''योग-संगीत में समाया प्रकृति का पूरा विधान''
   दिनांक 20-जून-2019
इक्कीस जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। इसी दिन विश्व संगीत दिवस (वर्ल्ड म्युजिक डे) भी मनाया जाता है। यह मात्र संयोग है या इसके पीछे कुछ कारण हैं, यह जानने के लिए अजय विद्युत  ने अध्यात्म और भारतीय संगीत में रमे तथा जीवन में योग को अपनाने वाले कैलाश खेर से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश
 
योग और संगीत अलग-अलग हैं, लेकिन क्या इनमें कोई युति है?
संसार की उत्पत्ति में तीन लोक हैं- आकाश, धरती और पाताल। यहां जो भी चीज उगती है उसके लिए कोई बीज नहीं बो कर गया। जैसे इतने वन हैं जिनके लिए कोई बीज बो कर नहीं गया। यहां प्रकृति ही अपने बीज बोती है और सर्जना करती है। ये सब योग की उत्पत्ति है।
योग क्या है?
योग परस्पर मिलन का एक पर्याय है। जब दो धाराएं आपस में मिलती हैं तो एक अन्य धारा उत्पन्न होती है। जब दो तत्व मिलते हैं तो एक अन्य तत्व उत्पन्न होता है। दो मौसम मिलते हैं तो एक नई सर्जना उसमें से बहती है। मिलन और संतुलन का जो परिणाम होता है उसको हम योग कहते हैं। और इस पृथ्वी पर हर मिलन संगीतमय है। कोई भी मिलन ऐसा नहीं है जिसमें संगीत न हो। जहां मौन होता है वहां भी एक प्रकार का संगीत है। जब मौन में संगीत होता है तो 'ऊं' का शब्द बनता है। मौन की ध्वनि यानी साउंड ऑफ साइलेंस 'ऊं' है। थोड़ा गहरे में अध्ययन करें और समझें तो पाएंगे कि इस 'ऊं' में तीनों लोक छिपे हैं। इसलिए योग और संगीत दोनों अलग अलग नहीं हैं बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य या कोई जीव जंतु अथवा कोई भी प्राणी आकर बीज नहीं बोता है। और अकेले कभी कुछ होता नहीं। जो अकेला है वह ईश्वर स्वरूप है। ईश्वर ने ही प्रकृति के रूप में अपने गण हमारे पोषण और संवर्धन के लिए भेजे हैं। ये गण शिव-शक्ति का पर्याय हैं यानी शिव के गण बनकर कार्य करते हैं। भारतीय प्रज्ञा के अनुसार शिव प्रकृति के रक्षक और संवर्धक हैं। जितनी भी हिमालय की कंदराएं हैं वे शिव की जटाएं हैं। जब हवाओं में शिव की जटाएं आपस में टकराती हैं तो प्रकृति में कंपन होता है और उसी के साथ बहुत सा कार्य संपन्न होता है। प्रकृति के इस पूरे विधान को हमारे देवताओं ने योग द्वारा ही संतुलित रखा हुआ है। योग की क्रिया में मनुष्य का जन्म हुआ, तमाम और प्राणियों, जीव-जंतुओं का जन्म हुआ, चौरासी लाख योनियां हुईं- चार वेद, छह शास्त्र, अट्ठारह पुराण हुए- यह जितना कुछ भी है वह प्रकृति की ही देन है...और प्रकृति योग का परिणाम है।
योग परमात्मा का ऐसा स्वरूप है जिससे यह दुनिया गुलो गुलजार है, प्रकृति-विश्व-ब्रह्मांड हमें दिख रहा है... लिख रहा है और पढ़ रहा है। जो कुछ भी हम दृश्य भाव में, साक्ष्य भाव में देख पाते हैं, महसूस कर पाते हैं- वह सब योग का ही प्रभाव है।
21 जून के ही दिन अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और विश्व संगीत दिवस... विश्व में योग और संगीत की धूम... क्या कहेंगे?
प्रकृति के संरक्षक, संवर्धक और संस्थापक भगवान शिव हैं। शिव की कार्यप्रणाली के बारे में बताऊं तो ऊं संगीत का सबसे बड़ा सुर है। मैं तो कहता हूं- 'ऊं से कर लो प्रीति प्यार से/ ऊं ऐसा है बचा दे तीर और तलवार से/ ऊं जिसने रट लिया वह जब चला संसार से/ मोक्ष द्वार पा लिया छूटा आवागमन की मार से।' यानी मुक्ति पाने का जरिया भी ऊं ही है। ऊं योग की उत्पत्ति है और संगीत से ओतप्रोत है। दूसरी बात कि प्रकृति में संतुलन कैसे करना है। पुराने पत्तों को गिरना होगा, प्रकृति में विलीन होना होगा, तभी नए पत्ते आएंगे। यह जीवन का क्रम है और प्रकृति ने ऐसा विधि का विधान बनाया है।
योग और संगीत के समन्वय से ही प्रकृति अच्छे से चलती है। जैसे चंद्रमा जब अपनी ड्यूटी करके चले जाते हैं तो सूर्य अपने आप आ जाते हैं। यह प्रकृति ने अपना विधान रचा है और उनके आने और जाने के इस क्रम में संगीत है। एक लय है। कभी उनकी छुट्टी होती नहीं। फिर जब हवाओं का प्रतिपादन होता है तो उसमें एक सुर और क्रमबद्धता आ जाती है। तो प्रकृति का यह पूरा सम्मिलन और विघटन को योग और संगीत का समन्वय ही कहा जाता है। प्रकृति का धर्म है सबको पालना, फिर पुराना होने पर अपने पास बुला लेना... और फिर नया बनाकर पृथ्वी पर भेजना। और जो प्रकृति करती है वही योग और संगीत का प्रारूप है। इसलिए एक ही दिन विश्व योग दिवस और विश्व संगीत दिवस का होना यह अपने आप में बहुत मनोहारी, अद्भुत और अपने आप में प्राकृत है। नैसर्गिक है। ईश्वर की जो कार्यप्रणाली है वह जैसे अपने आप आधुनिक युग में सही खांचे में बैठ गई- मुझे तो ऐसा ही लगता है।