दुनिया में योग की धूम
   दिनांक 21-जून-2019
अनुमान है कि आज विश्व में दो से ढाई अरब लोग प्रतिदिन किसी न किसी रूप में योग करते हैं। इसका बड़ा रूप योग दिवस के दिन पूरी दुनिया में दिखता है। योग को दुनिया में पहुंचाने में अनेक लोगों और संगठनों का हाथ है। यहां प्रस्तुत है योग को लोकप्रिय बनाने में अमूल्य योगदान देने वाले कुछ योग साधकों का परिचय
योगासन करतीं रूसी महिलाएं
 
रूस में योग का झंडा फहराने वाले विष्णु
विष्णु शुक्ला रूस में योग गुरु हैं। भारत में जो प्रसिद्धि बाबा रामदेव की है कुछ वैसी ही वहां उनकी। इलाहाबाद में जन्मे और 16 वर्ष की अवस्था तक वहीं रहे, फिर वाराणसी चले गए। योग के बल पर आज विष्णु का रूस में करोड़ों का साम्राज्य है। वे नामी-गिरामी लोगों को भी योग का प्रशिक्षण देते हैं। उन्होंने एक रूसी युवती से प्रेम विवाह किया। वे अक्सर अपनी पत्नी और शिष्यों के साथ भारत आते रहते हैं।
विष्णु के पिता भागवत शरण शुक्ला उन्हें बचपन से ही योग का ज्ञान देते रहे थे। पिता नियमित योगाभ्यास किया करते थे जिसे देखकर छोटा-सा विष्णु भी शरीर को घुमाया-फिराया करता था । जब 10 साल के हुए तो पिता ने श्री हरि चैतन्य ब्रह्मचारी जी के पास योग सीखने भेज दिया । ब्रह्मचारी जी ने विष्णु को शिष्य के तौर पर स्वीकार कर लिया और नियमित योग शिक्षा देने लगे । विष्णु भोर में योगाभ्यास के बाद घर आते और स्कूल भी जाते । यह उनकी दिनचर्या बन चुकी थी । तभी से इनका योग से जुड़ाव हुआ । या यूं कहें कि बचपन में ही पिता ने योग के बीज बो दिए थे जो समय से साथ अंकुरित हुए और फूल खिले जिनकी सुगंधि विदेश तक पहुंची ।
16 वर्ष की आयु तक वे इलाहाबाद में रहे । जब नौवीं कक्षा में थे तब पिताजी बीएचयू के संस्कृत व्याकरण विभाग में प्रोफेसर नियुक्त हो गए । विष्णु ने पिता के साथ ही बोरिया-बिस्तर बांधा और शिव नगरी काशी में डेरा जमा लिया। चूंकि विष्णु का मन योग विद्या में रमा था तो वे इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने लगे । बीएचयू से एस्ट्रोफिजिक्स में स्नातक, फिर बेंगलुरु के एस-व्यास विश्वविद्यालय से योग टीचर ट्रेनिंग कोर्स किया । योग के साथ ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर की डिग्री भी पूरी की। योग टीचर ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 2014 में वाराणसी लौट आए और अस्सी घाट और राजा घाट पर योग सिखाना शुरू किया। वहां उन्हें रूस, इटली, फ्रांस, कोरिया, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से आए विदेशी छात्र भी मिलते थे। कुछ रूसी छात्रों ने अनुरोध किया कि उन्हें उनके देश में आकर योग सिखाएं। उनको भी लगा कि ऐसा किया जा सकता है।

 
 रूस में योग सिखाते विष्णु शुक्ल
विष्णु 2015 में योग सिखाने तीन महीने के लिए मास्को गए और फिर रूस के ही हो गए। वहां के लोगों में योग के प्रति उत्साह देख उन्हें काफी अच्छा लगा। लोगों ने उन्हें गुरु की तरह सम्मान और प्यार दिया। नवंबर, 2015 में उन्होंने वहीं बसने का इरादा कर लिया और तब से रूस में रहकर योग का प्रशिक्षण दे रहे हैं। शुरुआत के दो साल मास्को में रहे। अब सेंट पीटर्सबर्ग में बस गए हैं।
योग कक्षाओं के दौरान ही विष्णु को मास्को की रहने वाली इन्ना डेरेशे से फरवरी, 2016 में विवाह हो गया। अब विष्णु और इन्ना की एक बेटी है। इन्ना उनकी पीआर मैनेजर भी हैं।
योग गुरुओं की लोकप्रियता में उनके उन शिष्यों का बड़ा हाथ होता है जो अपने-अपने क्षेत्र में काफी नाम कमा चुके होते हैं। विष्णु ने रूस की एक प्रसिद्ध मॉडल अलीसा क्रायलोवा, जो तीसरी बार मां बनने वाली थीं, को गर्भावस्था में कौन से योग करने चाहिए, यह बताया। इसको उन्होंने अपनाया भी। इसके परिणामस्वरूप आज उनकी सेहत बहुत अच्छी है और वह तीन बच्चे की मां नहीं लगतीं।
योग ने बढ़ाया भंडारी का भंडार
उत्तराखंड को देवभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता। योग, ध्यान, तप वहां की मिट्टी में रचा-बसा है। 16 साल पहले उत्तराखंड के मनमोहन सिंह भंडारी चीन गए। तब योग को लेकर वहां कोई खास सुगबुगाहट नहीं थी, लेकिन उन्होंने उसी चीन में करोड़ों का कारोबार स्थापित किया। इसमें उनकी चीनी पत्नी का भी बहुत हाथ है। उन्होंने अपनी सफलता का रास्ता खुद चुना और उस पर आगे बढ़ते गए। आज योग के द्वारा करोड़ों का कारोबार कर रहे इस युवा को चीन का 'रामदेव' भी कहा जाता है। भारत से कम्युनिस्ट देश चीन जाकर योग को करोड़ों के कारोबार में बदल देना कोई छोटी बात नहीं है। चीन में उनके कई योग केंद्र हैं।
 
 चीन में योग की एक कक्षा में स्थानीय युवतियां
योगी मोहन बताते हैं, ''2003 में मैं जब उत्तराखंड से चीन गया था तो वहां लोगों को इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि योग भारत की देन है। चीन के लोग समझते थे कि पश्चिमी देशों से ही योग दुनिया में फैला है।''
भंडारी के चीन जाने पर लोगों को योग का असल मतलब समझ में आया। अंतरराष्ट्रीय फैशन मैगजीन 'एले' के चीनी संस्करण की पूर्व प्रधान संपादक यिन यान उनकी पत्नी हैं। इस संबंध ने आकार लिया योग की ही बदौलत। हुआ यूं कि यिन ऋषिकेश में योग गुरु आयंगर के आश्रम में योग सीखने आई थीं। इसी दौरान उनके जीवन में मनमोहन सिंह भंडारी आए। इसके बाद दोनों की शादी हुई तो भंडारी भी अपना कॅरियर बनाने के लिए यिन के साथ चीन चले गए।
 
  प्रसिद्ध योग गुरु आयंगर के साथ योग प्रशिक्षक मनमोहन सिंह भंडारी और उनकी पत्नी यिन यान (फाइल चित्र)
आज भंडारी का चीन में सबसे बड़ा योग संस्थान है। 2003 में जब उन्होंने यह केंद्र खोला था तब इसकी कमाई 40 लाख डॉलर थी। अब एक के बाद एक नए-नए केंद्र खोले जा रहे हैं। लोगों को सामान्य योग सिखाने के साथ-साथ यहां कई विशेष कार्यक्रम भी हैं और योग शिक्षकों को भी प्रशिक्षित किया जाता है।
चीन में भंडारी योग एकेडमी भी चलाते हैं, जिसे चीन के खेल मंत्रालय द्वारा मान्यता दी गई है। इस योग संस्थान की शाखाएं बीजिंग, गुआंगजू, शंघाई और कई अन्य शहरों में हैं। भंडारी इस एकेडमी के आध्यात्मिक प्रमुख हैं। भंडारी की चीन के युवाओं में लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है। चीन में इतनी व्यस्तता के बाद भी भंडारी की कोशिश रहती है कि वे साल में दो बार उत्तराखंड जरूर आएं।
सऊदी अरब में योग को दिलाई मान्यता
इस्लामिक देश सऊदी अरब में कुछ साल पहले तक योग को गैर-इस्लामी माना जाता था। लंबी लड़ाई लड़कर योग को मान्यता दिलाने में जिस एक व्यक्ति की सबसे बड़ी भूमिका रही वह हैं- नऊफ मोहम्मद अल मारवाई। नऊफ सऊदी अरब की सफल महिला उद्यमी हैं। योग ही उनका जुनून और कारोबार है और उन्होंने कई लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया है। योग के क्षेत्र में नऊफ के प्रयासों और संघर्षों के लिए भारत ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है। मारवाई के पिता मोहम्मद मारवाई एथलीट थे । वही 45 साल पहले सऊदी अरब में मार्शल आर्ट्स लाए थे। मारवाई कहती हैं, ''19 साल की उम्र में मेरी योग व फिजियोलॉजी यानी शरीर क्रिया विज्ञान में रुचि पैदा हुई । मैं इसे सीखने ऑस्ट्रेलिया गई, पर संतुष्टि नहीं हुई । लगा कि यह कला और बेहतर ढंग से सीखनी चाहिए। फिर भारत का रुख किया और केरल में इसे सीखा। मैं आज भी केरल से गहरा प्यार और अपनापन महसूस करती हूं।''
 
 संयुक्त अरब अमीरात में योग करतीं मुस्लिम महिलाएं
भारत से सऊदी अरब लौटने के बाद उन्होंने योग, आयुर्वेद औरनेचुरोपैथी को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और यह तय किया कि इससे सऊदी अरब के लोगों का जीवन बदलना है। बाद में वे अपने देश में योग व आयुर्वेद की 'ब्रांड एम्बेसेडर' बन गईं । 2010 में उन्होंने 'अरब योग फाउंडेशन' नामक संस्था की नींव रखी । लगभग 20 साल की लड़ाई के बाद उन्हें सऊदी अरब का पहला प्रमाणित योग प्रशिक्षक घोषित किया गया।
भारत के योगदान से मिली कामयाबी
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों से 2015 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को योग दिवस के रूप में घोषित किया था। उस दिन मारवाई ने जेद्दाह में आधिकारिक रूप से सार्वजनिक तौर पर पहला योग उत्सव मनाया। इसके बाद हर साल योग उत्सव होता है। इस काम में 2017 में तब तेजी आई जब मारवाई ने वहां की राजकुमारी रीमाबंत बंदार अल सऊद से मुलाकात की। वह सऊदी अरब की 'स्पोर्ट्स अथॉरिटी फॉर प्लानिंग एंड डेवेलपमेंट' की उपाध्यक्ष थीं। नवंबर, 2018 में सऊदी अरब के व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय ने योग को खेल की मान्यता दी है।
महिलाओं के योग स्टूडियो
महिलाओं के लिए सऊदी अरब पिछले कुछ सालों में तेजी से बदला है। महिलाएं खुद को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए योग को अपना रही हैं। योग को मान्यता मिलने के कुछ महीने के भीतर ही मक्का, मदीना सहित देश के कई शहरों में योगा स्टूडियो और योग प्रशिक्षकों का एक नया उद्योग खड़ा हो गया है।
अष्टांग योग से प्रेरित 'पावर योग' की धूम
योग का पाश्चात्य या अमेरिकी संस्करण 'पावर योग' आज दुनियाभर के उन युवाओं को आकर्षित कर रहा है, जो रोमांच, रफ्तार और साहसिक कारनामों के दीवाने हैं। वस्तुत: यह भारतीय अष्टांग योग का ही एक स्वरूप है। सामान्य भारतीय योग और इसमें कोई मूलभूत अंतर नहीं है। बस इसमें शक्ति और ऊर्जा का ऐसा संगम है जिसकी अमेरिका और पश्चिमी देशों में खासी धूम है। पावर योग की खोज का श्रेय अमेरिकी योग गुरु बेरिल बेंडर बर्क को जाता है। 1995 में बेरिल ने अपनी किताब 'पावर योग' के जरिए अष्टांग योग को अमेरिकी सोच से जोड़ा था। बेरिल का मानना था कि लोग खुद को 'अष्टांग योग' नाम से नहीं जोड़ पाएंगे, इसलिए उन्होंने 'पावर योग' नाम से बीच का एक रास्ता निकाला। इसमें काफी ज्यादा व्यायाम कराए जाते हैं, जिनसे शरीर में ऊर्जा का बहाव होता है। इस योग में ऐसी मुद्राओं और आसनों की प्रधानता है जिनसे गर्मी पैदा होती है और ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। आज यह अमेरिका के हेल्थ क्लबों में अत्यंत लोकप्रिय है।
 
 अमेरिकी योग गुरु बेरिल बेंडर बर्क
शक्ति योग या पावर योग एक प्रकार का तीव्र योग है। पावर योग और सामान्य योग में बीच का अंतर कुछ भी नहीं है। पावर योग एक जोरदार फिटनेस या यूं कहें कि वजन कम करने में काम आता है। इसके अलावा इसे 'जिम योग' के नाम से भी जाना जाता है। 'पावर योग' को तेज गति वाली नई पीढ़ी के लिए प्राचीन योग का एक नया संस्करण बनाकर प्रस्तुत किया गया है। पावर योग आपको पसीने से तर-बतर करता है। यह एक ऐसा आसन है जो एक ही समय में आपको उत्तेजित भी करता है, स्पंदित भी करता है और आराम भी कराता है। पावर योग दुनियाभर में, खासकर युवावर्ग में काफी लोकप्रिय हो चुका है।
 
 अमेरिका में योग के प्रति तेजी से बढ़ रही है दिलचस्पी
अष्टांग और 'पावर योग' में फर्क
पावर योग की उत्पत्ति अष्टांग योग से ही हुई है। भारतीय योग के कुछ विशिष्ट योगासनों और सूर्य नमस्कार की 12 स्थितियों को मिलाकर पावर योग निर्मित किया गया है। पावर योग अष्टांग योग नहीं है। अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार (इंद्रियों पर नियंत्रण), धारणा, ध्यान और समाधि को शामिल किया जाता है, जबकि पावर योग में केवल कुछ विशिष्ट श्रमसाध्य आसनों को ही शामिल किया जाता है।