जरूरी है एक देश-एक चुनाव
   दिनांक 27-जून-2019
 
 
सत्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में मेजों की थपथपाहट में भविष्य के भारत की गूंज सुनी जा सकती है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पूर्व में भी हुए हैं, आगे भी होंगे ही, किंतु हर बार के मुकाबले इस अभिभाषण की खास बात यह रही कि सरकार के जिन कार्यों का इसमें उल्लेख हुआ उनमें भरोसा जगाने वाले आंकड़े और पारदर्शिता की कहानियां भी थीं। नदी, पर्यावरण, रोजगार, महिला सशक्तिकरण या विकास... अभिभाषण में यदि आने वाले कल के लिए उम्मीदें संजोई गई हैं तो उनका आधार ठोस-फलीभूत योजनाओं का ताना-बाना है।
उद्बोधन समग्र इसलिए भी कहा जा सकता है कि इसमें जनता के लिए दवाई, पढ़ाई और कमाई के उस त्रिकोण को सुगम बनाने का खाका सामने आया जिसमें उलझकर स्वतंत्रता के बाद से मध्य तथा निम्नवर्ग की आशाएं दशकों दम तोड़ती रहीं। अभिभाषण में क्षेत्रीय आशाओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं के मेल की बात हो या केंद्र्र-राज्य सहयोग से भारतीय अर्थव्यवस्था को पचास खरब डॉलर की ऊंचाई पर ले जाने का कठिन संकल्प, जन भागीदारी, सामाजिक सहयोग तथा केंद्र-राज्य समन्वय के संकेत बताते हैं कि बढ़ते भारत की गति राष्ट्रीय एकता के बिना संभव नहीं, यह बात वर्तमान सरकार ने बहुत अच्छी तरह समझ ली (तथा बता भी दी) है।
इस संबंध में 'एक देश, एक चुनाव' की परिकल्पना पर बढ़ने का आह्वान अभिभाषण की बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। इस मुद्दे पर विभिन्न दलों की बैठक तथा उलझन, अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए समिति गठित करने की दिशा में बढ़े कदम बताते हैं कि सरकार अब इस मुद्दे पर व्यापक समझ तथा सहमति बनाने से पीछे नहीं हटने वाली।
मुख्यधारा मीडिया में 'एक देश, एक चुनाव' का मुद्दा उठाने, इस प्रश्न पर राजनीति, संविधान तथा मीडिया विशेषज्ञों के साथ संगोष्ठी-संविमर्श आयोजित करने में पाञ्चजन्य की अग्रणी भूमिका रही है। इसलिए हमारे लिए इस मुद्दे का गति पकड़ना विशेष उत्साह की बात है।
“भारत को विश्व मंच पर जिस गति के साथ बढ़ना है और जिस तैयारी के साथ रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना है उसके लिए आवश्यक है कि 'एक देश एक चुनाव' की राह पर आगे बढ़ा जाए।”
 
90 करोड़ मतदाता और चुनाव ड्यूटी में लगने वाले भीमकाय तंत्र को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि व्यवस्थाओं को समेकित-संक्षिप्त-संयोजित किया जाए।
ध्यान देने वाली बात है कि यह प्रश्न या व्यवस्था नई नहीं है। केंद्र मंर सत्तासीन कांग्रेस द्वारा राज्य सरकारों को भंग करने, विवादित तरीके से राज्यों पर राष्ट्रपति शासन थोपने की कहानियां शुरू होने से पहले, 1967 तक देश में लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे। चुनाव आयोग इस बारे में 1983 में सुझाव दे चुका है। 1999 में न्यायामूर्ति जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाला विधि आयोग चुनाव एक साथ कराए जाने की व्यवस्था में लौटने की सलाह दे चुका है। 2015 में संसद की स्थाई समिति इसका प्रस्ताव कर चुकी है। और तो और अगस्त 2018 में विधि आयोग ने इस पर एक रिपोर्ट भी दी, जिसमें एक साथ चुनाव में आने वाली अड़चनों से बचने के लिए तीन वैकल्पिक तरीके भी सुझाए गए।
दरअसल, बात अब सुझावों से बढ़कर जरूरत की है। भारत ने अपने लिए जो आगामी लक्ष्य रखे हैं और जिस तरह विभिन्न केंद्रीय और राज्य योजनाओं के तार आपस में जुड़ रहे हैं, उसे देखते हुए जरूरी हो जाता है कि योजनाओं के अधिकतम लाभ और कठिन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कदम मिलाकर चला जाए और हर वक्त राजनीतिक आरोपों के दंगल से बाहर आकर देश-समाज की चिंता में जुटा जाए। नई योजनाओं, घोषणाओं तथा विकास पर जब-तब लगने वाला आचार संहिताओं का ताला लोकतंत्र की क्षणिक, तात्कालिक जरूरत हो सकता है, किंतु उसे व्यवस्था का स्थाईभाव नहीं बनाया जा सकता। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि विगत 32 वर्ष में कोई साल ऐसा नहीं बीता जब पूरे देश या कुछ राज्यों में आचार संहिता न लगी रही हो।
इस व्यवस्था के विपक्ष में तर्क देने वालों के तर्क सुनना जरूरी है। यदि कुछ आशंकाएं हैं तो उनका निदान ढूंढना भी जरूरी है, किंतु भारत के राजकोष पर बेजा बोझ तथा समाज पर सतत चुनावी अव्यवस्था तथा दबाव को हटाना इससे भी ज्यादा जरूरी है। कुछ दल यह शोर जरूर मचा सकते हैं कि यह राज्यों पर पिछले दरवाजे से राष्ट्रपति शासन थोपने की चाल है, किंतु उनकी यह आशंका ठीक नहीं है। दरअसल, राजनीतिक दलों में यह डर कांग्रेस राज के उन अनुभवों से उपजा है जब राज्यों की बांह ऐंठकर, लोकतंत्र का गला घोटने के आरोपों के बीच कांग्रेस के इशारे पर कुर्सी के खेल हुए। ऐसे अपवाद, अपवाद ही रहें, उन्हें उदाहरण की तरह पेश न किया जा सके, यह लोकतंत्र और व्यवस्था में जन विश्वास को बचाए रखने के लिए जरूरी है।
इस बात में वजन है कि लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव साथ होने पर राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रों में भी प्रभावी रह सकते हैं। इसमें गलत क्या है! राष्ट्रीय मुद्दे हमें एक बड़े परिवार की तरह सोचने-बढ़ने और फैसलों पर मुहर लगाने का मौका देते हैं। क्षेत्रीय मुद्दे स्थानीय प्रचार तथा प्रशासनिक निदानों की दृष्टि से जगह बना ही लेते हैं, यह आजमाई हुई बात है। सीमाओं की सुरक्षा कब किसी सड़क-स्कूल के मुद्दे को दबाती है!
 
दरअसल, राष्ट्रीय मुद्दे एक ठोस इकाई के रूप में देश, इसकी अपेक्षा, आकांक्षाओं को चिन्हित करते हुए समाज में परस्पर जुड़ाव पैदा करते हैं। इसके उलट, विभाजन और विद्वेष की राजनीति को वे स्थितियां ज्यादा रास आती हैं जिनमेंभिन्न राज्यों में अलग-अलग तथा केंद्र-राज्य के स्तर पर भी अलग प्रकार के मुद्दों से राजनीतिक-सामाजिक गुटों को साधा जाए।
विभिन्न मुद्दों में उलझा और अलग-अलग राजनीतिक तान पर क्षणिक जोश, निराशा या आक्रोश में डूबता-उतराता मतदाता राजनीति का आसान चारा हो सकता है, राष्ट्रीय सरोकारों का पहरुआ नहीं हो सकता।
इसके उलट इस बात की संभावनाएं ज्यादा हैं कि एक साथ चुनाव की व्यवस्था क्षेत्रीय समस्याओं से निपटने के लिए ज्यादा सुविधा प्रदान करने वाली हो! ध्यान दीजिए, कर्नाटक तथा बिहार के लोकसभा से अलग चुनाव कराने पर सरकार का 9,500 करोड़ रुपए खर्च बैठा है। इसमें राजनीतिक दलों का प्रचार खर्च शामिल नहीं है! इतनी राशि यदि बिहार के अस्पतालों पर लगी होती तो चुनाव नतीजे चाहे जो होते, नवजात शवों की संख्या और आंसुओं के सैलाब का नजारा इतना दिल बैठाने वाला निश्चित ही नहीं होता!
भारत को विश्व मंच पर जिस गति के साथ बढ़ना है और जिस तैयारी के साथ रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना है उसके लिए आवश्यक है कि 'एक देश एक चुनाव' की राह पर आगे बढ़ा जाए।
 
मुख्यधारा मीडिया में 'एक देश, एक चुनाव' का मुद्दा उठाने, इस प्रश्न पर राजनीति, संविधान तथा मीडिया विशेषज्ञों के साथ संगोष्ठी-संविमर्श आयोजित करने में पाञ्चजन्य की अग्रणी भूमिका रही है।