रायसीना के धुंधलके की रोशनी में
   दिनांक 31-मई-2019

30 मई, 2019 की ये धुंधलाती शाम है। जिस वक्त रायसीना की उठान के तले राष्ट्रपति भवन के अहाते में नई सरकार का मंत्रिमंडल और इरादे आकार ले रहे थे, भारत की राजनीति में कइयों के दिल डूब रहे थे। दिलों का ये डूबना सत्ता की छीजन के कारण पैदा हुआ है और इसके लिए वे खुद जवाबदेह हैं जिन्होंने लंबे समय तक देश की राजनीति को एकध्रुवीय बनाए रखा। जो पार्टी आजादी से पहले सामाजिक भावनाओं का मंच होती थी, उसके जरिये न केवल राजनीति को एकध्रुवीय बनाया गया बल्कि उस पार्टी को भी एक परिवार की जागीर बना दिया गया। इसलिए जब परिवार का तिलिस्म टूटा तो छीजन बढ़ी और इस परिवार को ही सबसे बड़ा सरोकार समझने वालों के दिल डूबने लगे। किंतु चंद घंटे पहले तक कांग्रेस रूठे युवराज को मनाने की कोशिश कर रही थी, और मनाने वालों में वे भी थे जिनकी राजनीतिक उम्र राहुल की कुल उम्र से भी अधिक थी। एक परिवार, एक व्यक्ति के सामने सभी घुटने के बल। भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप अपेक्षा करता है कि ऐसे दृश्य लोगों के दिलो-दिमाग में कुछ देर ठहरें। क्योंकि ऐसे दृश्य बताते हैं कि भारतीय राजनीति में जो संतुलन अपेक्षित था, उसकी भ्रूणहत्या उसी ने की, जिसे इस संतुलन को सहेजने की जिम्मेदारी लोगों ने दी।
वैसे, यह जनादेश जिन बातों को रेखांकित करता है, उनमें संभवतः यह लोकतांत्रिक कसक भी एक हो। इसी वजह से स्वार्थ, पाखंड और छद्म के ये प्रतीक जब दरक रहे थे, भारत नई आशाओं से भरा हुआ था। एक तरफ जनादेश की स्पष्टता थी। जिस भारतीय जनता पार्टी के लिए कहते थे कि गठबंधन के साथ नहीं चल सकती, उसके साथी सबसे अधिक थे। जिसे शहरी मध्यम वर्ग की पार्टी कहते थे, उसने इस भ्रम को तोड़ दिया था। जिसे सिर्फ हिंदुओं और उसमें भी सवर्णों की पार्टी कहते थे, उसने वंचितों का दिल जीत लिया था। जिसे हिंदी बोलने वालों की पार्टी कहते थे, उसने कन्नड़ का किला भी फतह कर लिया था। यह व्याप बताता था कि ये पार्टी नहीं, भारत की आकार ले रही नई आकांक्षाओं का गुलदस्ता है। इसके बरक्स कुछ अंधेरे कोनों में छाई हताशा का विश्लेषण करें तो वह उलटबांसियों में उलझी दिख रही थी।
पहली उलटबांसी तब दिखी जब राहुल ने जब कांग्रेस को पुत्र-मोह से बचने की नसीहत दी। ऐसा करते ही करोड़ों पुतलियां उनकी ओर ही उठ गईं। आखिर प्रभावी राजनीतिक परिवार से इतर राहुल की राजनीतिक बिसात क्या है, पुत्रमोह की बात राहुल करते हैं तो उसका विवेचन खुद राहुल से अलग कैसे हो सकता है?
दूसरी उलटबांसी सेकुलरिज्म की है, जिसका नमूना तृणमूल ने दिखाया। पार्टी का आधार बुरी तरह छीज चुका है। बंगाल विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है और 129 पर भाजपा बढ़त ले चुकी है। इसके अलावा 60 सीटों पर अंतर 4 चार हजार से भी कम वोट का है। तुष्टीकरण की राजनीति ममता को यहां तक लेकर आई है। और वह जिस सेकुलरिज्म की बात करती हैं, उसकी बानगी देखिए। चंद दिन पहले वह कहती हैं,“ जे गोरू दूध देई, तार लातियो खेते होई” यानी जो गाय दूध देती हो, उसकी लात खाने से भी परहेज नहीं। ये है सेकुलरिज्म की छांव में मुसलिम तुष्टीकरण।
तीसरा नमूना विसंगतियों के पर्याय वाम खेमे का है। सबको 'समान' नजर से देखने का दावा करने वाले, किंतु ऐसा हरगिज न करने वाले वामदलों को इस जनादेश ने 'समतल' कर दिया है।
ऐसे समय जब भारत की आकांक्षाएं आकार ले रही हैं, जनादेश प्रबल है, सरकार पर अपेक्षाओं का दवाब है, भारत की राजनीति को भी नए तरीके से परिभाषित करने का, परिमार्जित होने का मौका है। ये मौका है जब कांग्रेस को साबित करना होगा कि गांधी परिवार से बाहर भी कांग्रेस है। ममता को साबित करना होगा कि वामदलों से उनकी लड़ाई के पीछे वास्तव में सामाजिक सरोकार ही था। वाम दलों को मानना होगा कि जिन विध्वंसक विभाजक रेखाओं पर वे खेलते आए, उन्होंने अंततः वामपंथ का के लिए भारी विद्वेष और विभाजन पैदा किया और अंततः उसकी विचारधारा का ही विध्वंस कर दिया। ये तीनों दल अगर इन संदर्भों में आत्म विश्लेषण करते हैं, तो अस्तित्व के जिस संकट से जूझ रहे हैं, उससे पार निकलेंगे। अगर वे सकारात्मक योगदान की इच्छा रखते हैं, तभी इस लोकतंत्र में उनके लिए गुंजाइश बची है वर्ना तो परिवारवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, सामाजिक व्यवस्था विध्वंस, विद्वेष और विदेशी विचारधारा पर चलने वाली राजनीति को तो ये देश पहले ही बुहार चुका है। रायसीना की शाम का संदेश इतना ही था। धुंधलके में भी कुछ चीजें एकदम साफ थीं। जिन्हें दिख रही थीं, उनके लिए भविष्य है, बाकी के लिए तो रात बहुत गहरी है।


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