टाइम पत्रिका ने लिया मोदी पर यू टर्न कहा मोदी ने भारत को एक सूत्र में पिरोया
   दिनांक 30-मई-2019
टाइम मैगजीन की वेबसाइट ने 28 तारीख को मनोज लाडवा का एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें मोदी के लिए पत्रिका का सुर बदला हुआ नजर आया। इस नए लेख का शीर्षक है "मोदी ने भारत को जिस तरह से एकजुट किया है वैसा दशकों में कोई प्रधानमंत्री नहीं कर पाया" है। मोदी हैज यूनाइटेड इंडिया लाइक नो प्राइम मिनिस्टर इन डिकेड्स
पिछले साल मई में भारत के राजदूत नवतेज सिंह सरना ने अमेरिकी मीडिया की जमकर आलोचना की थी। सरना ने आरोप लगाया था कि विदेशी मीडिया भारत की नकारात्मक छवि पेश करती है। विदेशी पत्रकार कुछ चुनिंदा खबरों को दिखाने और भारत के विकास से जुड़ी खबरों को नजरअंदाज करने के आदि हो गए हैं। सरना ने यह वक्तव्य अमेरिकी थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर स्ट्रेटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज’ के मंच से दिया था।
यह संयोग ही है कि मई के ही महीने में भारत पर प्रकाशित अपनी आवरण कथा के लिए एक अमेरिकी पत्रिका टाइम (मई 20, 2019) की जग हंसाई हुई। टाइम पत्रिका ने 20 मई के अंक में एक आलेख 'इंडियाज डिवाइडर इन चीफ' को पत्रिका का आवरण बनाया था। इस अंक की चर्चा इसलिए अधिक हुई क्योंकि इस अंक के आवरण कथा में लेखक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश को बांटने वाला बताया था।
पत्रिका ने आतिश तासीर के लेख की वजह से अपने पाठकों के बीच विश्वसनीयता खोई। अब जबकि मोदी एक बार फिर भारत के प्रधानमंत्री बन चुके हैं तो टाइम मैगजीन की वेबसाइट ने 28 तारीख को मनोज लाडवा का एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें मोदी के लिए पत्रिका का सुर बदला हुआ नजर आया। इस नए लेख का शीर्षक है "मोदी ने भारत को जिस तरह से एकजुट किया है वैसा दशकों में कोई प्रधानमंत्री नहीं कर पाया" है। मोदी हैज यूनाइटेड इंडिया लाइक नो प्राइम मिनिस्टर इन डिकेड्स।
मनोज लाडवा के लेख पर चर्चा से पहले एक बार नजर डालते हैं तासीर के उस आलेख पर जिसने टाइम पत्रिका की किरकिरी पूरी दुनिया में कराई। टाइम पत्रिका में मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव के दौरान प्रकाशित लेख को अब प्रोपेगेन्डा समाचार की तरह देखा जा रहा है। पत्रिका ने अपने एक आलेख की वजह से एशिया महाद्वीप में अपने पाठकों के बीच अपना विश्वास खोया है। टाइम पत्रिका में छपे लेखों की जो हनक हुआ करता था, टाइम ने अपनी वह ताकत मई 2019 में मोदी के खिलाफ फैलाई जा रही अफवाह तंत्र और फेक न्यूज का हिस्सा बनकर खोई है। मनोज लाडवा के आलेख को छाप कर टाइम अपनी खोई हुई साख वापस पाने की चाहे कोशिश करे लेकिन जो विश्वास एक बार टूटता है उसे हासिल करना कहां आसान होता है?
तासीर के लिखे पर सवाल
तासीर के आलेख से जुड़ी दो बातों पर ध्यान दिलाना ना जाने किसी पत्रकार ने आवश्यक क्यों नहीं समझा? पहला आवरण पर मोदी की तस्वीर के साथ 'इंडियाज डिवाइडर इन चीफ' के ठीक नीचे एक लाइन और लिखी थी— 'मोदी द रिफार्मर'। दूसरी बात, आप आतिश तासीर की आवरण कथा को पढ़ने के लिए अंदर के पन्नों में जब जाते हैं तो ''क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी सरकार को अगले पांच साल और झेल सकता है? शीर्षक के साथ उनका लेख मिलता है। इस शीर्षक को पढ़कर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि लेखक नरेन्द्र मोदी को लेकर पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। इस पूर्वाग्रह से भरे प्रश्न का जवाब 23 मई को भारत की जनता ने दे ही दिया।
लेख साझा करने से पहले वामपंथी—कांग्रेसियों ने कुछ पढ़ा तक नहीं
इस आलेख को सोशल मीडिया पर साझा करने वालों की जो बाढ़ आई उनमें वामपंथी रूझान वाले नए पुराने रंगरूटों की संख्या सबसे अधिक थी। जिन्होंने टाइम पत्रिका के आवरण पृष्ठ को देखकर यह निष्कर्ष बिना पत्रिका को पढ़े निकाल लिया कि यहां सब कुछ मोदी के खिलाफ है। इसके बाद न इस शीर्षक के साथ अंदर के पृष्ठों पर लेखक ने क्या लिखा है यह पढ़ना उनके लिए महत्वपूर्ण था। न ही यह महत्वपूर्ण था कि जिसे आवरण पृष्ठ पर छापा गया है, वह क्या पत्रिका का स्टैन्ड है? या स्वतंत्र पत्रकार की निजी राय?
जब तासीर के लेख की चर्चा हर तरफ हो रही थी, लेकिन टाइम पत्रिका के इसी अंक में ईयान ब्रेमर के आलेख —'मोदी इज इंडियाज बेस्ट होप फॉर इकानॉमिक रिफॉर्म' पर मोदी विरोधियों ने चुप्पी साध ली। टाइम पत्रिका का इस्तेमाल मोदी विरोधी खेमे ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कर लिया। इसके बावजूद चुनाव के परिणाम को वे प्रभावित नहीं कर पाए लेकिन टाइम पत्रिका पर समाज के विश्वास को जरूर मिट्टी में मिला दिया।
 
टाइम पत्रिका के 20 मई के ही अंक में ईयान ब्रेमर ने मोदी के लिए लिखा था— ''भारत को इस वक्त बदलाव की आवश्यकता है, और मोदी इसके लिए सबसे अधिक संभावनाओं से भरे व्यक्ति हैं। उनकी वजह से चीन, अमेरिका और जापान के साथ भारत के संबंधों में सुधार आया है, लेकिन यह उनके घरेलू विकास का एजेंडा है, जिसने सैकड़ों—लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने, संभावनाओं से भरने के लिए सबसे अधिक काम किया है।''
इसके बाद जो एक सवाल अनसुलझा रह गया, वह है पत्रकार तवलीन सिंह से जुड़ा। तवलीन सिंह को वामपंथी पत्रकारों द्वारा पिछले पांच सालों में भक्त पुकारा जाने लगा था। टाइम पत्रिका में उनके बेटे आतिश तासीर का लेख छपने के बाद देश भर के वामपंथी—कांग्रेसी पत्रकार बिरादरी में उनके लिए सहानुभूति की सुनामी नजर आई। अब सवाल है कि तवलीन के बेटे ने मां से अलग राय क्यों रखी? क्या यह एक सामान्य सी असहमति मात्र की बात थी? या आतिश अपने मां से अधिक अपने अब्बा के करीब थे?
भारत में चाहे उन्होंने कुछ वक्त बिताया हो लेकिन उसके बावजूद वे तवलनी सिंह के बेटे आतिश सिंह नहीं हो पाए। उन्होंने अपने अब्बू सलमान तासीर का बेटा आतिश तासीर बनना पसंद किया। आतिश तासीर को कभी नहीं लगा कि अपनी मां से जाने कि उन्हें मोदी इतने पसंद क्यों है?
प्रोपगेन्डा वेबसाइट के प्रभाव में तासीर
जुलाई 16, 2011 में द वॉल स्ट्रीट जर्नल में आतिश तासीर ने एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था— 'व्हाय माय फादर हेटेड इंडिया'। जिसमें तासीर जुनियर ने तासीर सीनियर के संबंध में लिखा है कि वे भारत से क्यों नफरत करते थे?
भारत के लिए इस हद तक नफरत से भरे आतिश तासीर ने जैसा भारत और उसके लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपने लेख में लिखा, उससे अच्छे विचार की अपेक्षा भी हम उससे नहीं रख सकते। भारत में 2014 के बाद से कई प्रोपगेन्डा वेबसाइट सक्रिय हुए हैं। आतिश तासीर के लेख को पढ़कर यह अनुमान लगाना बिल्कुल कठिन नहीं है कि इन्होंने अपने आलेख का सारा कच्चा माल उन्हीं अफवाह फैलाने वाली वेबसाइटों से इकट्ठा किया है। उनमें एक वेबसाइट तो ऐसी भी है जिसने कुलभूषण जाधव के मामले में निराधार, मनगढ़ंत, झूठी रपट लिखकर अपनी वेबसाइट से हटा लिया। यह लिखकर कि अपडेट के साथ इसे फिर से प्रकाशित किया जाएगा। वह लेख दूबारा उस वेबसाइट पर फिर कभी प्रकाशित नहीं हुई। लेकिन उस वेबसाइट पर एक बार छपा वह लेख अब तक कुलभूषण के खिलाफ पाकिस्तान सबूत के तौर पर पेश करता है।
अब बात मनोज लाडवा की करें तो उनके परिचय में वेवसाइट लिखता है कि वे नरेन्द्र मोदी फॉर पीएम अभियान से जुड़े रहे हैं। ऐसे में मोदी के लिए उनका झुकाव स्वाभाविक होगा लेकिन जब उनके आलेख को आप पढ़ रहे होते हैं, वे अपने विश्लेषण में जमीनी सचाई के अधिक करीब महसूस होते हैं। लेखक सही लिखते हैं कि मोदी जिस तरह की कड़ी आलोचनाओं से गुजरे और अक्सर यह आलोचनाएं अनुचित हुआ करती थीं, ऐसे समय में विरोधियों के हर सवाल का जवाब अपने परिश्रम और काम से देने की कला मोदी के पास ही थी। इतने विरोध के बावजूद पूरे देश को एकजुट करके चलने का जो दम मोदी ने दिखाया, वह दशकों से भारतीय राजनीति में दिखा नहीं था। बहरहाल, नरेन्द्र मोदी के कामकाज को 2019 में एक बार फिर देश की जनता ने देखा और सराहा है। टाइम पत्रिका के लिए मनोज लाडवा ने जो लिखा है, वह भारतीय पाठकों को कोई नई बात नहीं बता रहे। भारतीय जनता मोदी के कामकाज से भली प्रकार से परिचित हैं। उन्हें टाइम पत्रिका की तरफ देखने की जरूरत नहीं। वैसे वामपंथ के झूठ के मकड़जाल में फंसकर जिस प्रकार टाइम का इस्तेमाल मोदी विरोध के लिए किया गया है, उसके बाद नहीं लगता कि भारतीयों के बीच यह पत्रिका इतनी जल्दी फिर पहले जैसा रूतबा हासिल कर पाएगी ।