अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: दुनिया में गूंजी हमारी ज्ञान-परम्परा
   दिनांक 21-जून-2019
                    - आराधना शरण                       
 
आज विश्व वैमनस्य के अंगार में तपता प्रतिस्पर्धा के मायावी गलियारों में आंखें बंद किए लक्ष्य विहीन भागता जा रहा है और शक्ति परीक्षण की चुनौतियों की जय-पराजय में उलझ तबाही का सामान तैयार कर रहा है। कहीं भी शांति नहीं, साझा भाव नहीं, उल्लास नहीं, बस तनाव ही तनाव! दूसरी तरफ अंधाधुंध उद्योगीकरण से उपजे प्रदूषण से पर्यावरण दूषित हो रहा है और मनुष्य अपने ही द्वारा तैयार विषाक्त वातावरण में रोग-शोक का शिकार हो रहा है। क्या सभ्यता के विकास के साथ प्रगति की ओर बढ़ते हमारे कदम खुद को तबाह करने के लिए थे? उद्देश्य तो यह था कि प्रकृति के सबसे विवेकी जीव के तौर पर विकास कर प्राकृतिक, सामाजिक और सामुदायिक जीवन का आनंद उठाना। पर जीवन से आनंद ही गायब होता चला गया। हंसी तक सहज, उन्मुक्त नहीं रही, बल्कि किसी पार्क में गला फाड़कर किए जा रहे हास्य-अभ्यास की मोहताज हो गई। फिर समाधान क्या हो और कहां से आए? वह कौन सी चीज है जो हमारे अंदर स्वाभाविक व्यवहार, सद्भाव, आनंद और सौहार्द के लिए उपयुक्त प्रेरक बल का सृजन कर सकती है? लोगों के मन में उमड़ते इन सवालों को प्राचीन परंपरा की पृष्ठभूमि में संजोए ज्ञानकोश से जवाब मिला-योग।
योग, जिसका पौराणिक ज्ञान आज व्यावहारिक कसौटी के साथ समकालीन प्रयोगों में गूंथ कर आधुनिक कलेवर में पेश किया जा रहा है और वर्तमान में दुनिया को वसुधैव कुटुम्बकम् की दिगंतव्यापी वंशी धुन से आह्लादित कर रहा है। भारत भूमि पर प्राचीन काल से ज्ञान की यह गंगा प्रवाहमान है। हमारी संस्कृति की यह अमूल्य विरासत सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी वैश्विक संस्कृति से संवाद स्थापित करने और सहोदर भाव को जगाने में अहम भूमिका निभा सकती है, क्योंकि वसुधैव कुटुम्बकम् का दर्शन भारत भूमि में ही अंकुरित हुआ था।
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास से 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। 
योग की बात करते ही जिस महान विभूति का नाम सामने आता है, वह हैं 200 ईसा पूर्व कालखंड में जन्मे महर्षि पतंजलि, जिन्होंने अष्टांग योग की नींव रखी। 21वीं सदी में भी योग की अवधारणा बुनियादी रूप से उन्हीं के निर्धारित सिद्धांतों का पालन कर रही है। हालांकि, विभिन्न दौर में विभिन्न ऋषियों ने योग को लोकप्रिय बनाने के लिए अलग-अलग प्रयोगों के साथ इसे नवीन कलेवर में पेश किया, पर इसका आत्मिक कलेवर अक्षुण्ण रहा, जो अब भी पूर्ण एकाग्र अभ्यास से व्यक्ति की चेतना को ब्रह्मांड की चेतना से जोड़ता है जैसा कि पौराणिक योग ग्रन्थों में बताया गया है। यह मन और काया, इनसान और प्रकृति के बीच सामंजस्य का प्रतीक है, जो बुनियादी मानवीय मूल्यों को मजबूती और स्थायित्व देता है। आज योग का विस्तार भारतीय सीमाओं को पार करके वैश्विक स्तर पर पुन: दस्तक दे रहा है।
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार, हजारों वर्ष पहले हिमालय स्थित सरोवरों के तटों पर आदि योगी ने योग का अलौकिक ज्ञान सप्तऋषियों को प्रदान किया, जिन्होंने इस सशक्त विद्या का प्रसार सुदूर एशिया, मध्य पूर्व क्षेत्र, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका सहित विश्व के भिन्न-भिन्न हिस्सों तक किया था। श्रीमद्भगवद गीता में श्रीकृष्ण, जिन्हें योगेश्वर कहा गया है, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग के दर्शन की व्यापक व्याख्या करते हुए मनुष्य को पृथ्वी पर जीवन कर्तव्य निभाने का मूल मंत्र प्रदान करते हैं। ये तीन योग-विधान आज भी मनुष्य का मार्गदर्शन करने में समर्थ हैं, बशर्ते उनका पालन उपयुक्त तरीके से हो। योगेश्वर के मुख से अभिव्यक्त उपदेश महाभारत युद्घ के सबसे संवेदनशील मोड़ पर प्रस्तुत होते हैं, जिनमें धर्म की स्थापना का आह्वान प्रकट होता है। इसी विराट उद्घोष के जरिए युद्घ की विभीषिका के केंद्र से न्याय और शांति का उद्भव होता है। राजनैतिक रूप से सशक्त राष्ट्र के जन्म की भविष्यवाणी जो इंद्रप्रस्थ की स्थापना के साथ मूर्त होती है। धर्म की स्थापना से तात्पर्य न्याय आधारित, समावेशी और शांतिपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की स्थापना है न कि किसी आस्था पद्धति या समुदाय या संप्रदाय आधारित सिद्धांत की। गीता में धर्म आत्म स्वभाव और जीव के स्वभाव के लिए प्रयुक्त हुआ है। आत्मा का स्वभाव है पूर्ण शुद्ध ज्ञान और यह ज्ञान ही आनंद और शांंति का धाम है। कर्मयोग, जो प्रवाहमान ऊर्जा का प्रतीक है, शारीरिक क्षमता के उपयोग का पाठ पढ़ाता है यानी मनुष्य को कर्म करना सिखाता है। वहीं, भक्तियोग में भावनाओं को सर्वोपरी माना गया है, जिनमें शुद्घता, सकारात्मकता और समर्पण है। ज्ञानयोग में मन और बुद्घि को नियंत्रित करने यानी विवेक का पालन करने का पाठ है। इस तरह योग हमारे शरीर, मन, भावना और ऊर्जा के स्तरों को समन्वित करता है। यह स्वस्थ और सक्षम शरीर, स्वस्थ और सशक्त मन हासिल करने का अभ्यास है जो व्यापक तौर पर परिवार, समाज, राष्ट्र, प्रकृति और पूरी मानवता के लिए उपयोगी कल्याणकारी लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
'योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:' यानी चित्त की वृत्तियों को वश में रखना योग है और 'योग कर्मसु कौशलम्' अर्थात् कार्य की कुशलता योग है और जोड़ना योग है। मनुष्य जगत को सहज रूप से चलाने के लिए इन्हीं बुनियादी तत्वों की आवश्यकता है। योग मनुष्य को द्वेष, काम, क्रोध, कपट जैसे विकारों से मुक्त करता है। जटिलताओं से भरे आधुनिक युग में योग शारीरिक और मानसिक बीमारियों से सुरक्षित रखता है और हमारी कार्य क्षमता को बढ़ाता है।
 
 नई दिल्ली में राजपथ पर लोगों के साथ योग करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल चित्र)
21वीं सदी में दुनिया के सभी देशों, खासकर विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों के लोग कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग के कारण असमय काल का ग्रास बन रहे हैं। पूरा विश्व आज कई तरह के रोगों की त्रासदी झेल रहा है। वैश्वीकरण, शक्ति परीक्षण, प्रतिस्पर्धापूर्ण अर्थव्यवस्था की नागफनी लोगों की मानसिक शांति को छलनी कर रही है तो पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण स्वास्थ्य के सभी मानकों को धराशायी कर रहा है। भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन का सदस्य देश है, जिसके पास योग की प्राचीन विरासत है। लिहाजा योग विज्ञान के प्रणेता के रूप में भारत वैश्विक स्वास्थ्य की दिशा में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। योग ही एकमात्र साधन है जिसके जरिए विश्वभर में स्वास्थ्य समस्याओं के निवारण और नियंत्रण में सुधार किया जा सकता है, क्योकि योग विज्ञान में मनुष्य का मनुष्य से ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ भी संवाद कायम करने के तत्व निहित हैं। स्पष्ट है कि योग मनुष्य के हित्  से जुड़ा विज्ञान है। इसलिए विश्व परिदृश्य में इस यौगिक विज्ञान की महत्ता बहुत बढ़ गई है। विश्व में योग की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी भारत की प्राचीन योग परंपरा पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाते हुए 2014 में घोषणा की कि 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के तौर पर मनाया जाएगा, जिसे 177 देशों से समर्थन मिला। यह घोषणा एक बहुत बड़ा संदेश देती है। एक तरफ भारत की इस प्राचीन यौगिक परंपरा को वैश्विक मंच पर पहचान और सराहना मिली जो हमारे लिए राष्ट्रीय गौरव की बात है, वहीं विश्व स्तर पर अपार जन समुदाय महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग सिद्धांत- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि का अभ्यास करके संपूर्ण मानवता के कल्याण की ओर अग्रसर हो सकेगा।
अष्टांग योग पूर्ण मानवता की स्थापना का वही मार्ग है, जिसका संकेत गीता में श्रीकृष्ण के धर्म स्थापना के उपदेशों में परिलक्षित हुआ है। यम के पांच नियम अहिंसा, सत्य, संयम, संतोष आदि जैसे सामाजिक नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, वहीं नियम तन-मन और विचार की शुद्धि और कर्तव्य का पाठ पढ़ाते हैं। प्रत्याहार जो मोह और आसक्तियों पर नियंत्रण रखना सिखाता है; धारणा एकाग्रता का विकास, ध्यान और मन को संयमित करने का अभ्यास है; तो समाधि परम चैतन्य अवस्था की प्राप्ति। इस तरह, भारतीय योग परंपरा में भेदभाव से परे 'सर्वधर्म समभाव' की राह पर चलते हुए समस्त विश्व को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' माना गया है। यह एक धर्म निरपेक्ष विज्ञान है जो हिंदू, मुस्लिम, जैन या ईसाई, देशी या विदेशी जैसे किसी भी संप्रदाय या नागरिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसका अभ्यास समाज के सभी स्तरों या व गोंर् के लोग समान रूप से कर सकते हैं। यह मूलत: मानव कल्याण की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों पर आधारित आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो जीवन के परम सत्य तक पहुंचने का मार्ग दिखाती है, जिसमें जीवन को ऊर्जा और जीवन को ही शक्ति माना गया है। आंतरिक व आत्मिक विकास तथा मानव कल्याण संबंधी यह विज्ञान भावी पीढ़ी को लक्ष्य केंद्रित और सार्थक उद्देश्य से युक्त प्रगति का मंत्र थमाता है।
 
 योग शारीरिक और मानसिक बीमारियों से सुरक्षित रखता है और हमारी कार्य क्षमता को बढ़ाता है
आज लंदन, चीन, जापान ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि कई देशों में योग प्रशिक्षण केंद्र चलाए जा रहे हैं। विभिन्न विज्ञान शाखाओं, तकनीक और प्रौद्योगिकियों के विकास के साथ शक्ति परीक्षण की चुनौतियों में जय-पराजय की उत्तेजना से ग्रसित वैश्विक वातावरण में जीवन के प्रति जागरूकता और दूसरे जीव का अपना ही विस्तारित अंश मानने का भाव तिरोहित हो चुका है। यह आत्म केंद्रित भाव सामाजिक जीवन के बुनियादी समभाव पर ग्रहण लगा चुका है और दुनिया भर में मानवीय धर्म के मानक धराशायी हो रहे हैं। ऐसे में योग का अभ्यास चित्त के स्वकेंद्री भावों को उदार बनाता है और निजता के भाव का शमन कर समग्रता की ओर अग्रसर करता है यानी व्यष्टि से समष्टि की ओर, जैसा कि अष्टांग योग में कहा गया है। योग के जरिए भारत विश्व को शांतिपूर्ण और स्वस्थ जीवन पालन करने का पाठ देते हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान का साझा मंच तैयार कर सकता है।
विश्व योग दिवस की घोषणा के बाद से हर वर्ष 21 जून को दुनियाभर में योग अभ्यास का आयोजन हो रहा है। 27 सितम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था, ''योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है। विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करने वाला भी है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन-शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है।'' मोदी के भाषण में योग विज्ञान का सार छिपा है। आज योग ग्रन्थों और संन्यासियों के आश्रमों की सीमाओं से बाहर निकल आम जनमानस का भी हिस्सा बन गया है। 21 जून, 2015 को भारत ने पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का भव्य आयोजन किया, जिसका प्रसारण भी उतना ही भव्य हुआ और विश्व उस विशाल समारोह का साझीदार बना।
योग दिवस का मुख्य समारोह दिल्ली के राजपथ पर हुआ जिसमें करीब 36000 लोगों के साथ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योगाभ्यास किया। दुनिया भर में भारत की विविधता में अखंडता का संदेश देने के लिए योगाभ्यास के दौरान सूर्य नमस्कार और श्लोक की अनिवार्यता को सरकारी योग कार्यक्रम से हटा दिया गया था और मुसलमानों से इस कार्यक्रम में भाग लेने की अपील की गई थी। आयुष मंत्री ने श्लोक के बदले अल्लाह का नाम लेने का सुझाव भी दिया था। पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र में आयोजित समारोह की अध्यक्षता की। दुनियाभर के दर्शकों के लिए टाइम्स स्क्वायर से इसका प्रसारण किया गया। योग के तहत की गई ये सभी गतिविधियां मात्र व्यायाम और आसनों के अभ्यास का समारोह नहीं थीं, बल्कि इनके केंद्र से एक संदेश भी उभर रहा था- समावेशी, सामन्जस्यपूर्ण शांति पर्व का संदेश, जिसके जरिए भारत विश्व के सामने अपनी एकजुट शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था और जता रहा था कि भारत एक स्वस्थ, क्षमतावान और ऊर्जावान आबादी वाला सशक्त राष्ट्र है, जो एक तरफ अपनी कार्यक्षमता, कौशल और मानसिक बल से विश्व का नया भविष्य रच सकता है। वहीं, दूसरी तरफ एक कूटनीतिक संदेश भी परिलक्षित हो रहा था कि अपनी इसी आध्यात्मिक विरासत से यह वैश्विक मंच पर विश्व शांति का प्रणेता भी बन सकता है। इस पहल को चीन, कनाडा, रूस, मिस्र, अमेरिका आदि कई देशों के राजनेताओं की ओर से मिला समर्थन नई संभावनाओं का संकेत है।