चौराहे पर फूटी सपा—बसपा के गठबंधन की हांडी
   दिनांक 25-जून-2019

 
जो लोग उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की तरफ के हैं वो तो जानते ही होंगे. जो नहीं जानते हैं वो जान लें कि पूर्वांचल की तरफ एक कहावत है -- औरत को जब घर से निकालना हुआ तो आरोप लगा दिया कि साग में हल्दी नहीं डालती थी. व्यवहारिक सचाई है कि साग में हल्दी डाली नहीं जाती है. मायावती अपने बबुआ अखिलेश यादव को ठीक उसी तरह से गठबंधन टूटने के लिए जिम्मेदार ठहरा रही हैं. मायावती का आरोप है कि - हार के बाद अखिलेश यादव ने उन्हें फोन नहीं किया. मायावती ने अपने करीबी सतीश चन्द्र मिश्र के माध्यम से यह परामर्श अखिलेश यादव को दिलवाया कि ‘ बहन जी से बात तो कर लीजिये !” सतीश चन्द्र मिश्र के इस परामर्श के बाद मायावती , अखिलेश के फोन का इंतज़ार करती रहीं मगर अखिलेश यादव का फोन नहीं आया. उनका कहना है कि " जब मैंने उप चुनाव अलग - अलग लड़ने की बात कही तब अखिलेश यादव ने सतीश चन्द्र मिश्र को फोन किया मगर मुझे फोन नहीं किया."
लोकसभा चुनाव में सपा - बसपा गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी . उसके बाद गठबंधन टूटने न पाए इसके डर से अखिलेश यादव ने चुप्पी साधे रखी. मगर मायावती को आरोप लगाने में देर नहीं लगी. मायावती के ऊपर उंगली उठे इसके पहले ही उन्होंने यह आरोप लगाते हुए कि अखिलेश यादव अपनी बिरादरी का वोट ट्रांसफर नहीं करा पाए. उन्होंने गठबंधन तोड़ दिया. अखिलेश यादव उस दिन अपने मतदाताओं का धन्यवाद देने आजमगढ़ गए थे. उनको समझ में ही नहीं आया कि इस पर क्या प्रतिक्रया व्यक्त करें. एक दिन बाद संभल कर बोले कि - “अगर गठबंधन टूटता है तो उसका भी स्वागत है”
मायावती ने समझौता तोड़ते समय शुरुआत में थोड़ा सा गुंजाइश छोड़ रखी थी. उन्होंने उस समय कहा था कि “ अगर सपा के कार्यकर्ता शालीनता और अनुशासन बनाये रखेंगे तो आगे समझौते के बारे में सोचा जा सकता है.” मगर कुछ ही दिन बीतने के बाद, मायावती ने सपाइयों के अनुशासन की परख करना भी जरूरी नहीं समझा और ट्वीट करके एक के बाद एक प्रहार किये. मायावती ने ट्वीट किया कि “लोकसभा आमचुनाव के बाद सपा का व्यवहार बीएसपी को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या ऐसा करके भाजपा को आगे हरा पाना संभव होगा? जो संभव नहीं है। अतः पार्टी व मूवमेन्ट के हित में अब बीएसपी आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अकेले अपने बूते पर ही लड़ेगी।“
अकेले दम पर चुनाव लड़ने का सन्देश नहीं दे पाए अखिलेश यादव
सपा और बसपा अब फिर सांप और नेवले की तरह आमने - सामने हैं. अखिलेश यादव इस समझौते के लिए सबसे ज्यादा बेचैन थे. उन्होंने मायावती को प्रधानमंत्री पद का ख़्वाब दिखाया था. ऐसा करके, अखिलेश यादव दोनों तरह से निश्चिंत हो गए थे. उन्हें अनुमान था कि मायावती अगर प्रधानमंत्री नहीं बन पाती हैं तब भी वह केंद्र की राजनीति में उलझ कर रह जायेंगी मगर चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद मायावती का दिवास्वप्न टूट गया. सपना टूटते ही मायावती ने उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति का मोर्चा संभाल लिया.
 
गठबंधन तोड़ कर मायावती ने अपने समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं को यह बता दिया है कि वह अकेले दम पर कोई भी चुनाव लड़ सकती हैं. अभी तक बसपा ने उप चुनाव नहीं लड़ा था मगर अपने कार्यकर्ताओं को सन्देश देने के लिए बसपा अकेले दम पर उप चुनाव के लिए मैदान में उतर रही है जबकि अखिलेश यादव अभी तक अपने कार्यकर्ताओं को यह सन्देश नहीं दे पाए कि वह अकेले दम पर कोई भी चुनाव लड़ सकते हैं. अभी तक वह तीन चुनाव लड़ चुके हैं. तीनों में उनकी जबरदस्त हार हुई है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने सभी टिकट अपनी मर्जी से तय किए थे. चुनाव बाद ,उनके अपने परिवार के मात्र पांच लोग ही लोकसभा में प्रवेश पा सके थे. उसके बाद वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ समझौता करके लड़ा था. कांग्रेस के साथ उनका गठबन्धन किसी काम नहीं आया. विधानसभा चुनाव में उन्हें मुंह की खानी पड़ी. वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव ने बसपा के साथ समझौता करके लड़ा. इस बार अखिलेश यादव ने गलत नंबर डायल कर दिया. कांग्रेस से जब समझौता खत्म हुआ तो कोई आरोप – प्रत्यारोप का दौर नहीं चला मगर इस बार सपा - बसपा गठबंधन की हांडी चौराहे पर आकर फूटी. मायावती गठबंधन तोड़ कर लगातार बबुआ – अखिलेश को घेर रही हैं और अखिलेश यादव कोई भी पलटवार करने से बच रहे हैं.
तो क्या ! मुसलमान विरोधी हैं अखिलेश यादव
मायावती ने रविवार को हुई बैठक में अपनी हार का ठीकरा अखिलेश यादव के सिर पर फोड़ा. उनका मानना था कि उनकी पार्टी के बड़े नेता इसलिए चुनाव हारे क्योंकि अखिलेश यादव का प्रभाव यादव बिरादरी में काफी कम हो चुका है और यादव बिरादरी के लोगों ने बसपा प्रत्याशियों को वोट नहीं दिया. मायावती ने लगातार दो ट्वीट करके अखिलेश के अरमानों पर पानी फेर दिया. मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि “ टिकट बंटवारे के समय अखिलेश ज्यादा मुसलमानों को टिकट देने के पक्ष मे नहीं थे.” गठबंधन का तिनका – तिनका बिखर चुका है. मगर समाजवादी पार्टी के मुसलमान नेताओं को लगता है कि अभी भी बात बन सकती है. सपा सांसद शफीकुर्ररहमान कहते हैं “ दोनों लोग साथ मिलकर चुनाव लड़े इसी में सबकी भलाई है. एक साथ चुनाव लड़ कर ही भाजपा को रोका जा सकता है.” सपा सांसद आज़म खान भी गठबंधन की आस लगाये बैठे हैं. उनका कहना है “दोनों नेता मिलकर बात करें. यह देखें कि कहां गलती हो गई , किस वजह से हार हुई है. आज की नाकामयाबी, कल की कामयाबी भी हो सकती है.”
जो बाप का नहीं वो आप का नहीं
दरअसल, अखिलेश यादव का राजनीतिक करियर दाव पर है. अतिमहत्वाकांक्षा में उन्होंने अपने पिता पर दबाव बना कर सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली. मगर अखिलेश यादव राजनीति के कच्चे खिलाड़ी साबित हुए. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें यह मालूम हुआ कि सबसे महतवपूर्ण पद तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का है. सभी विधायक , सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की बात मानते हैं. उस समय अधिकतर विधायक और कैबिनेट मंत्री, अखिलेश यादव की शिकायत मुलायम सिंह यादव से किया करते थे. अखिलेश यादव की कार्यशैली से नाराज़ मुलायम सिंह यादव ने कई बार अखिलेश यादव को चेतावनी भी दी थी कि “अगर ठीक से काम नहीं करोगे तो मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाएगा , यह मेरी बनाई हुई पार्टी है.” उस दौरान , मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव को लग गया था कि मुलायम सिंह यादव जब चाहें, पार्टी की बैठक बुलाकर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा सकते हैं. इस सचाई को जानने के बाद अखिलेश यादव को एहसास हुआ कि मुख्यमंत्री तभी रहा जा सकता है जब पार्टी भी अपने कब्जे में हो. इसके लिए उन्होंने मुलायम सिंह यादव के दूर के रिश्ते के भाई राम गोपाल यादव को विश्वास में लिया. राम गोपाल यादव को भी अपने बेटे अक्षय यादव को पार्टी में नेता बनाना था सो, उन्होंने भी अखिलेश यादव को पूरा समर्थन दिया. राम गोपाल यादव ही पार्टी में लिखा – पढ़ी का काम देखते थे. उन्होंने येन – केन प्रकारेण अखिलेश यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करा दिया. मुलायम सिंह यादव अपदस्थ कर दिए गए. उस समय मुलायम सिंह यादव ने कहा था – “ जो बाप का नहीं वो आप का नहीं.”
अखिलेश यादव ने पहले तो अपने पिता से मुख्यमंत्री की कुर्सी मांगी. मुख्यमंत्री बन जाने के बाद अखिलेश यादव ने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी अपने पिता से छीन ली. इस सफ़र को तय करने में उनके परिवार में काफी कलह हुई. चाचा शिवपाल यादव से झगड़ा बिल्कुल सड़क पर आ गया. अमर सिंह पहले ही पार्टी से बाहर चल रहे थे. यह सफ़र तय करके जब उन्होंने मायावती से समझौता किया तब तक उनके चाचा शिवपाल यादव अलग पार्टी बना चुके थे. यहां पर मायावती का आरोप काफी सटीक है कि “अखिलेश यादव अपने चाचा शिवपाल यादव की काट नहीं ढूंढ पाए.” फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर जहां से राम गोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव चुनाव लड़ रहे थे. वहाँ से जानबूझ कर शिवपाल यादव ने नामांकन किया और अक्षय यादव को चुनाव हरवा दिया.
बसपा से समझौता करने से पहले अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुँचने के लिए जिस तौर तरीके का इस्तेमाल किया उससे समाजवादी पार्टी के कई नेता उनसे नाराज हो गए और उन सभी ने अखिलेश यादव का इस चुनाव में भीतरघात किया. अखिलेश यादव पर टिप्पणी करते हुए अमर सिंह कहते हैं “ अखिलेश यादव , राजनीति का कालीदास है, जिस डाल पर बैठा था उसी डाल को ही काट दिया. मुझको और अपने चाचा शिवपाल यादव को ही उसने काट कर अलग कर दिया.
बहरहाल, इस गठबंधन के टूटने के बाद अखिलेश यादव के पास कोई दल नहीं बचा है जिससे वह समझौता कर सके. उनके मन में एक टीस जरूर उभर रही होगी कि मायावती ने अनुशासन में रहने के लिए कहा था. मगर परीक्षा लिए बगैर ही उन्होंने गठबन्धन तोड़ दिया