काठमांडू में भारत के लिए चीन की गहरी साजिश
   दिनांक 18-जून-2019
नेपाल के कई विद्यालयों में चीनी भाषा मंदारिन को अनिवार्य कर दिया गया है. चीन लगातार नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. यह भारत के लिए ठीक नहीं है. पर्वतीय और मैदानी इलाकों में बंटी नेपाली राजनीति को भारत के खिलाफ एकजुट करने का वामपंथी सपना हमें तोड़ना ही होगा.
ताज़ा खबर है कि नेपाल के कई विद्यालयों में चीनी भाषा मंदारिन को अनिवार्य कर दिया गया है. इसमें राजधानी काठमांडू के अलावा नेपाल के अन्य शहरों के विद्यालय भी शामिल हैं. मंदारिन पढ़ाने वाले शिक्षकों का खर्च चीनी दूतावास उठा रहा है. नेपाल के एक बाद शिक्षा संस्थान यूनाइटेड स्कूल के प्राचार्य कुलदीप नुपाने ने एक अखबार हिमालयन टाइम्स को बतलाया कि दो साल पहले चीनी दूतावास ने निशुल्क मंदारिन शिक्षक उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव दिया. तबसे वो इसे अनिवार्य रूप से अपने संस्थान के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. एक अन्य विद्यालय के प्राचार्य हरि दहल ने भी अखबार को बतलाया कि मंदारिन शिक्षक का वेतन चीनी दूतावास से आता है. विद्यालय केवल शिक्षक के रहने-खाने का खर्च उठाता है. चीन के लिए नेपाल के सत्ताधीश वामपंथी नेताओं ने अपने दरवाज़े खोल रखे हैं. चीन की व्यापारिक उन्नति की चमक से नेपाली युवाओं और अभिभावकों की आंखें चकाचौंध हो रही हैं. उन्हें लगता है कि मंदारिन सीखकर रोजगार के बेहतर अवसर हासिल किए जा सकते हैं, इसलिए मंदारिन की पढ़ाई स्वीकार्य भी हो रही है. चीन नेपाल में लंबी पारी खेलने के इरादे दिखा रहा है.
अप्रैल 2015 में नेपाल में भयंकर भूकंप आया. 9000 जानें गईं. 22 हजार घायल हुए. 35 लाख लोग बेघर हो गए. एक हजार करोड़ अमरीकी डॉलर का नुकसान हुआ जो नेपाल की जीडीपी के आधे के बराबर है. भारत ने तत्काल सहायता भेजी, चीन ने भी  इस भूकंप ने नेपाल को पंगु बना दिया. इसके 11 महीने बाद मार्च 2016 में नेपाल ने चीन के साथ समझौता किया और नेपाल को चीन के बंदरगाहों को उपयोग करने की सुविधा मिल गई. नेपाल अब दक्षिणी चीन सागर के बंदरगाहों तिआनजिन, शेंझेन, लियांयुंगांग और झांजिआंग का उपयोग परिवहन के लिए कर सकता था. इस समझौते के साथ ही नेपाल की माल आपूर्ति के लिए भारत पर हजारों साल पुरानी एकांगी निर्भरता समाप्त हो गई.
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. नेपाल से चीनी बंदरगाह बहुत दूर हैं, जिससे माल ढुलाई बहुत मंहगी हो जाती है, जबकि कोलकाता अपेक्षाकृत काफी पास है. चीन के इन बंदरगाहों तक पहुंचने के लिए नेपाल के ट्रकों को कम से कम 3 हजार किलोमीटर दौड़ना होता है, जबकि कोलकाता बंदरगाह उसे महज 742 किलोमीटर और विशाखापटनम 1400 किलोमीटर पड़ता है.
आज भी नेपाल का दो तिहाई व्यापार भारत के साथ है, क्योंकि भारत के साथ सीमापार आवागमन सहज है, उधर चीन-नेपाल मार्ग हिमालय की विशाल घाटियों और पर्वत श्रंखलाओं तथा सूखे पठारी तिब्बत से होकर गुजरता है. ठण्ड का हाल ये है कि गर्मी के दिनों के अलावा इन मार्गों से गुजरना अत्यंत कठिन हो जाता है, जबकि भारत की सड़कें सालभर गतिमान रहती हैं. कोलकाता व दूसरे बंदरगाह 12 महीने खुले रहते हैं. इसलिए नेपाली व्यापारी भारत के मार्ग से ही समुद्र तक पहुँचना पसंद करते हैं. माल ढुलाई की इस लागत को घटाने के लिए चीन और नेपाल रेल लाइन बिछाने की योजना बना रहे हैं, लेकिन ये खर्चीला काम है, जिसमें हिमालय की दुर्गमता सबसे बड़ी चुनौती है. इन रास्तों पर रेलपथ के लिए पुलों का जाल बिछाना होगा, जो कि आर्थिक के साथ-साथ इंजीनियरिंग की चुनौती भी है. उधर भारत नेपाल को ये सुविधाएं बढ़ाकर चीन के इस कदम की काट निकाल सकता है. और भी बाधाएं हैं जो चीन-नेपाल गठजोड़ को दुष्कर बनाती हैं. नेपाल चाहता है कि चीन रेललाइन सड़क आदि की सुविधा मदद के रूप में दे, जबकि चीन इसे कम ब्याज के क़र्ज़ के रूप में ही देने को तैयार है. पाकिस्तान समेत दुनियाभर के देशों का अनुभव यही है, कि चीन किसी को भी धंधे में रियायत नहीं देता. पाकिस्तान-चीन का सीपैक गलियारा, शी जिनपिंग का सपना, नया रेशममार्ग भी, आखिरकार पाकिस्तान के गले की हड्डी बनता जा रहा है. अमरीका पाकिस्तान को इमदाद देता था, जबकि चीन सूद पर ही पैसा देता है.
भारत और नेपाल की सांस्कृतिक समानता भी दोनों देशों के सहज आर्थिक लेनदेन का आधार रही है. इन प्राकृतिक और सांस्कृतिक कारकों का चीन के पास कोई जवाब नहीं है.
चीन नेपाल के रास्ते तिब्बत में होने वाली आज़ादी की हलचल को लेकर भी आशंकित रहता है. इसलिए इन मार्गों पर कड़ी सुरक्षा और पैनी नज़र लगी रहती है. अप्रैल 2015 के भूकंप के बाद चीनी सरकार ने तातोपानी नेपाल सीमा को बंद कर दिया था. उसका कहना था कि यहां से ‘चीन विरोधी घुसपैठ’ संभव है.
पिछले साल से चीन और नेपाल ने अत्यंत छोटे स्तर पर संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया है, लेकिन ये अभ्यास भारत और नेपाल के बरसों से जारी संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘सूर्य किरण’ के सामने कुछ भी नहीं है.
इन्ही सब कारणों को देखते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने, जो चीन समर्थक माने जाते हैं, अपने दूसरे कार्यकाल के पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुना, जब अप्रैल 2018 में वो भारत आए. इस दौरे में दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, व्यापार और परिवहन को लेकर समझौते हुए. भारत के रक्सौल से काठमांडू तक इलेक्ट्रिक रेल पथ बनाने पर सहमती बनी. इसके लिए वित्तीय सहायता भारत देगा.
नेपाल का राजनैतिक तंत्र हाथ में आने के बाद से कम्युनिस्टों ने नेपाल को चीन के करीब ले जाना प्रारंभ किया. कम्युनिस्ट नेता और प्रधानमंत्री प्रचंड दहल ने शपथ ग्रहण के बाद सबसे पहले भारत न आकर चीन जाने की परंपरा शुरू की. पर्वतीय और मैदानी इलाकों में बंटी नेपाली राजनीति ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई. मैदानी इलाकों में रहने वाले मधेसियों के भारत से रोटी-बेटी के संबंध रहते आए हैं. राजनीति के एक धड़े ने उन्हें निशाने पर लेना शुरू किया. पर शुरूआती सालों में ही नेपाल के वामपंथी तंत्र को ध्यान में आना शुरू हो गया कि आर्थिक-व्यापारिक मामलों में भारत का कोई विकल्प नहीं है. इसलिए अब वो भारत और चीन के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रहे हैं. चीन की कम्युनिस्ट सरकार नेपाल में अपने ताकतवर दांवों यानी उसके दैत्याकार व्यापार तंत्र और उसके कर्ज जाल के अलावा, सॉफ्ट पॉवर को भी इस्तेमाल करना चाह रही है. इसके लिए जहाँ एक ओर वो नेपाल की बौद्ध परंपरा को भुनाकर तिब्बत को शांत करना चाहता है, वहीँ अपनी भाषा और सभ्यता को बढ़ावा देकर नेपाल के मानस में गहरे प्रवेश करना चाहता है. भाषा का प्रसार एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी होती है, जो आपके लक्ष्य को आपकी दिशा में मुड़ने को प्रेरित करती है. भारत को ये बढ़त पहले से ही हासिल है. आम नेपाली हिंदी और संस्कृत को मंदारिन की तुलना में बहुत सहजता से समझेगा ही. सीमा के दोनों ओर बजने वाले मंदिर के घंटे और शहनाइयों की गूँज किसी भी राजनैतिक झुकाव पर भारी ही पड़ने वाली है. इसीलिए प्रधानमन्त्री मोदी ने नेपाल यात्रा में सदैव भारत-नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों को उभारने का प्रयास किया है. नेपाल के साथ किए गए करारों पर भी तेजी से अमल किए जाने की आवश्यकता है.