जंगल बचाने हैं तो करने होंगे सकारात्मक प्रयास
   दिनांक 14-जून-2019
 
                                                                                                                                                 - पूनम नेगी                      
“ उत्तराखंड के जंगलों में अब तक डेढ़ हजार से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं ” 
 
गर्मियों के मौसम में पहाड़ों में आग लगने की घटनाएं बीते कुछ हर सालों से लगातार सुर्खियों में रहती हैं। इस साल भी उत्तराखंड के जंगलों में अब तक डेढ़ हजार से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उत्तराखंड के चंपावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली और रुद्रप्रयाग आगजनी से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं। जानकारों की मानें तो देवभूमि की दावाग्नि में इस साल कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में तकरीबन 25,52 हेक्टेयर क्षेत्र आग की चपेट से तबाह हो गया। 130 से ज्यादा लोग असमय काल के गाल में समा गये।
इंसानी जानों के बड़ी संख्या में पशु पक्षी भी इस दावाग्नि की भेंट चढ़ गये। लाखों की कीमत की जंगली वनस्पति व बेशकीमती जड़ी-बूटी नष्ट हो गयी। इस आगजनी से संरक्षित वन क्षेत्र, राष्ट्रीय पार्क और वन्यजीव अभ्यारण्यों के साथ पर्वतीय अंचल के प्राकृतिक जलस्रोत भी प्रभावित हुए हैं। हालांकि एनडीआरएफ का दावा है कि जंगलों में लगी आग पर 70 फीसदी काबू पा लिया गया है मगर खेद का विषय है कि उत्तराखंड के जंगल आज भी धधक रहे हैं और हिमालय की बेशकीमती सम्पदा को बचाने में नाकाम वन विभाग संसाधनों की कमी का रोना रो रहा है।
आमतौर पर पहाड़ों पर प्रदूषण चर्चा का विषय नहीं होता मगर इस वक्त पर्वतीय अंचल पर छाया धुएं का गुबार हैरान करने वाला है और प्रदूषण पर नए सवाल खड़ा कर रहा है। जंगलों की आग से इन दिनों पहाड़ों की फिजा इस कदर खराब होती जा रही है कि लोगों की सेहत संबंधी दुश्वारियां बढ़ गयी हैं। श्वास रोगियों और अस्थमा पीड़ितों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। आलम यह है कि गर्मियों की छुट्टियां बिताने पहाड़ आने वाले पर्यटक वापस लौट रहे हैं। गौरतलब हो कि उत्तराखंड में पर्यटन व्यवसाय आमदनी का एक प्रमुख जरिया है मगर आगजनी की वारदातों से इस पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। पर्यावरण विज्ञानियों का कहना है कि जंगलों में लगी आग से पैदा हुआ काला कार्बन हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का कारण बन सकता है और जमी हुई नदियों के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में जंगलों की आग के ग्लेशियरों पर पड़ने वाले दुष्परिणामों के बारे में बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के "सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज" के वैज्ञानिकों का शोध अध्ययन बताता है कि पहाड़ों में आगजनी की बढ़ती वारदातों से काला कार्बन के जमने के कारण और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटान से हिमालय की निचली श्रृंखलाओं में मौजूद पीर पंजाल और ग्रेटर हिमालय जैसे अनेक हिमखंडों के पिघलने की आशंका नकारी नहीं जा सकती।
 
पर्यावरण वैज्ञानिक एवी कुलकर्णी कहते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में मानवीय या प्राकृतिक कारणों से जमाव वाले क्षेत्रों में काले कार्बन के एकत्र होने की वजह से बर्फ की परावर्तन क्षमता में बदलाव आना शुभ संकेत नहीं है क्योंकि काला कार्बन प्राकृतिक धूल की तुलना में कहीं ज्यादा विकिरण सोख लेता है।
बताते चलें कि उत्तराखण्ड का भौगोलिक क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किलोमीटर है। इसके कुल 65 प्रतिशत वन क्षेत्र में करीब 40 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में चीड़ के जंगल फैले हुए हैं। जानकारों के मुताबिक चीड़ के वृक्ष की व्यावसायिक व औषधीय उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता मगर चीड़ के जंगल और लैंटाना की झाड़ियां इस वन क्षेत्र में लगने वाली आग को फैलाने में सबसे ज्यादा सहायक होती हैं।
चीड़ के पेड़ों की पत्तियों में एक विशेष किस्म का ज्वनलशील पदार्थ होता है जिसकी ज्वलनशीलता गर्मियों में बहुत अधिक बढ़ जाती है। पर्यावरण विज्ञानियों की मानें तो मध्य हिमालयी क्षेत्रों में आज जिस शान से चीड़ के पेड़ सिर उठाए हुए हैं वहां पहले देवदार, बांज, बुरांश, पय्या जैसे पहाड़ों के घरेलू वृक्ष हुआ करते थे। ब्रिटिश उपनिवेश काल के दौरान अंग्रेजों ने इन पेड़ों को कटवाकर यहां बड़े पैमाने पर चीड़ के पेड़ लगवा दिये गये थे। कारण कि उस दौर में तेज औद्योगिक विकास के लिए ऐसी लकड़ी की जरूरत थी जिसके पेड़ जल्दी उगें साथ ही जो टिकाऊ भी हो। मगर चीड़ की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह जमीन से बड़ी तादात में पानी खींचता है, इसीलिए पानी के प्राकृतिक स्रोत चीड़ के जंगलों में पनप ही नहीं पाते। इसके इतर देवदार, बांज, बुरांश जैसे में देशज पेड़ों में पानी को जड़ों में जमाए रखने की असाधारण क्षमता होती है।
बताते चलें कि पहाड़ों के जंगलों को आग से बचाने के लिए आजादी के बाद से दर्जनों सामाजिक संगठन आन्दोलन कर चुके हैं लेकिन कोई ठोस उपाय आज तक नहीं निकल सका है। अलबत्ता इस चमोली जिले के उपरेवल गांव का प्रयोग वाकई कारगर साबित हुआ है। गुजरी सदी के 80 के दशक में इस गांव के लोगों ने अपने आसपास पीपल, देवदार, अखरोट और काफल तथा देवदार व बुरांश जैसे हिमालयी मूल के पेड़ रोपे थे उनकी बदौलत इस गांव में बीते दो दशकों से आग का तांडव नही हुआ। उनकी देखा देखी जिन तकरीबन 100 गांवों के लोगों ने इन देशज पौधों को रोपा वे भी कमोवेश दावाग्नि की आपदा से बचे रहे।
 
पर्यावरण विशेषज्ञ अनिल जोशी कहते हैं कि यदि वन विभाग क्षेत्रीय ग्रामीणों के साथ मिलकर इन देशज वृक्षों का संरक्षण करता तो आज शायद देवभूमि के जंगलों की यह दुर्दशा न होती। हालांकि जंगल में आग लगने के और भी कई कारण होते हैं। जैसे गर्मी की तपिश के चलते पहाड़ियां शुष्क हो जाने से जब चट्टानें खिसकने लगती हैं तो अक्सर घर्षण से भी आग लग जाती है। तेज हवा चलने पर जब बांस परस्पर टकराते हैं तो इस टकराव से पैदा होने वाले घर्षण से भी आग लग जाती है। बिजली गिरना भी आग लगने के कारणों में शामिल है। आग लगने की मानवजन्य अन्य वजहों में बीड़ी-सिगरेट भी हैं तो कभी शरारती तत्व भी आग लगा देते हैं। किन्तु मानव जनित जिन कारणों से आग लगती है, वे वाकई खतरनाक हैं। वन-सम्पदा के दोहन से अकूत मुनाफा कमाने की होड़ में शामिल भू-माफिया, लकड़ी माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ की तिकड़ी ऐसे हादसों का बड़ा कारण है।
जरा विचार कीजिए कि जंगलों पर वन विभाग का अधिकार प्राप्त होने से पहले तक हमारे वन कितने सुरक्षित थे। वजह थी प्रकृति और मनुष्य के बीच सह-अस्तित्व की प्रगाढ़ भावना। सभ्यता के विकासक्रम में मनुष्य ने मनुष्येतर प्राणियों और पेड़-पौधों के महत्त्व को समझा और मगर जब से हमारे जीवन पर पाश्चात्य शैली व बाजारवादी अवधारणा हावी हुई; लोगों और वनों के बीच दूरी तो बढ़ती गयी। अब लोग जंगलों को सरकारी सम्पत्ति मानने लगे हैं। इसलिये जब जंगलों में आग लगती है तो ग्रामीण तत्काल आग बुझाने को उत्सुक नहीं होते।
सही कहा गया है कि देवभूमि के ये जंगल उपभोगवादी पर्यटन संस्कृति के लिये न होकर साधना और सह-अस्तित्व के लिये हैं। आश्रय और रोजी-रोटी के लिये हैं। इसलिये दावाग्नि से हुई हानि केवल देश के लिये ही नहीं, बल्कि वैश्विक मानव-समुदायों के लिये भी बड़ी क्षति है।