मुस्लिम तुष्टीकरण व कम्युनिस्ट हिंसावाद को अपना चुकी हैं ममता
   दिनांक 27-जून-2019
 
- आलोक गोस्वामी, साथ में डॉ. अम्बा शंकर वाजपेयी                   
पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों मजहबी उन्मादियों द्वारा जिस प्रकार डॉक्टरों पर जानलेवा हमले किए गए, जिस तरह भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं की जा रही हैं, इस सबसे स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टीकरण और कम्युनिस्ट हिंसावाद को अपना चुकी हैं। देश भर में इससे तीखा आक्रोश है
कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज व अस्पताल का मुख्य द्वार
पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के लंबे अराजक राज के बाद 2011 में तृणमूल कांग्रेस की नेता के रूप में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने पर राज्य के लोगों को लगा था कि अब प्रदेश में शांति होगी, चौमुखी विकास होगा। लेकिन उसके बाद से आज की तारीख तक ममता राज से पश्चिम-बंगाल उतना ही त्रस्त है जितना वामपंथियों के शासन में था। वही लूटमार, वही राजनीतिक हिंसा। ममता ने कम्युनिस्टों की तुष्टीकरण नीति ही नहीं अपनाई बल्कि राजनीतिक विद्रोहियों और उनके शासन को रंच मात्र चुनौती की झलक मिलने पर उस वजह को भी कुचलने का प्रयास किया।
हाल में देश की संवैधानिक संस्थाओं के अपमान से लेकर केन्द्र के साथ बेवजह तनाव पैदा करना, हिन्दुओं से चिढ़ना, आम जनजीवन को अपनी राजनीति के लिए अनदेखा करना मुख्यमंत्री ममता की आम पहचान बन गया है। पिछले दिनों डॉक्टरों पर मजहबी उन्मादी भीड़ द्वारा जानलेवा हमले के दोषियों का बचाव करना और इसलिए डॉक्टरों के हड़ताल पर चले जाने को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
11 जून को कोलकाता नील रतन सरकार मेडिकल अस्पताल में एक 85 साल के मुुस्लिम मोहम्मद शाहिद की उपचार के दौरान मृत्यु हो गयी। उसे पेट का रोग था और उसके परिजन जब तक उसे अस्पताल में लेकर आए, मरीज की हालत बिगड़ चुकी थी, फिर भी डॉक्टरों ने उसे बचाने का भरसक प्रयास किया, पर सफल न हो सके। इसके बाद, मरीज के साथ आए मुस्लिम परिजनों ने उलटे डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाकर उन्मादियों की भीड़ के साथ उन पर जानलेवा हमला बोल दिया। डॉक्टरों के साथ अभद्र व्यवहार किया गया, गाली-गलौज की गई। 200 से ज्यादा उन्मादियों की यह भीड़ मोटरसाइकिलों पर और ट्रकों में भरकर पहंुची थी, उनके पास हथियार थे जिनसे उन्होंने डाक्टरों के ऊपर हमला कर दिया। इस हमले में उन्होंने डॉ. परिबाह मुखर्जी के सिर में ईंट दे मारी, जिससे उनके सिर में घाव हो गया। बेहोशी की हालत में परिबाह को अस्पताल में भर्ती किया गया। उनके अलावा डॉ. यश टेकवानी भी बुरी तरह घायल हुए थे। कुल पांच डॉक्टरों को चोटें आईं।
 
 उपचाररत डॉ. परिबाह मुखर्जी (प्रकोष्ठ में), जिन्हें मजहबी उन्मादियों ने गंभीर रूप से घायल कर दिया था
इस घटना को लेकर कोलकाता के डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। हड़ताली डॉक्टरों की मांग थी कि मुख्यमंत्री उस पीडि़त डॉक्टर और हड़ताल पर बैठे डॉक्टरों से जाकर मिलें, उनकी बात सुनें, उनकी शर्त मानें और उन्हें सुरक्षा की गारंटी दें। लेकिन ममता बनर्जी ने उनकी मांगों को अनसुना कर दिया। बाद में हड़ताली डॉक्टरों ने मांग की कि वे दोषियों पर कड़ी करवाई करें। मुख्यमंत्री ने इसे भी न केवल अनसुना कर दिया, बल्कि उलटे यह भी कहा कि 4 घंटे के अन्दर सभी डॉक्टर काम पर लौटें नहीं तो कानून के हिसाब से कार्रवाई होगी। उधर देशभर में इस घटना पर रोष जताया गया। पूरे देश में आईएमए के नेतृत्व में डॉक्टरों ने हड़ताल की। नई दिल्ली के एम्स अस्पताल की डॉक्टरों की एसोसिएशन ने ममता सरकार को बेमियादी हड़ताल पर जाने की धमकी दी। आखिरकार ममता को कदम पीछे खींचने पड़े और डॉक्टरों की 12 मांगें माननी पड़ंीं। लेकिन इससे पूर्व मुसलमान उपद्रवियों को बचाने पर तुलीं मुख्यमंत्री के इस रवैये के बाद तो प्रदेश में सरकारी व गैर-सरकारी मेडिकल कॉलेजों/अस्पतालों में डॉक्टरों पर हमलों की मानो बाढ़ आ गयी।
बर्धमान मेडिकल कॉलेज में एक डॉक्टर को न सिर्फ बेरहमी से पीटा गया बल्कि उसकी आंख फोड़ दी गई। मुर्शिदाबाद से सांसद, अबू तहरी खान के नेतृत्व में मजहबी गुंडों ने मुर्शिदाबाद के सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों को धमकी दी, उनको मारा-पीटा गया, महिला डाक्टरों को खुलेआम बलात्कार की धमकी दी गयी। नेशनल मेडिकल कॉलेज, कोलकाता के छात्रावास को तृणमूल के गुंडों ने जला दिया।
ममता बनर्जी ने जनता से वादा किया था कि वह यहां के लोगों के लिए कार्य करेंगी, मेडिकल/स्वास्थ सेवाओं पर किसी को एक पाई खर्च नहीं करनी पडे़गी। मतलब सभी को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं मिलंेगी। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। लोगों में बहुत सालों से इसलिए गुस्सा है जो दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। यह भी सत्य है कि बंगाल में भाजपा की राजनैतिक सफलता से यहां के कट्टरपंथी मुस्लिम बहुत मायूस हैं जिससे राजनैतिक हत्याओं का दौर देखने में आया है, समाज में तनाव बढ़ा है। साथ ही साथ नंदीग्राम व संदेशखाली से लेकर मेडिकल कॉलेज की घटना में कट्टरपंथी मुस्लिमों के खुले तुष्टीकरण का नतीजा चुनावों के बाद आये परिणामों में झलका है। इससे ममता बनर्जी गहरे तनाव व निराशा में हैं।

 
 मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार की तुष्टीकरण की पराकाष्ठा
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर एक-एक कर नजर डालें तो स्थितियां और साफ हो जाएंगी। राज्य की जनता ने 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को खुलकर वोट दिया और भाजपा 40.1 प्रतिशत वोट के साथ 18 लोकसभा सीटों पर सफल रही। जबकि 2014 के चुनावों में पार्टी को 17 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। वहीं तृणमूल कांग्रेस को 2014 लोकसभा चुनावों में 41.3 प्रतिशत वोट मिले थे और 34 लोकसभा सीटें प्राप्त हुई थीं जबकि 2019 के चुनावों में उसे 43 प्रतिशत वोट मिले और कुल 22 लोकसभा सीटें प्राप्त हुईं। दूसरी तरफ माकपा के वोट 2014 में 27 प्रतिशत के मुकाबले इस बार 7 प्रतिशत ही रह गये। कहना न होगा, माकपा का उसके अपने ही गढ़ में सूपड़ा साफ हो गया।
लोकसभा चुनाव परिणामों के पश्चात एक बार फिर राजनैतिक हत्याओं का दौर शुरू हुआ और तृणमूल के गुंडों ने मुख्य विपक्षी दल भाजपा कार्यकर्ताओं को चुन-चुन कर निशाना बनाया। भाजपा के बढ़ते वोट प्रतिशत से ममता बनर्जी जैसे बौखला गईं। उत्तर बंगाल की 8 लोकसभा सीटों में भाजपा को 7 व कांग्रेस को एक सीट मिली और तृणमूल का सूपड़ा ही साफ हो गया। वहीं दूसरी तरफ बैरकपुर, मिदनापुर, आसनसोल व दुर्गापुर-बर्धमान आदि क्षेत्रों में भारत के विभिन्न प्रदेशों के लोग की मिली-जुली आबादी है। इन क्षेत्रों से भाजपा की प्रचंड जीत से ममता बनर्जी को यह भान हो गया कि तृणमूल अपनी जमीन खोती जा रही है। आसनसोल में तो इस बार भाजपा को पिछले लोकसभा चुनावों से ज्यादा वोट मिले। पश्चिम-बंगाल में उभरते राष्ट्रवाद से लगता है, ममता बनर्जी आपा खो बैठी हैं और उन्होंने 'मेरे सिवाय यहां दूजा न कोई' की ओछी राजनीति शुरू कर दी है। 
ममता बनर्जी के कई बयान और नीतियां ऐसी रही हैं जो किसी लोकतंत्रात्मक व्यवस्था वाले राज्य के सत्ता प्रमुख को शोभा नहीं देतीं। उन्होंने पिछले दिनों कहा कि 'बंगाल में रहना है तो बंगाली बोलनी होगी, नहीं तो यहां नहीं रह सकते'। स्वतंत्रता के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि किसी प्रदेश की मुख्यमंत्री, खासकर बंगाल जैसे प्रांत में, इस तरह का विभेद पैदा करने की कोशिश करे।
साफ है कि इसके पीछे गहरी राजनीति है। लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता से ममता को पहली बार लगा है कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रवादी विचारधारा ने अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं। स्वतंत्रता के पश्चात 1977 तक कांग्रेस प्रदेश की सत्ता में रही, लेकिन उसने कभी भी राष्ट्रवादी विचारधारा या सोच को नहीं दर्शाया। लेकिन अब ममता को भाजपा से खतरा है क्योंकि आमजनमानस भाजपा की तरफ झुक रहा है। इसी राष्ट्रवादी विचारधारा को रोकने के लिए ममता 'बंगाली-अस्मिता' का दांव खेलना चाहती हैं। ममता ने ऐसा इसलिए भी किया है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है।

 
 कोलकाता में डॉक्टरों पर जानलेवा हमले के विरोध में मरीजों को हेलमेट पहनकर देखा चेन्नै के डॉक्टरों ने
अब बात जय श्रीराम के उद्घोष से ममता की वितृष्णा की। ममता को उस बंगाल में जय श्रीराम एक गाली की तरह लगने लगा है जो रामकृष्ण परमहंस की भूमि है, जिनके इष्ट देव रघुनाथ हैं। रामकृष्ण मिशन के कार्यालयों/ध्यान केन्द्र्रों में रामनाम धुन आज भी चलती है। ममता को लगता है कि जय श्रीराम बोलना 'भाजपा जिंदाबाद' बोलने जैसा है इसीलिए उन्होंने अपनी पुलिस को इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की हिदायत दी है।
एक बार फिर गत लोकसभा चुनावों का रुख करें तो उन चुनावों में भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों (रानाघाट, बनगांव, बैरकपुर, बांकुड़ा, हुगली, विष्णुपुर व झारखण्ड की सीमा से सटे हुए क्षेत्र) में बहुत बड़ी सफलता मिली। आज भौगोलिक रूप से बंगाल में 70 प्रतिशत से ज्यादा भूमि पर राष्ट्रवादी विचार का असर दिख रहा है। क्योंकि तृणमूल जहां-जहां जीती है वहां पर जनसंख्या तो ज्यादा है, लेकिन भौगोलिक क्षेत्रफल बहुत ही कम है। पश्चिम बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में और उत्तर बंगाल में जिस तरह से भारतीय राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ है उससे ममता की राजनैतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है।
ममता ने जिस वामपंथी विचारधारा को वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा देने वाली बताकर संघर्ष की शुरुआत की थी आज उसी के बूते मिली सत्ता को वे उन्हीं कम्युनिस्टों के कदमों पर चलकर बर्बाद कर रही हैं अैर पश्चिम बंगाल को एक बार फिर पिछड़ा प्रदेश बनाने पर तुली हैं। ऐसे माहौल से उकताकर बंगालवासियों को भाजपा विकल्प की तरह दिखी है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आगामी विधानसभा चुनाव में ममता की तृणमूल सत्ता से बाहर हो सकती है।

गूंगी-बहरी ममता सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करते एनआरएस अस्पताल, कोलकाता के घायल डॉक्टर  
बंगाल में 'बंगाली-अस्मिता' या भाषा को लेकर जो विवाद सामने आया है उसका एक और कारण भी है। पिछले दिनों जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति का पहला ड्राफ्ट सरकार को दिया गया तो हिंदी भाषा की 'अनिवार्यता' के नाम पर तमिलनाडु में विरोध हुआ और वहां पर हिंदी में लिखी तख्तियों पर कालिख लगाई गई। तमिलनाडु में द्रमुक अध्यक्ष स्टालिन ने यह काम किया तो बंगाल में यही काम ममता कर रही हैं। वे मुस्लिम मतों को रिझाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती हैं। ममता नंदीग्राम आन्दोलन की वजह से माकपा से छिटके मुस्लिम वोटों (2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में 27.1 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। वहीं पश्चिम-बंगाल के एक आकलन है कि पश्चिम-बंगाल में आज मुस्लिम जनसंख्या 34 प्रतिशत से भी ज्यादा है) को तृणमूल की झोली में रखना चाहती हैं। इसलिए वे उर्दू को बढ़ावा दे रही हैं। उर्दू अध्यापकों की अवैध नियुक्तियों को लेकर पिछले साल अक्तूबर माह में इस्लामपुर के दारूबिता इलाके में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के दो कार्यकर्ताओं की पुलिस गोलीबारी में मृत्यु हो गयी थी। परिषद की मांग थी कि स्कूल में बांग्ला भाषी अध्यापकों की नियुक्ति की जाए। वहीं ममता सरकार के मंत्रिमंडल में 6 मुस्लिम मंत्री हैं जिसमें से 5 उर्दूभाषी हैं, जबकि बंगाल में 92 प्रतिशत आबादी बांग्ला-भाषी है।
इसलिए शायद, ममता बंगाली 'भोद्रजन' को संगठित करने के लिए बांग्ला-भाषा या बंगाली-अस्मिता का मुद्दा लेकर सामने आई हैं ताकि भाषा के रास्ते भारतीय राष्ट्रवाद के झंडे तले एक हो रहे हिन्दुओं में फूट डाली जाए। लेकिन राज्य के परिपक्व निवासी ममता बनर्जी की अवसरवादी तष्टीकरण राजनीति को बखूबी पहचान गए हैं और यही कारण है कि आज सिर्फ प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश के जागरूक समाज में ममता बनर्जी के अराजक राज की निंदा हो रही है। *
'ममता का कोरा दिखावा'
आजादी के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में राष्ट्रवाद का ऐसा उभार देखने में आ रहा है। 1952 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में राष्ट्रवाद की लहर चलाई थी, लेकिन आजादी के देखते-देखते प्रदेश कांग्रेस की गिरफ्त में चला गया। उसके बाद 34 साल के माकपा शासन ने बंगाल से बंगाली अस्मिता को हो समाप्त कर दिया। ममता ने उससे एक कदम आगे जाकर प्रदेश में मुस्लिम तुष्टीकरण को एक नई ऊंचाई दे दी। इससे त्रस्त बंगाली मानुष ने इस बार के लोकसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रवाद को वोट दिया। लगता है, इससे ममता का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और उन्होंने 'बंगाली-अस्मिता' के मुद्दे को हवा देकर अपनी राजनीतिक जमीन को बचाए रखने का सपना देखा है। लेकिन उनकी यह बंगाली-अस्मिता तब कहां चली जाती है जब वह रोहिंग्या मुस्लिमों को यहां बसाती हैं? वे बांग्ला-भाषी भी नहीं हैं। ममता को बांग्ला-भाषा से इतना ही लगाव है तो फिर मुस्लिमों को बोलें कि वे भी सिर्फ बांग्ला-भाषा में बात करें।
                  “असीम मित्रा, वरिष्ठ पत्रकार कोलकाता”   
                                                
'उन्मादियों के लिए ही संवेदनशील हैं ममता'
कोलकाता में डॉक्टरों के ऊपर हुए जानलेवा हमले के विरुद्ध डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान प्रदेश में डॉक्टरों के ऊपर और ज्यादा हमले हुए। कारण यही था कि मुख्यमंत्री का रवैया नकारात्मक रहा। मेरे नेतृत्व में डॉक्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रदेश के राज्यपाल से मिला ताकि समस्या का जल्द ही हल निकाला जाए। राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को तीन बार फोन किया, लेकिन ममता ने उनका फोन नहीं उठाया। जब उन्होंने मुख्यमंत्री के नाम पत्र भेजा तो मुख्यमंत्री ने उस पत्र का जवाब तक नहीं दिया। मुख्यमंत्री के इस अडि़यल व नकरात्मक रवैये से प्रदेश में अभी तक 1000 डॉक्टर इस्तीफा दे चुके हंै।
डॉक्टरों की मांग थी कि मुख्यमंत्री उस घायल डॉक्टर से मिलें व दोषियों पर कार्यवाही हो, डॉक्टरों की सुरक्षा को भी ध्यान रखा जाए। आईपीएस अधिकारी राजीव कुमार से जब सीबीआई पूछताछ करने कोलकाता में उनके घर गई थी तब तो ममता बनर्जी सभी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए उसके समर्थन में रात-भर धरने पर बैठी रही थीं, क्योंकि उन पर शारदा घोटाले का आरोप है जिसे ममता बचाना चाह रही थीं। क्या यही है प्रदेश की मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता? उनकी संवेदना सिर्फ मुस्लिमों या आरोपियों के लिए है। विद्यासागर की मूर्ति को तो तुरंत ही फिर से लगवा दिया गया। लेकिन जब शिक्षार्थी ममता की आंखों के सामने मजहबी उन्मादियों द्वारा सताए जा रहे थे तब उनकी संवेदनशीलता कहां गई थी? मेडिकल कॉलेजों/ अस्पतालों/ डॉक्टरों को पर्याप्त सुरक्षा मिलनी ही चाहिए।
                                                                                                        “डॉ. इन्द्रनील खान वरिष्ठ कैंसर चिकित्सक”
लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य के स्कूलों/कॉलजों में राज्य सरकार की ओर से वितरित उर्दू भाषा में ममता का पत्र
''प्रिय साथियों,
साल 2011 में राज्य की जनता द्वारा मुझे भरपूर समर्थन मिला। तब से लेकर अब तक यानी आठ साल बीतने के बाद राज्य सरकार अनेक विकासपरक कामों में लगी हुई है। खासतौर पर राज्य के लाचार-गरीब मुस्लिम लोगों की तरक्की और उनके विकास के लिए बहुत सी योजनाएं शुरू की गई हैं। मुझे आपको बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि हमारी सरकार द्वारा मदरसे में दी जाने वाली तालीम और उर्दू माध्यम के तहत आने वाले केंद्रों में दी जाने वाली शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति की योजनाएं शुरू की गई हैं। मुझे उम्मीद है कि इस योजना के जरिए आपको अपनी रोजमर्रा जिंदगी में राहत मिली है और मैं विश्वास दिलाती हूं कि आने वाले दिनों में इसी योजना के तहत और भी सहूलियत दिलाऊंगी। खुश रहें, सेहतमंद रहें।''
 
ममता बनर्जी
मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल.