भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जब जनता ने नकार दिया था कांग्रेस को
   दिनांक 08-मई-2019

यह बात उस समय की है जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, पायलट की नौकरी छोड़ कर राजनीति में आये राजीव गांधी 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' बने थे. कुछ ही समय बाद उन्हें 'मिस्टर क्लीन' कहा जाने लगा था. उसकी वजह यह थी कि वह कुर्ता - पैजामे की जगह सफ़ेद रंग की शर्ट - पैंट या सूट ज्यादा पहनते थे. बोफोर्स तोप की 'डील' में दलाली खाने के आरोप में उनकी सरकार चली गई थी. जनता ने उनकी जनसभाओं में नारा लगाया था -- "मिस्टर क्लीन! मिस्टर क्लीन ! गंदी क्यों है तोप मशीन." कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी अब बोफोर्स तोप के आरोप पर बोलने के बजाय राजीव गांधी को शहीद बता कर मुद्दे को भावनात्मक मोड़ देने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं. वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा था बोफोर्स तोप दलाली काण्ड. पूरे देश की जनता ने कांग्रेस को नकार दिया था और वी.पी. सिंह के जनता दल को भारी समर्थन मिला था.
प्रधानमंत्री ने आखिर क्यों कहा भ्रष्टाचारी नंबर वन -
क्वात्रोची को शायद कुछ लोग भूल गए होंगे. जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब सोनिया गांधी की वजह से क्वात्रोची की प्रधानमंत्री आवास में बे रोक- टोक आवाजाही थी. क्वात्रोची, सोनिया गांधी के मायके पक्ष का काफी करीबी बताया जाता था. बोफोर्स तोप घोटाला हुआ. इस घोटाले में क्वात्रोची की भूमिका संदिग्ध थी. पूरे देश की जनता आक्रोशित हो गयी. हरेक नागरिक इस बात को सुनकर क्रोध से भर उठा था कि सेना के लिए खरीदी गयी तोप में दलाली खायी गई. विपक्ष के प्रहार के सामने राजीव गांधी टिक नहीं पाए.
इस लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा दो बार उठ चुका है. पहली बार एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि " इनके ऊपर पाप का बोझ है. वह पाप है उनके पिता जी का. उनके पिता राजीव गांधी ने बोफोर्स तोप का घोटाला किया था. इसीलिए बार -बार राफेल का मुद्दा उठाते हैं" अभी कुछ दिनों पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी कहा था कि "बोफोर्स तोप का घोटाला कांग्रेस के जमाने में हुआ था इसलिए कांग्रेस कतई भरोसे के लायक नहीं है. देश के रक्षा सौदे में दलाली ली गई थी.
ऐसे हुआ था बोफोर्स तोप घोटाले का खुलासा-
बोफोर्स तोप घोटाले की कहानी कुछ यूं शुरू हुई थी. कांग्रेस की सरकार में वी.पी. सिंह वित्त मंत्री थे. वित्त मंत्रालय की तरफ से कुछ उद्योगपतियों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी. उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी चाहते थे कि उन उद्योगपतियों के प्रति नरम रूख अपनाया जाए. मगर बात नहीं बनी. राजीव गांधी नाराज हो गए और उन्होंने वी.पी. सिंह का मंत्रालय बदल कर उन्हें रक्षा मंत्रालय दे दिया. राजीव गांधी पायलट थे और अपनी माता इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने थे. उसी दौरान क्वात्रोची के माध्यम से बोफोर्स तोप की डील हुई थी. वी.पी. सिंह ने इस मामले को पूरे देश के सामने इस तरह पेश किया था कि कांग्रेस की हवा निकल गई थी. वी. पी. सिंह ने सरकार से अलग होने के बाद जनता दल बनाया और वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता के बीच उतरे. बोफोर्स तोप में दलाली ही उनका प्रमुख मुद्दा था यानी कि राष्ट्रीय सुरक्षा.
याद होगा यूपीए – 2 की सरकार का कार्यकाल जब पूरा हो रहा था. देश का हर नागरिक भ्रष्ट्राचार से पूरी तरह ऊब चुका था. यही वजह थी कि जब ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का आन्दोलन चला तो दिल्ली से लेकर देश के हर जनपद तक लोग सड़कों पर उतर आये थे. वी.पी. सिंह को भी कुछ इसी तरह का जन समर्थन उस दौर में मिलने लगा था. कांग्रेस पार्टी के लोग समझ नहीं पाए कि आपातकाल के बाद अब दूसरी बार कांग्रेस को बड़ा झटका लगने जा रहा था. उस समय की जनसभाओं में वी. पी. सिंह अपनी शेरवानी में से एक कागज की पर्ची निकालते थे और दिखाते हुए कहते थे कि “इसी पर्ची में बोफोर्स तोप में दलाली करने वालों का नाम लिखा हुआ है.” इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारत में जो हमदर्दी की लहर चली थी उसमे कांग्रेस को 426 सीटें मिली थी. मगर नौवीं लोकसभा के चुनाव में बोफोर्स तोप के मुद्दे ने कांग्रेस की सीटों को आधे से कम पर समेट दिया था . कांग्रेस को 195 सीटें ही मिलीं. लोकसभा में बहुमत किसी दल को नहीं मिला. राजीव गांधी ने उस समय कहा कि " हमारी हार हुई है हम विपक्ष में बैठेंगे." जनता दल को 142 सींटे मिली थीं. अन्य दलों का समर्थन लेकर वी.पी. सिंह दिसंबर 1989 में प्रधामंत्री बने . वी.पी. सिंह ने बोफोर्स तोप के दलालों की पर्ची फिर दोबारा कभी अपनी शेरवानी की जेब से नहीं निकाला. ग्यारह महीने के कार्यकाल में पहले मंडल और फिर कमंडल में उनकी सरकार चली गयी.
क्वात्रोची , राहुल गांधी के घर में बेधड़क आया जाया करता था. राहुल गांधी का ननिहाल इटली में है. उनके ननिहाल के बारे विस्तृत विवरण आज तक किसी भारतीय को नहीं मालूम है. जबकि आम तौर पर कोई भी ऐसा व्यक्ति जो ‘पब्लिक डोमेन’ में है उसके ददिहाल और ननिहाल की जानकारी सभी को रहती है. इसके अतिरिक्त कई अन्य ऐसे कारण थे जिसकी वजह से राजीव गांधी जनता की अदालत में यह साबित करने में असफल रहे थे कि बोफोर्स तोप की डील में दलाली नहीं हुई थी. बोफोर्स तोप की जांच सी. बी. आई. को दी गयी थी. यह जांच इतनी पेंचीदा थी कि वर्ष 1995 तक चल रही थी. उस समय पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे. राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी राजनीति में नहीं आईं . पी.वी. नरसिम्हा राव को यह भय था कि अगर सोनिया गांधी, राजनीति में आ गईं तो कांग्रेस में पार्टी का नेतृत्व उनके हाथ से सरक सकता है इसलिए उन्होंने बोफोर्स की जांच के मामले को पूरी तरह गर्माए रखा. इसी जांच के डर से सोनिया गांधी ने राजनीति की तरफ रूख नहीं किया.