जयंती विशेष: सुदर्शन जी कहते थे समाज तब सुखी होगा जब प्रकृति के साथ उसका तालमेल ठीक होगा
   दिनांक 19-जून-2019
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक स्व. कुप्.सी. सुदर्शन भारतीय दर्शन के वाहक थे। वे प्रकृति के शोषण के विरोधी थे और कहते थे कि प्रकृति से उतना ही लो जितने की जरूरत है, तभी यह पृथ्वी समस्त जीवों की सेवा कर पाएगी
- राजेंद्र कुमार चड्डा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन का जन्म 19 जून, 1931 को रायपुर (वर्ततान में छत्तीसगढ़ राज्य) में हुआ था। मूल रूप से कर्नाटक के एक गांव कुप्पहल्ली के निवासी अपने पिता सीतारमैया के वन विभाग में कार्यरत होने के कारण सुदर्शन जी लंबे समय तक मध्य प्रदेश में रहे। यहीं उनकी उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई, जिसके बाद उन्होंने जबलपुर से इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन में बी.ई. की उपाधि ली। वे दैनंदिन जीवन-व्यवहार में स्वदेशी के आग्रही थे और कार्यकर्ताओं को भी कुटीर उद्योगों के उत्पादों के प्रयोग के लिए प्रेरित करते थे। सुदर्शन जी का संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, बंगला, कन्नड़, असमिया और पंजाबी भाषाओं पर समान अधिकार था। कन्नड़भाषी होने के बावजूद वे राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के प्रबल समर्थक थे।
किसी भी समस्या के मूल को खोजकर उचित समाधान तक पहुंचना, उनके मूलगामी चिंतन की विशेषता थी। आज जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रहे देश-दुनिया को लेकर उनका मानना था कि समाज सुखी होगा तभी मनुष्य सुखी हो सकेगा। समाज तब सुखी होगा जब प्रकृति के साथ उसका तालमेल ठीक होगा और प्रकृति के साथ तालमेल तब ठीक रहेगा,जब हम यह अनुभव करके चलेंगे कि सबके अंदर एक ही परमतत्व व्याप्त है। अत: हमें जो भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रचनाएं मनुष्य को सुखी करने के लिए विकसित करनी हैं, वे तभी सफल मानी जाएंगी जब व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा, इन चारों के बीच तालमेल प्रस्थापित करते हुए वे व्यक्ति को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का सुख प्रदान कर सकें। ऐसी जो भी व्यवस्था होगी वही व्यवस्था मनुष्य को पूर्ण रूप से सुख दे सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था का विकास प्राचीनकाल में हमारे पुरखों ने किया था, जिसके कारण दीर्घकाल तक बड़ा सुखी एवं समृद्ध जीवन हमने व्यतीत किया।
इतना ही नहीं, वे इस बात पर बहुत बल देते थे कि जल ही जीवन है और उसका संरक्षण सर्वोपरि है । उनके अनुसार नदी-नालों पर छोटे-छोटे बांध बनाकर भूजल स्तर को ऊंचा किया जा सकता है तथा अल्पव्यय में सिंचाई के साधन खड़े किए जा सकते हैं। लोगों ने इसे सिद्ध करके दिखाया है। उनका मानना था कि बैल-चालित ट्रैक्टर, डीजल-चालित ट्रैक्टर से दस गुना सस्ता है और छोटे खेतों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। ये ट्रैक्टर महिलाएं भी चला सकती हैं क्योंकि इसमें पैदल नहीं चलना पड़ता।
इसी तरह, बिजली से चलने वाली तेल घानियां प्रत्येक ग्राम संकुल में लगाने से तिलहन से जहां सीधा तेल निकाला जा सकता है, वहीं मवेशियों के लिए उत्तम खली भी प्राप्त हो सकती है। शहरों के तेल कारखानों में ‘साल्वेंट एक्सट्रैक्शन’ पद्धति से जो तेल बनाया जाता है उसमें ओमेग 3 और ओमेग 6 तत्वों के बीच का अनुपात बिगड़कर अनेक रोगों का कारण तो बनता ही है, खली भी विदेशों में निर्यात हो जाने से हमारे अपने पशु उत्तम पोषक आहार से वंचित हो जाते हैं। कृषि-आधारित अनेक उद्योग ग्रामों में रोजगार के अवसर प्रदान कर ग्रामीण नवयुवकों का शहरों की ओर पलायन रोक सकते हैं। इसके लिए, ऐसे उद्योगों को बड़े उद्योगों की प्रतियोगिता से बचाना होगा। राब से एथनॉल बनाया जाए तो जहां पेट्रोल के आयात में कमी होगी, वहीं गन्ना उत्पादक किसानों को आय का ऐसा स्रोत मिल जाएगा, जिससे शक्कर एक सहउत्पाद का रूप धारण कर लेगी।
स्वदेशी के कारण ही वे देश की आयुर्वेद पद्धति को अपनाए जाने के आग्रही थे। वे मानते थे कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के जितने प्रकार भारत में हैं, उतने विश्व के किसी अन्य देश में नहीं हैं। विश्व में वानस्पतिक औषधियों की मांग बढ़ रही है। चीन करीब अपनी 20 मुख्य जड़ी-बूटियों के बल पर 2,250 करोड़ रुपए का वानस्पतिक औषधियों का निर्यातक है, जबकि भारत 250 से भी अधिक जड़ी-बूटियों का उत्पादक होने के बावजूद 2,500 करोड़ रुपए का ही निर्यात कर पाता है।
वे वैश्वीकरण और विदेशी कर्ज की अपेक्षा देश में उपलब्ध संसाधनों के बल पर ग्राम विकास को प्राथमिकता देने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि भारतीय जड़ी-बूटियों के उत्पादन को बढ़ावा देने से देश के वनवासी क्षेत्रों के विकास में बड़ी मदद मिलेगी। इसी तरह से गांवों के लिए सस्ती सौर ऊर्जा उपलब्ध करवाने से ग्रामों में समृद्धि और विकास का रास्ता खुल सकता है। इससे गांवों में रहने वाली देश की 75 प्रतिशत जनसंख्या का विकास संभव हो सकता है।
इसी तरह, समाज को संतुलित उपभोग की प्रेरणा देने वाले सुदर्शन जी का मानना था कि हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस जगत में सब कुछ भगवान का है। अपने लिए केवल उतना ही लो जितना जीवन-यापन के लिए आवश्यक हो।
ईशावास्यं इदं सर्वं, यत्किंच जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुंजीथा, मा गृध: कस्यस्विद्धनम्'
अर्थात् इस चराचर जगत में जो कुछ है सब ईश्वर का है। उसमें केवल उतने पर ही हमारा अधिकार है जो हमारे जीवन-यापन के लिए नितांत आवश्यक है, शेष सब भगवान का है।
अत: हमारे यहां प्रकृति के शोषण की बात नहीं कही गई। 2003 में न्यूयार्क में पर्यावरण की रक्षा के लिए विश्व सम्मेलन हुआ, जिसमें 106 देशों के प्रतिनिधि जुटे। तीन दिन तक पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद 40 ऐसे समाधान परक मुद्दे निकाले गए, जिन्हें लागू करने पर सभी प्रतिनिधियों में परस्पर सहमति थी। चौथे दिन सारे प्रतिनिधि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले थे। अंतिम दिन भारत से जो प्रतिनिधिमंडल गया था, उसने अथर्ववेद के भूमि सूक्त का अंग्रेजी अनुवाद सम्मेलन के सदस्यों में वितरित किया। इसे पढ़कर दुनियाभर के पर्यावरण विशेषज्ञ आश्चर्यचकित रह गए कि इस सूक्त में सम्मेलन में सुझाए गए सभी 40 बिंदु तो थे ही, 22 अन्य बिंदु भी थे, जिन पर सम्मेलन में विचार नही हो पाया, किंतु उनके कारण पर्यावरण रक्षा में महत्वपूर्ण भागीदारी होती थी। प्रतिनिधियों ने कहा कि ‘इसे पहले दिन क्यों नही वितरित किया? इसके कारण जो माथापच्ची हमने तीन दिन तक की, उससे हम बच सकते थे।’ अंत में सम्मलेन में सभी ने इस बात पर भी सहमति जताई कि यदि इस सूक्त का अनुपालन हो तो पर्यावरण की रक्षा संभव है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रारंभ से हमारे यहां समग्र चिंतन की परंपरा रही है। हमने सृष्टि में सारी चीजों का अलग-अलग विचार करने के बजाए समग्रता में विचार किया है। इसलिए अगर हमें अपना जीवन निखारना है तो प्रचलित विकास मॉडल में भी संपूर्ण सृष्टि और इससे जुड़े सभी तत्वों का पूरा विचार करते हुए आगे बढ़ना होगा। हमारे यहां हजारों वर्षों से जो विकास पथ प्रचलित रहा उसको अगर एक वाक्य में वर्णित करें तो यह विकास पथ विकेंद्रित, ग्राम आधारित, अल्प ऊर्जाभक्षी, अल्पपूंजी आधारित, रोजगार बहुल और पर्यावरण सुसंगत था। लेकिन पश्चिम ने जिस पद्धति से विकास किया वह विकास पथ केंद्रीकृत, नगर आधारित, विपुल ऊर्जाभक्षी, पूंजी बहुल, बेरोजगारीवर्धक और पर्यावरण विनाशक है।
 
श्री सुदर्शन का मानना था कि पश्चिमी विचारकों ने व्यक्ति के अधिकार की बात की है। जबकि हमारे यहां, भारतीय चिंतन में व्यक्तिगत अधिकार की भावना ही नहीं है, क्योंकि कोई स्वयंभू व्यक्ति है ही नहीं। हम एक बड़ी इकाई के अंग या अंश मात्र हैं। व्यक्ति परिवार का अंग है, परिवार समाज का अंग है, समाज मानवजाति का अंग है तथा मानव जाति प्रकृति की अंग है। व्यक्ति से लेकर परमात्मा तक, हम सब अंगांग भाव से जुड़े हुए हैं, और इस प्रकार संपूर्ण ब्रह्मांड में जो है वह सबका ही है। फिर इसमें एक व्यक्ति के अधिकार का प्रश्न कहां उठता है। जैसे मनुष्य के शरीर में, हाथ का कोई अलग अधिकार है क्या? नाक अथवा आंख का कोई अलग अधिकार है क्या? सबको अपने-अपने कर्तव्य का निर्वाह करना है। प्रत्येक अंग शरीर का काम करता है और बदले में शरीर हर अंग की चिंता करता है। इसी प्रकार परिवार समाज के लिए काम करे और समाज हर परिवार की रक्षा कर, उसके योग-क्षेम का ख्याल करे। इसी प्रकार आगे जाकर संपूर्ण समाज मानव जाति के लिए कार्य करे और संपूर्ण मानव जाति हर समाज के वैशिष्ट्य की रक्षा करे, और प्रकृति से हमें आवश्यक साधन उपलब्ध कराए। यह संभव है क्योंकि समस्त विश्व में एक ही परब्रह्म, परमात्मा व्याप्त है। यह हमारी अवधारणा है और इसके आधार पर जो विकास की व्यवस्था बनी उसका स्वरूप केंद्रीकरण से विपरीत विकेंद्रीकरण पर आधारित रहा। यह व्यवस्था ग्राम आधारित,अल्पपूंजी पर चलने वाली, अल्प ऊर्जा का भक्षण करने वाली, अधिक से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करने वाली और प्रकृति की रक्षा करने वाली रही।
समाज और प्रकृति के बीच के संबंध में श्री सुदर्शन की सोच यह थी कि प्रकृति के पास इतना अवश्य ही है जिससे हमारी उचित और वैध आवश्यकताओं की पूर्ति हो। हमारी अनुचित आवश्यकताओं की पूर्ति का सामर्थ्य प्रकृति में नहीं है। लोभ को पूरा नहीं कर सकते। जो पाश्चात्य चिंतन है, ईसाइयत का चिंतन है, इस्लाम का चिंतन है, कि ‘प्रकृति तुम्हारे उपभोग के लिए है, मनुष्य को छोड़कर और किसी में जान तो है ही नहीं। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी ये सब निर्जीव हैं। सब जड़ पदार्थ हैं और तुम चाहे जैसा उसका उपयोग कर सकते हो।’ यह उचित नहीं है। विज्ञान के नवीनतम आविष्कारों के माध्यम से प्रकृति के सारे भंडारों को वे अपने सुख के लिए तेजी से नष्ट करते जा रहे हैं। अब लोगों के मन में आने लगा है कि अगर पर्यावरण का विनाश हो गया तो मनुष्य जिंदा नहीं रहेगा। इसीलिए पर्यावरण की रक्षा करो, प्रकृति की रक्षा करो। इसलिए अनेक आंदोलन खड़े हो रहे हैं। ऐसा होना चाहिए अन्यथा हम वे सारी व्यवस्थाएं चरमरा देंगे। यज्ञ होता है, यज्ञ से पर्जन्य होता है, पर्जन्य से अन्न होता है। यह सारा चक्र है। इस चक्र को हम बिगाड़ देंगे, तो गड़बड़ होगी ही।
जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ तब यहां 22 प्रतिशत जमीन जंगल थी, आज यह केवल 11 प्रतिशत रह गयी है। और इसलिए जलवायु के अंदर एक अस्थिरता पैदा हुई है। इसलिए प्रकृति के साथ हमारा जो संबंध है, उसे अच्छी तरह से बनाए रखने की आवश्यकता है, इसको ही प्रकृति धर्म कहते हैं।
यह तब संभव होगा जब सबसे परे जो परमतत्व सबमें विद्यमान है, उसके अस्तित्व की अनुभूति हम सब करें। वही एक परमतत्व सब पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, अणु-रेणु के अंदर व्याप्त है, और इसलिए जैसे मुझे जीने का अधिकार है वैसे ही पशु- पक्षी, पेड़-पौधों को भी जीने का अधिकार है। किंतु इस बात को न पूंजीवाद मानता है, न कम्युनिज्म मानता है। कोई नहीं मानता इसीलिए उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति निर्माण की। इस संपूर्ण ब्रह्मांड में हर चीज एक-दूसरे के साथ जुड़ी है, वह यह कि कोई आधारभूत इमारती ईंट नहीं है। इसलिए आज ब्रह्मांड का विचार इन शब्दों में किया जाता है, ‘ब्रह्मांड ऊर्जा पुंजो’। इसमें प्रत्येक ऊर्जाणु के अंदर अन्य सारे ऊर्जाणु विद्यमान हैं। हमारे पुरखों ने आज से 2,000 साल पहले इसी चीज को बड़े ही सरल शब्दों में कहा था-‘वृक्ष में बीज और बीज में वृक्ष।’ हर बीज में पूरा वृक्ष विद्यमान रहता है। जब हम उसको बो देते हैं तो पूरा वृक्ष निकलता है किंतु वृक्ष के अंदर फिर वृक्ष आ सकता है। तो जैसे बीज के अंदर वृक्ष और वृक्ष के अंदर बीज है वैसे ही ऊर्जाणु के अंदर ब्रह्मांड, ब्रह्मांड के अंदर ऊर्जाणु है। द्वंद्व की बात भी हमारे यहां पहले से ही कही गई थी कि सुख है तो दु:ख है, रात है तो दिन है, जय है तो पराजय है। यह दुनिया द्वंद्वात्मक है और जो परमतत्व है, वह इन द्वंद्वों के परे है।
इसी द्वंद्वात्मकता को आज का विज्ञान स्वीकार कर रहा है। तीसरी चीज यह है कि हमारे यहां कहा गया है-जो अंतिम तत्व है, वह अवर्णनीय है। उसका वर्णन नहीं कर सकते। श्री सुदर्शन जी अंतिम श्वांस लेने तक (15 सितंबर, 2012) अपने विचारों को लेकर आग्रही बने रहे। आज उनके विचारों को समझने और उनके अनुसार चलने की आवश्यकता है।
 
(लेखक ‘प्रज्ञा प्रवाह’ की केंद्रीय टोली के सदस्य हैं)