पाखंड का दूसरा नाम-भारतीय सेकुलर मीडिया
   दिनांक 17-जून-2019
 
“ आज खबरें देने को महज रस्म अदायगी मानने वाला मीडिया अपने मूल उत्तरदायित्व व कर्तव्य के प्रति उदासीन”

 
मुख्यधारा मीडिया के अनुसार भाजपा शासित राज्यों में होने वाले अपराध की हर छोटी-बड़ी घटना का सीधा संबंध वहां के मुख्यमंत्री और कई बार प्रधानमंत्री से होता है। लेकिन यही मीडिया बंगाल में हिंसा के लिए जिम्मेदार नेता का नाम अब तक नहीं पता कर पाया है। जब भाजपा नेता मुकुल रॉय ने कहा कि उनके कार्यकर्ता ममता बनर्जी के निर्देश पर मारे जा रहे हैं तो कुछ चैनलों को यह बयान 'अजीबोगरीब' लगा। न्यूज18 ने कहा कि मुकुल रॉय हिंसा का ठीकरा ममता पर फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। एबीपी न्यूज के मुताबिक 'मुकुल रॉय हिंसा की राजनीति कर रहे हैं।' भारतीय मीडिया का यह पाखंड ही उसकी पहचान है। यह एकतरफा राजनीतिक हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी 'ठीकरा फोड़ना' और 'राजनीति करना' जैसे शब्द इस्तेमाल करता है। ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब बंगाल में किसी भाजपा समर्थक की हत्या न हो, पर दिल्ली का मीडिया इसे दोतरफा लड़ाई के तौर पर दिखा रहा है।
बंगाल में जारी 'राजनीतिक नरसंहार' में मीडिया भी शामिल है, जिसने यह तय किया है कि वह आंख, कान और मुंह बंद रखेगा। रस्म अदायगी के नाम पर थोड़ी-बहुत खबरें दिखाई जाती हैं, पर उनका उद्देश्य आंखों में धूल झोंकना है। कोलकाता के एक अस्पताल पर मजहबी भीड़ ने हमला किया और दो डॉक्टरों को बुरी तरह से पीटा। पर भीड़ की हिंसा पर कोहराम मचाने वाले दिल्ली के मीडिया ने इस घटना पर भी चुप रहना ही ठीक समझा।
अलीगढ़ में हुई 3 साल की बच्ची की निर्मम हत्या ने मीडिया के इसी पाखंडपूर्ण चरित्र को फिर से सामने ला दिया। करीब 3-4 दिन तक चुप्पी साधे रहने के बाद सोशल मीडिया के दबाव में चैनलों ने दिखाना शुरू किया तो इस ताने के साथ कि मामले को मजहबी रंग देने की कोशिश की जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने कार्टून छापा जिसमें उन लोगों का मजाक उड़ाया गया, जिन्होंने सोशल मीडिया पर 'जस्टिस फॉर ट्विंकल' नाम से अभियान चलाया। सभी चैनलों और अखबारों ने पीडि़त के गांव में जाकर खबर दिखाने की रस्म पूरी की, पर 'स्वराज्य' की संवाददाता स्वाति गोयल शर्मा ने सफाईकर्मी के बयान के सहारे न सिर्फ इस हत्याकांड के मानवीय व सामाजिक पहलुओं को उजागर किया, बल्कि उन्हें मिल रही धमकियों की खबर भी छापी, जिन्होंने कचरे के ढेर में पड़ी बच्ची को सबसे पहले देखा था।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता फिर से खबरों में है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने सोशल मीडिया पर हिन्दू धर्म के प्रतीकों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने और अफवाहें उड़ाने वाले एक तथाकथित पत्रकार को गिरफ्तार किया। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन मानते हुए उसे उसे तुरंत रिहा कर दिया। क्या ऐसी ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे मजहबों-मतों को लेकर अभद्र भाषा प्रयोग करने वालों को भी मिलेगी? जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया था, वह पत्रकार भी नहीं है। लेकिन उसके लिए एडिटर्स गिल्ड से लेकर तमाम दूसरी पत्रकारीय संस्थाएं सक्रिय हो गईं, जबकि यही संस्थाएं तब चुप्पी साध लेती हैं जब कांग्रेस या वामपंथ शासित राज्यों में किसी वास्तविक पत्रकार को सरकारी तंत्र का शिकार होता है। सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर मुकदमा दर्ज करने के मामले में केरल देश में अव्वल है। यहां वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री की आलोचना करने पर 119 लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जा चुकी है।
जम्मू के कठुआ में एक बच्ची की हत्या पर अदालत का फैसला आया। जिस लड़के को मुख्य आरोपी बताया गया था वह आरोपमुक्त हो गया। उस घटना के बाद जब प्रायोजित तरीके से हिन्दू प्रतीकों पर हमले किए जा रहे थे, तब सिर्फ जी न्यूज ने सबूतों के साथ दिखाया था कि जम्मू-कश्मीर पुलिस जिसे हत्यारा और बलात्कारी बता रही है, वह घटना के दिन वहां था ही नहीं। इससे संदिग्ध तरीके से तैयार पुलिस के आरोपपत्र के आधार पर लोगों को दोषी ठहराने की मीडिया की कोशिश को जोरदार तमाचा लगा। इसके बावजूद यह विमर्श कहीं नजर नहीं आया कि आखिर क्या कारण था कि जम्मू-कश्मीर पुलिस और कुछ आतंकवाद समर्थक लोग इस केस में बहुत दिलचस्पी ले रहे थे। क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि पुलिस ने किसके इशारे पर निर्दोष को फंसाने की कोशिश की?