ममता चिढ़ती हैं ‘श्री राम’ से
   दिनांक 08-मई-2019
- अनिमित्रा चक्रबर्ती                       
'श्रीराम' पश्चिमी बंगाल के लिए कोई नया चरित्र नहीं हैं और पूरे पश्चिमी बंगाल में उन्हें समर्पित दसियों हजार प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। यहा तक कि राज्य के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध, समृद्ध और पुराने शहरों में से एक का नाम कई सदियों से श्रीरामपुर है
‘जय श्री राम’ का जयकारा ममता बनर्जी को इतना क्यों चिढ़ाता है? क्या उनका आत्मविश्वास घट रहा है? या फिर बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी की चुपचाप लेकिन निरंतर बढ़त से वह पहले से ज्यादा घबराहट में हैं? यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरा बंगाल – किसी आईटी प्रोफेशनल की डेस्क से लेकर सड़क किनारे के चाय के खोखे तक – इसी महत्वपूर्ण सवाल के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है। हां, यह सवाल भी ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर सामने आया है जब राज्य में लोकसभा के पांचवें चरण के चुनाव बस खत्म ही हुए हैं और हिंसा तथा झगड़े-झंझट की अपनी दशकों पुरानी परम्परा के अनुरूप ही इस बार की चुनाव प्रक्रिया पर भी क्रूर हिंसा का असर रहा है। क्या इसे तात्कालिक दोष माना जा सकता है? भारत के दूसरे राज्यों के मामले में भले ऐसा मान लिया जाए, लेकिन बंगाल तो हमेशा से इस मामले में औरों से अलग किस्म का मामला रहा है। ऐसे राज्य में जहां आबादी काफी ज्यादा है, अर्थव्यवस्था की रफ्तार कम है और रोजगार के अवसर लगातार घटते जा रहे हैं और माहौल लगातार आंदोलनों से भरा रहता है, वहां हाल के दिनों में तेजी से धार्मिक ध्रुवीकरण होने के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना भी तेजी से बढ़ी है।
पांचवे चक्र के मतदान के दिन अर्थात् 6 मई की निर्वाचन प्रक्रिया पर ही ध्यान केंद्रित करें तो निस्संदेह कहा जा सकता है कि यह कोई अफवाह नहीं है कि निर्वाचन आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बल, दोनों ही खुद को सक्षम साबित करने में असफल रहे हैं। तृणमूल कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर सामान्य मतदाताओं और विपक्षी दलों पर हमले करते हुए लोकतांत्रिक प्रणाली पर बुरा से बुरा प्रहार किया है। यद्यपि कुछ स्थानों पर केंद्रीय बलों को लोकतांत्रिक राजनीतिक वातावरण बनाये रखने की कोशिश करते देखा गया, तथापि दूसरी जगहों पर इसकी भयावह असफलताओं को छिपाया नहीं जा सकता। फिर, दीदी को किस बात की घबराहट है? उन्हें तो शांत रहना चाहिए। लेकिन वह शांत हैं नहीं – यही इस क्षण का पूरा सच है। प्रधानमंत्री पर गंदगी भरी उनकी व्यंग्यपूर्ण टिप्पणियां इस बात का बहुत अच्छा प्रमाण हैं। जब आप के पास तर्क नहीं होते तो उछलकूद और दिखावा ही एकमात्र विकल्प होता है।
तो, क्या ममता बनर्जी का धैर्य अंततः खत्म हो रहा है या फिर वह लेडी मैकबेथ की आधुनिक प्रतिकृति जैसा व्यवहार कर रही हैं? क्या उनके समर्थकों का आधार सिकुड़ रहा है? यह लाख टके का सवाल है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी लोगों समेत बहुतों को पता है कि तृणमूल का समर्थन आधार पहले ही खिसक चुका है और हर दिन बीतने के साथ दूसरे पक्ष की ओर खिंचाव की प्रक्रिया और तेज होती जा रही है। अगर सच कहा जाए तो पूरा बंगाल राज्य आज बहुत ज्यादा ध्रुवीकृत है और मुस्लिम वोट बैंक को साधे रखने के लिए ममता के हिज़ाब ओढ़ने के विचित्र प्रयोग के बारे में पूरा देश जानता है।
चोटी के एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार इस बात की संभावना हमेशा रहती है कि ऐसे अनियंत्रित आचरण की उतनी ही तीव्रता के साथ प्रतिक्रिया हो और विभाजन की पीड़ा से अब तक न उबर सके बंगाल के उग्र वातावरण में ऐसा होता है तो इसके दुष्परिणाम होंगे। कमजोर सांगठनिक ढांचे और नेताओं के बीच छोटे-छोटे मुद्दों पर खींचतान तथा निश्चित उद्देश्य के अभाव के बावजूद भारतीय जनता पार्टी की बंगाल ईकाई ही आजकल लोगों के आकर्षण का केंद्र है। (इसमें केंद्र में मोदी सरकार का होना भी एक कारण है)। पश्चिमी बंगाल में रहने वाले लोगों के भी श्रीराम आराध्य हैं. हिज़ाब पहनने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री डरी हुई हैं.
पिछले कुछ महीनों से तृणमूल कांग्रेस द्वारा प्रमाणित बंगाली बुद्धिजीवियों का एक वर्ग श्री रामचंद्र को बंगाल में अवांछित तत्व के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता रहा है। सोशल मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार शुरुआत में उन्हें थोड़ी सफलता भी मिली। लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं था कि 'श्रीराम' पश्चिमी बंगाल के लिए कोई नया चरित्र नहीं हैं और पूरे पश्चिमी बंगाल में उन्हें समर्पित दसियों हजार प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। यहा तक कि राज्य के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध, समृद्ध और पुराने शहरों में से एक का नाम कई सदियों से श्रीरामपुर है। इतना ही नहीं, रामकृष्ण परमहंस के पिता खुदीराम चटर्जी भी रघुबीर के बड़े भक्तों में से थे और उनके पैतृक आवास में श्रीराम की पूजा होती थी।
ऐसे में पूरा अभियान और आम बंगाली हिंदू जनमानस में श्री श्री राम तथा उत्तर भारतीय प्रभाव के प्रति एक तरह का दुराव पैदा करने के तृणमूल कांग्रेस के बेतुके प्रयास बेकार हो गए हैं और यह हार दीदी और उनके चेले-चपाटों का नेतृत्व बरकरार रखने में सबसे भयावह खतरा साबित हो रही है।
अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि बंगाल में अब हिंदुत्व ही सबसे ज्यादा प्रभावी विचार है लेकिन इसमें संदेह नहीं कि अब यह इन दिनों बहुप्रचलित हो रहे वाम सिद्धांतों के विपरीत अपना वैचारिक मत आगे बढ़ाने की स्थिति में आ गया है।
आखिरी लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि जय श्रीराम का उद्घोष बंगाली हिंदुओं के बीच सभी विषम परिस्थितियों और मुसलमानों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़नों के विरुद्ध युद्धघोष के रूप में गूंज रहा है। लोगों की यही मनःस्थिति दीदी को बहुत डरा रही है। संक्षेप में ‘जय श्री राम’ बंगाल में तेजी से बढ़ रही हिंदुत्व गाथा का प्रतीक बन गया है और इसीलिए दीदी को इससे चिढ़ है।