.
आर्थिक और सामाजिक योजनाओं के अंतर्गत विकास की पंक्ति में आखिर खड़े व्यक्ति तक पहुंचना और उसे इनका लाभ पहुंचाना आसान नहीं था. परन्तु प्रधानमंत्री मोदी ने अथक परिश्रम द्वारा करोड़ों परिवारों को विकास की धारा से जोड़ा और उनको भारत से जोड़ा. यह जीत उन वंचित समाज के बंधुओं की आवाज़ है. जो लोग ऐसे वंचित समाज के लिए शौचालय का मजाक उड़ाते थे, जो उनको मिली बिजली और गैस के लाभ से मिली राहत को समझ नहीं पाए यह उनकी हार है.
यह जीत सार्थकता की जीत है. वर्षों तक माई बाप सरकार के साये में भारतीय यह बता कर शांत रखे गए कि यही उनकी नियति है, कि सरकार उनकी न्यूनतम ज़रूरतें पूरी करती रहे, और जनता उन्हें मत देती रहे. 2014 में लोगों ने ऐसी सरकार चुनी जो उन्हें आकांक्षाएं रखने और उन के लिए परिश्रम करने पर उन्हें प्राप्त करने की प्रेरणा दे रही थी, उनकी महत्वकांक्षाओं को समझ रही थी. 2019 की जीत ने उसी विश्वास और सार्थकता पर मुहर लगाई है.
इस महाविजय में दो-तीन और मुद्दों ने बड़ी भूमिका निभाई है. पहली बार राष्ट्र के कुछ बड़े मुद्दे किसी एक क्षेत्र या भाग के मुद्दे नहीं रहे. वह राष्ट्र के मुद्दे बन गए. असम की समस्या से निकले नेशनल सिटिज़न रजिस्टर और सिटीजन अमेंडमेंट बिल के बारे में अन्य सभी दलों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के विरोध के बावजूद भाजपा की प्रखर भूमिका लोगों ने स्वीकार की. इसे केवल असम ही नहीं बल्कि सारे देश ने अपना मुद्दा मना. अब तक असम और सारा पूर्वोत्तर एक कोने में अपने दृष्टि पटल से ओझल क्षेत्र था. अब देश का मुद्दा बन गया. कश्मीर में लागू धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए सारे देश के लिए एक विषय बना और भाजपा ने इसे स्वीकार किया, सारे अन्य दलों के विरोध के बावजूद. यह इस चुनाव की एक विशेष दिशा थी.
जिस देश में हिन्दू शब्द का उपयोग जातिवादी, तीखी प्रतिक्रिया और क्रिटिसिज्म का कारण था; जहां हिन्दुओं के बारे में बोलना एक दकियानूसी कौम के बारे में बोलना माना जाता रहा, वहां सभी राजनीतिक दलों को अपने आप को हिन्दू दिखाने की होड़ लग गई. यह चमत्कार ही तो है! वामपंथियों से लेकर धुर सेकुलर दल और नेता मंदिरों के चक्कर काटते देखे गए. भगवा वस्त्र धारण करते देखे गए. इस चुनाव में हिन्दू जीवन पद्धति भारत की राजनीति का केंद्र बन गई. इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वर्षों की तपस्या का फल मानना गलत नहीं है.
कई वर्षों के चुनावी अनुभव हमें बताते हैं कि केवल आर्थिक विकास और मुद्दों पर चुनाव जीतना कठिन होता है. वरना न तो नरसिम्हा राव चुनाव हारते न ही अटल बिहारी वाजपेई . इन बहुत ही आवश्यक मुद्दों के साथ इन्हें कुछ भावनात्मक जोड़ देना सही नीति है. इन कारकों को जोड़ने का काम भाजपा और मोदी जी सफलता पूर्वक कर पाए. साध्वी प्रज्ञा को चुनाव में खड़ा करना इस भावना का एक प्रगटीकरण था. बालाकोट पर राष्ट्रवाद के भाव का जोर पकड़ना भी इसी देश भक्ति की भावना का द्योतक है.
 
भारत एक बडे सांस्कृतिक वैचारिक युद्ध से गुजर रहा है. इस संधि काल में 2014 और 2019 को देखना चाहिए. भारत के जनमानस ने नेहरू जी के काल से पोषित वामपंथी विचारधारा की आंखों से देखा, जिसमें यह देश मुग़ल और अंग्रेज़ों की ग़ुलामी के अलावा राजा महाराजों के जमावड़े के अतिरिक्त कुछ नहीं था. जो कभी एक राष्ट्र था ही नहीं. परन्तु यह सत्य है की इस विचार को भारत का सर्वसाधारण व्यक्ति कभी स्वीकार नहीं कर पाया था और चुप रहा. अंतत: इस विचारधारा को 2014 में जमीन से जुड़े समाज ने अस्वीकार कर दिया. 2019 की जीत में इस सांस्कृतिक राष्ट्र की भी विजय है. इन्ही सार्थक विचारों के नायक श्री नरेंद्र मोदी बने हैं जो फिर भारत को एक स्वाभिमानी समर्थ राष्ट्र के रूप में स्थापति करेंगे इस विश्वास से इस जनतंत्र ने उन्हें चुना है.