उबल रहे बलूच पाकिस्तान से लड़ने को तैयार
   दिनांक 17-जून-2019
 - डेरा बुगती से हुनक बलोच                                      
बलूचिस्तान में पाकिस्तान सारी हदें पार कर रहा है। बलूच प्रदर्शनकारियों को घर से निकालकर पीटा जा रहा है। उन पर अत्याचार किए जा रहे हैं लेकिन दुनिया ने अपनी आंखें मूंद रखी है
अपने पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध प्रदर्शन करते बलूच 
पाकिस्तान कहता है, ''कश्मीर में जो हो रहा है, वह वहां के लोगों के दिलों में भारत से अलग होने की ख्वाहिश का इजहार है।'' अगर ऐसा है तो बलूचिस्तान में आजादी की बहाली के लिए जान कुर्बान करने को दहशतगर्दी कैसे कहा जा सकता है? दरअसल, कश्मीर और बलूचिस्तान में कोई तुलना नहीं। अगर दोनों जगह में कोई एक जैसी चीज है तो वह है पाकिस्तानी दहशतगर्दी। इन दोनों का मुजरिम पाकिस्तान है। कश्मीर में तब के शासक के भारत के साथ जाने के फैसले को आप नहीं मानते और न ही आप आजाद बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा करने को गलत मानते हैं। यह सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान का पाखंड है, जो दहशतगर्दी को हथियार बनाकर सियासी मंसूबों को हासिल करने का सपना देखता है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हों या फिर विदेश मंत्री, इन्हें जब भी मौका मिलता है, कश्मीर में हो रही हिंसा को मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं। तो सवाल यह उठता है कि क्या बलूचिस्तान में वही सब हो रहा है जो कश्मीर में हो रहा है? नहीं, बिल्कुल नहीं। दोनों के हालात अलग हैं, दोनों की तारीख (इतिहास) अलग है, दोनों जगह पर हो रही जद्दोजहद की वजह अलग है। बलूचिस्तान की आजादी की मुहिम चलाने वाले अशफाक अहमद कहते हैं, ''अगर आप कश्मीर के बरक्स बलूचिस्तान की बात करेंगे तो दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। लेकिन ये महज इत्तेफाक नहीं कि दोनों ही मामलों में मुजरिम पाकिस्तान है। उसने कश्मीर और बलूचिस्तान, दोनों जगह पर हस्तक्षेप किया और इंसानी हकूक के नाम पर अपनी मुहिम चलाई। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्तूबर, 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार के साथ समझौता किया था, जिसके अनुसार उन्होंने अपनी रियासत को भारत का हिस्सा बनाना कबूल किया था। जबकि एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान की पैदाइश से पहले बलूचिस्तान की मौजूदगी थी। वहां एक सत्ता और पाकिस्तान के साथ जाने से कलात की असेंबली इनकार कर चुकी थी। उसके बाद पाकिस्तान ने कलात के खान से जबरदस्ती दस्तखत कराकर बलूचिस्तान पर 27 मई, 1948 को जबरन कब्जा कर लिया।''
बलोच मामलों के जानकार बाबुल बलोच भी मानते हैं कि पाकिस्तान पूरे इलाके में अमन के लिए खतरा है और उसके प्रधानमंत्री इमरान खान आज जो भी कदम उठाते दिख रहे हैं, वे दरअसल, संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी दबाव का परणिाम है। वे पाकिस्तान को ऐसा मक्कार मुल्क मानते हैं जिसके डीएनए में ही गड़बड़ी है। वे कहते हैं, ''कश्मीर और बलूचिस्तान में चल रहे संघर्ष का तुलनात्मक जायजा एक गैरमुनासिब बात है। उस समय कश्मीर में बादशाहत थी और बलूचिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई असेंबली। कश्मीर में हरि सिंह ने जो करार किया, वह उचित था, जबकि बलूचिस्तान में कलात के खान से जबरन कराया गया दस्तखत पूरी तरह गलत। कलात पर जबरन किए गए कब्जे को अंग्रेजों ने भी मंजूर नहीं किया था।'' वे कहते हैं, ''जिस वक्त पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर कब्जा किया, उस समय वहां कलात नेशनल पार्टी हुकूमत में थी, जो लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतकर आई थी। पाकिस्तानी कब्जे का विरोध हर वर्ग ने किया था।'' अशफाक कहते हैं, ''तब क्या हुआ, क्यों हुआ, किन हालात में हुआ, यह अपने आप में बड़ा सवाल है और ऐसा लगता है कि बड़े मुल्कों के मतलबी खेल में बलूचिस्तान को मोहरा बनाकर छोड़ दिया गया। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका समेत इंसानी हकूक के तमाम पैरोकार मुल्कों को क्या हो गया? क्या उन्हें दुनिया के इस इलाके में जो हो रहा है, उसका अहसास नहीं है? आखिर वे किस कारण चुप बैठे हैं? क्या इसका यह नतीजा निकालना वाजिब नहीं होगा कि दुनिया ने इस वजह से आंखें मूंद रखी हैं कि यहां सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) की बदौलत चीन जैसे ताकतवर मुल्क की भी मौजूदगी हो गई है? लेकिन साउथ चीन समंदर में तो चीन के कदमों का अमेरिका समेत दुनिया मुखालफत तो कर रही है। शायद बलूचिस्तान उनकी नजरों से इसलिए दूर है कि यहां के हालात दुनिया के लिए कायदे बनाने का इख्तियार रखने वाली ताकतों की सेहत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं डालते।'' उन्होंने कहा कि हमने जिस तरह की व्यवस्था अपना रखी है, उसमें इंसानी ख्यालों को कितनी अहमियत दी जाती है, इसकी बड़ी मुनासिब मिसाल है कश्मीर पर राष्ट्र संघ का रायशुमारी की बात करना। उस वक्त हरि सिंह को अपनी रियासत के बारे में फैसला लेने का हक था, लेकिन फिर भी यह कहा गया कि वहां रायशुमारी होगी ताकि यह पता चल सके कि अवाम क्या सोचती है। यह और बात है कि इसकी पहली शर्त यह थी कि पाकिस्तान अपनी फौज को पूरे इलाके से वापस बुलाएगा और कब्जा किए जम्मू-कश्मीर के इलाके को छोड़ेगा। लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया। बाबुल बलोच कहते हैं, ''कश्मीर में जो आज के हालात हैं, उसमें भारत के हुक्मरानों को भी बरी नहीं किया जा सकता। घाटी में कश्मीरी मुसलमानों ने लाखों हिंदुओं के साथ जिस तरह का वहशियाना सलूक कर उनमें खौफ पैदा कर दिया और उन लोगों को वहां से पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया, यह भारत सरकार ने कैसे होने दिया? आप अगर अपने घर का कोई दरवाजा खुला छोड़ देंगे, तो पाकिस्तान जैसे दहशतगर्द तो उससे अंदर आएंगे ही। 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' जैसे नारे अगर घाटी में लगाए जाते हैं, तो इससे साफ है कि वहां के हालात के लिए कौन जिम्मेदार है। बलूचिस्तान में हम तो बिल्कुल ही अलग तरह के हालात से दो-चार हो रहे हैं। हमारी लड़ाई तो कब्जागीर मुल्क से है और हम उस दरवाजे को बंद करने की ख्वाहिश में जद्दोजहद कर रहे हैं जिसे 1948 में जबरन खोलकर पाकिस्तान अंदर घुस आया था।''
क्वेटा विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले मुरीद मुतमईन (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ''कश्मीर और बलूचिस्तान के मामले में बुनियादी फर्क है, बेशक दोनों जगह पर दहशतगर्दी की वजह पाकिस्तान है। कश्मीर के मामले में सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर वहां के लोग पाकिस्तान के साथ क्यों जाना चाहेंगे? यह बात जगजाहिर है कि पाकिस्तान के आर्थिक हालात खासे बुरे हैं। दूसरी बात, पाकिस्तान ने जिस दहशतगर्दी को अपनी ताकत बनाया, अब उसी की वजह से अंदरूनी और बाहरी तौर पर उसे खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। गिलगित-बाल्टिस्तान से लेकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा तक उससे अलग होने के ख्वाहिशमंद हैं। ऐसे में कश्मीर के लोग उससे जुड़ना क्यों चाहेंगे? कश्मीर घाटी में जो विरोध प्रदर्शन दिख रहे हैं, वे चंद पाकिस्तानपरस्त लोगों की करतूत है और इन जुलूसों में शामिल होने वाले ज्यादातर वे लोग हैं जिनकी मजबूरी है कि वे ऐसे लोगों के साथ खड़े दिखें, नहीं तो उनके जान-माल के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।''
मुरीद कहते हैं, ''हमारा वास्ता ऐसे दिमागी मरीज से है जिसके हाथों में दहशतगर्दी का हथियार है और उससे वह अच्छे-भले बलूचों का ही 'इलाज' कर रहा है। वे मारने से बाज नहीं आ रहे और उनके हर हमले से कुछ कर गुजरने का बलूचों का हौसला और बुलंद होता जा रहा है।'' इसका अर्थ तो यही हुआ कि बलूच पाकिस्तान से लड़ने के लिए तैयार हैं और इसका परिणाम आने वाले दिनों में देखने को मिल सकता है। *