बलूचों के पोस्टर भी नहीं बर्दाश्त
   दिनांक 26-जून-2019
 
- अरविन्द                               
पाकिस्तान की हुकूमत किस तरह बलूचों के साथ बर्बर सलूक करती है, यह बात अब किसी से छिपी नहीं। लेकिन हालत यह है कि पाकिस्तानी जुल्म के खिलाफ बलूचों के मुंह से अगर ‘उफ्’ तक निकल जाए तो वह भी उन्हें मंजूर नहीं।
पाकिस्तान की इसी सोच का सबूत मिला 23 जून को जब इंग्लैंड में पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के बीच 2019 का वर्ल्ड कप मैच चल रहा था। क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स मैदान से कुछ सौ मीटर दूर स्टेडियम के बाहर पाकिस्तान की उस सोच की झलक मिली, जिसने पूरे मुल्क को बीमार कर दिया है। स्टेडियम के बाहर बलूचिस्तान रिपब्लिकन पार्टी और वर्ल्ड बलोच संगठन मिलकर बलूचिस्तान समेत पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में लोगों को जबरन अगवा किए जाने के खिलाफ पोस्टर-बैनर लगा रखे थे। आने-जाने वाले लोगों के बीच पर्चे भी बांटे जा रहे थे और इनकी मांग थी कि पाकिस्तान में लगातार गायब हो रहे ऐसे लोगों को सामने लाया जाए।

 
हां, पाकिस्तान के लिए चुभने वाली बात यह थी कि जिस समय स्टेडियम के बाहर ये लोग पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का पर्याय बन चुके एन्फोर्स्ड डिसऐप्पियरेंस के शिकार लोगों के लिए इंसाफ मांग रहे थे, उस वक्त स्टेडियम के अंदर पाकिस्तान सेना प्रमुख कमर जावेद वाजवा भी कुछ आला अधिकारियों के साथ मैच देख रहे थे। इसी का नतीजा था कि पाकिस्तानी प्रशंसक से दिखने वाले लोगों ने इन पोस्टरों को फाड़ डाला, बैनरों को पैरों के नीचे कुचला और पर्चे बांट रहे लोगों के साथ अभद्रता की। इन सब के पीछे स्टेडियम में मौजूद वाजवा समेत अन्य आला पाकिस्तानी अधिकारियों की कोई भूमिका हो या नहीं, इससे पाकिस्तान की मानसिकता का जरूर अंदाजा होता है। अगर पाकिस्तान यह मैच हार गया होता तो माना भी जा सकता था कि हार की हताशा में ऐसा किया गया होगा, लेकिन यहां तो पाकिस्तान यह मैच जीत चुका था। फिर ऐसी उन्मादी सोच का मतलब? क्या वहां का समाज इतना हिंसक हो चुका है कि अहिंसक तरीके से कही गई बातों को भी बर्दाश्त नहीं कर पाता? क्या यह पाकिस्तान में आतंकवाद को सामाजिक खोल में लगातार छिपाकर रखने का सहज नतीजा है कि आम लोगों में सामने वाले के दुःख को सुनने का भी जज्बा नहीं रह गया?


गौरतलब है कि पाकिस्तान में बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा इलाकों में आए दिन लोग अगवा किए जा रहे हैं और इनमें से ज्यादातर का कोई पता नहीं चलता। गिनती के लोग हैं जिनकी सड़ी-गली लाशें यहां-वहां मिल जाती हैं। बलूचिस्तान के कई इलाकों में ऐसे गायब लोगों की सामूहिक कब्रगाह भी मिल चुकी है। मानवाधिकार नाम की कोई चिड़िया इन इलाकों में दिखाई नहीं देती। कहने को वहां एक आयोग भी है जिसे वहां की सुप्रीम कोर्ट के दबाव में बनाया गया और इसे दिखावे के लिए इस बात की जिम्मेदारी सौंपी गई कि जबरन लापता कर दिए गए लोगों के दुःख-दर्द को सुने और उन्हें इंसाफ दिलाए। लेकिन इस आयोग का हाल यह है कि इसके सामने अपनी शिकायत लेकर जाने वाले लोगों के साथ ऐसा सलूक किया जाता है कि वे लौटकर न आएं। ऐसे में इस आयोग के बनने से जो हो सकता था वही हुआ- पीड़ित लोगों का दर्द कागजों पर भी उभर न सका।

ऐसे माहौल में अगर कोई इनकी बात करे, शांतिपूर्वक लोगों से अपनी तकलीफ साझा करने की कोशिश करे, तो पाकिस्तानी मानसिकता को यह मंजूर नहीं। वैसे, यह नहीं भूलना चाहिए कि रात कितनी भी लंबी क्यों न हो, सुबह होती जरूर है।