येचुरी को शांति का प्राचीनतम आराधक समाज भी हिंसक दिखता है
   दिनांक 06-मई-2019
                                                                                                                                        -प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
भारत शांति और वीरता , समृद्धि और संयम , त्याग और पुरुषार्थ का देश है । हिन्दू समाज का यह सत्य विश्व में प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति आज जानता है । तो क्या सीताराम येचुरी नहीं जानते ? अवश्य जानते हैं । परंतु यह बात भी यहीं कही गई है कि"जस आपुन तस आनहु जानी "। अतः येचुरी वह बात कह रहे हैं जो कुसंगति वश उनके मस्तिष्क मे वर्षों से चुरी पकी है 
योगशास्त्र भलीभांति स्पष्ट करते हैं कि देखने वाले का जैसा चित्त होता है , उसे दृश्यमान चीजें , घटनाएं , पुस्तकें और उनमे व्यक्त विचार आदि सब तदानुकूल ही रंजित होकर दिखते हैं ।
पिछले जन्मों के प्रारब्ध वश येचुरी किशोरावस्था से ही कम्युनिस्टों की कुसंगति में पड़ गए । अतः उन्हे भारतीय पदों के अर्थ ही भूल गए ।
भारत में सभी विषयों पर गहनता से चिंतन हुआ है। अतः प्रत्येक पद सुविचारित है । हिंसा , अहिंसा , वीरता , कायरता आदि के भेदों पर यहां सूक्ष्म विचार हुआ ।
योगसूत्र है : सर्वदा सर्वथा सर्व भूतेषु अनभिद्रोह: अहिंसा । सदा सभी प्राणियों और प्रकृति के प्रति द्रोह का सर्वथा अभाव ही अहिंसा है । अन्यों से द्रोह रखना , उनके अस्तित्व को सहन न करना हिंसा है , इसीलिए वे सभी मतवाद जो केवल अपनी दृष्टि या पंथ को रहने योग्य मानते हैं और अन्य को सहन नहीं करते , वे हिंसक हैं । कम्युनिज्म महाहिंसक है ।
इसके वस्तुगत साक्ष्य हैं : मानवों की समता का विचार मानकर ईसाइयत से ऊबे हुये अनेक प्रबुद्ध जन यूरोप मे कम्युनिस्ट बने । जब सचाई देखी तो उसका पूर्ण त्याग कर एक पुस्तक लिखी जिसमे कम्युनिस्ट लोगों द्वारा मारे गए निर्दोष लोगों के आंकड़े संग्रहित किए । पुस्तक का नाम रखा : "ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिस्म: क्राइम्स , टेरर , रेप्रेसन "( कम्युनिस्म की काली किताब : अपराध , आतंक , दमन )। किताब में एकत्र प्रामाणिक विवरणों के अनुसार 1917 से 1990 तक 73 वर्षों मे कम्युनिस्टों ने यूरोप और अमेरिका तथा अफ्रीका मे 9 करोड़ 50 लाख निर्दोष लोगों की हत्याए कीं ।
इसके संपादक हैं स्टीफन कुर्तोइस , निकोलस वर्थ , ज्या लुई पन्ने , एण्ड्रेज पज्कोवस्की, केरेल बार्टोसेक , ज्यां लुई मार्गोलीन । ये सब प्रख्यात कम्युनिस्ट रहे थे।
इन आंकड़ों मे भारत , श्रीलंका , बंगला देश , नेपाल , आदि में की गई हत्याओं के आंकड़े नहीं शामिल हैं क्योंकि इनका प्रकाशन इन देशों के शासन ने नहीं किया क्योंकि शासक स्वयं कम्युनिस्ट झुकाव वाले थे
मैंने अपने द्वारा एकत्र विवरण इसमे जोड़ दिये हैं तो 75 वर्षों मे 13 करोड़ निर्दोष नागरिकों की हत्या वामपंथियों ने की है । इस प्रकार यह विश्व का सर्वाधिक खूनी , हत्यारा , राक्षसी गिरोह है । मानवता का इनसे बड़ा हत्यारा कोई नहीं है । ऐसे भयंकर कुसंग मे प्रारब्ध वश पवित्र भारत भूमि में जन्मे येचुरी पड़ गए इसीलिए उन्होंने ऐसा भयावह असत्य बोला है ।
वस्तुतः वामपंथ की कई समस्याएं हैं और कई विवशताएं हैं । यूरोप में ईसाई थियॉलोजी के नाम पर चर्च पादरियों द्वारा मानव जीवन को बांध दिया गया था , पति पत्नी भी पादरियों के आदेश के अनुसार समागम करें और फिर पत्नी जाकर पादरी को बताए कि समागम रूपी पाप करते समय कौन कौन से सेक्स भाव जागे ताकि वह प्रायश्चित सुझा सके । युवा स्त्री युवा पादरी से एकांत में सटकर ये सब बताएं , इस से बहुत पतन हुआ , व्यभिचार बढ़ा और चर्च की इन व्यवस्थाओं के प्रति घृणा बढ़ी । ऐसे समय ही विज्ञान के सत्य भी उनकी जानकारी में आए , अतः विरोध बढ़ा । मार्क्स इसी समय आये तो उन्होंने ईसाइयत को अफीम कहकर विज्ञान के तर्क रखे और उन्नत प्रौद्योगिकी ही मानव मुक्ति करेगी , यह मत प्रस्तुत किया । यद्यपि मार्क्स भी विकसित मनुष्य केवल यूरोपीय गोरों को ही मानता थे और चाहते थे कि वही लोग दुनिया में राज करें ।
मार्क्स के मन में करुणा भी थी और क्रोध भी । उनके क्रोध वाली भाषा पकड़ कर लेनिन और स्टलिन रूस आकर कुटिल रण नीति द्वारा और पादरियों की मदद से कई चरणों में शासक बन बैठे जो मार्क्स के सिद्धान्त से विपरीत था क्योंकि क्रांति पिछड़े समाज में हो ही नहीं सकती , यह मार्क्स का मत है । इन लोगों ने चर्च की पंथविद्या की जगह राजनैतिक पंथविद्या ( Ideology) को महान बताया ।
नेहरू सोविएत ब्लॉक से जुड़े और भारत में भी वही भाषा बोलने लगे । सोवियत संघ यानी लेनिन और स्टेलिन को यह भा गया। नेहरू ने संसद में यह कहा है कि हम सब स्टालिन युग के बच्चे हैं । गांधी युग का बच्चा स्वयं को नेहरू ने कभी नहीं कहा ।
तो नेहरू और सोविएत संघ की साठगांठ से भारत मे समाजवादी ढांचा लाया गया और भारतीय कम्युनिस्ट इस खेल मे सहायक बने । अतः वे तो खेल जानते ही हैं और झूठ में उन्हें तिल भर परहेज कभी नहीं रहा है और न है। वे किसी न किसी शासक की दलाली के बिना जी ही नहीं सकते । पर शिक्षा और संचार पर 60 वर्षों तक राज्य शक्ति का सम्पूर्ण नियंत्रण होने से सामान्य लोग इस भ्रम में आ गए कि कोई वैचारिक लड़ाई हो रही है। यही इनकी सफलता का आधार है ।
अब ये सोनिया जी के समय से चर्च और कांग्रेस के चालू धड़े की दलाली के लिए हिन्दू धर्म के विरुद्ध विष वमन नए रूप में कर रहे हैं ।
यहाँ आकार एक पेंच फंसता है: विश्व मे सर्वत्र मुसलमान और ईसाई लड़ रहे हैं । सोनिया क्यों इस्लाम के अलगाववादी लोगों के साथ है ? अनुमान है कि इन्होंने अपना काला धन स्विट्ज़रलैंड आदि से निकालकर पाकिस्तान और मुस्लिम देशों में जमा कर दिया है। कम्युनिस्ट तो हैं ही दलाल अतः दलाली पा रहे हैं सो सोनिया जी के संकेत पर ये हिन्दू धर्म के विरुद्ध जहर फैला रहे हैं। यह है येचुरी के नया जहर उगलने का रहस्य ।
(लेख में व्यक्त किए विचार लेखक के निजी हैं)