जयंती विशेष: दृढ़ निश्चय के धनी डा. अमरसिंह
   दिनांक 10-जुलाई-2019
 
किसी भी काम को करते समय अनेक बाधाएं आती हैं। कुछ लोग इनके आगे घुटने टेक देते हैं, जबकि कुछ उन्हें हंसी में उड़ाकर आगे बढ़ जाते हैं। संघ के वरिष्ठ प्रचारक डा. अमरसिंह दूसरे प्रकार के लोगों में से थे
 
उनका जन्म 10 जुलाई, 1940 को जिला सुल्तानपुर (उ.प्र.) के ग्राम सिंहौली (कोइरीपुर) में श्री लक्ष्मणसिंह तथा माता श्रीमती छविराजी देवी के घर में हुआ था। चार बहिन तथा पांच भाइयों वाले बड़े परिवार में उनका नंबर चौथा था। प्रखर मेधा के धनी होने के कारण पूरे परिवार में वे ही सबसे अधिक शिक्षा प्राप्त कर सके।
प्राथमिक शिक्षा गांव में पूरी कर उन्होंने 1958 में राजा हरपाल सिंह इंटर काॅलिज, सिंगरामऊ (जौनपुर) से प्रथम श्रेणी में इंटर; 1960 में तिलकधारी महाविद्यालय, जौनपुर से बी.एस-सी. तथा 1962 में गोरखपुर से भौतिक विज्ञान में प्रथम श्रेणी में एम.एस-सी. की उपाधि प्राप्त की। एम.एस-सी. में उन्हें गोरखपुर वि.वि. की सम्मान सूची (मेरिट लिस्ट) में स्थान मिला था।
जौनपुर में उनका संपर्क संघ से हुआ और फिर वे पढ़ते हुए लगातार सक्रिय बने रहे। इस दौरान भाऊराव देवरस, रज्जू भैया, जयगोपाल जी तथा ठाकुर राजनीति सिंह आदि वरिष्ठ प्रचारकों का उनके जीवन और विचारों पर बहुत प्रभाव पड़ा।
एम.एस-सी. के बाद उन्होंने रज्जू भैया के सहपाठी डा. देवेन्द्र शर्मा के निर्देशन में ‘प्रकाश’ पर शोध कर 1967 में पी.एच-डी. की उपाधि पाई। डा. देवेन्द्र शर्मा भौतिकी के प्रख्यात विद्वान थे। आगे चलकर वे वि.वि. में कुलपति भी बने। उनके निर्देशन में शोध करने वालों को सभी बड़े महाविद्यालय अपने यहां नौकरी दे देते थे। 1969 में डा. अमरसिंह का चयन भी गोरखपुर वि.वि. में प्रवक्ता पद पर हो गया; पर तब तक वे संघ को जीवन देने का निश्चय कर चुके थे। अतः उन्होंने इस मार्ग को सदा के लिए नमस्ते कर दी।
डा. अमरसिंह का प्रचारक जीवन 1972 में कानपुर से प्रारम्भ हुआ। आपातकाल के दौरान उनका कार्यक्षेत्र लखनऊ था। प्रचारकों को उस समय जेल जाने की मनाही थी। अतः वे बाहर रहकर ही आंदोलन और कार्यकर्ताओं की देखभाल करते रहे। कुछ समय बाद उनका केन्द्र प्रयाग बनाकर उन्हें पूर्वी उ.प्र. में अ.भा.विद्यार्थी परिषद का काम दिया गया।
आपातकाल के बाद वे प्रयाग महानगर, कानपुर विभाग और फिर गोरखपुर विभाग प्रचारक रहे। 1989-90 में उन्हें विद्या भारती के काम में लगाया गया। उ.प्र. के चार प्रान्त होने पर वे क्रमशः काशी संभाग प्रचारक, काशी प्रांत के संपर्क प्रमुख तथा फिर पूर्वी उ.प्र. क्षेत्र के प्रचारक प्रमुख बने। 2011 में उन्हें पूर्वी उ.प्र. की क्षेत्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया, जिससे वे ठीक से स्वास्थ्य लाभ कर सकें।
डा. अमरसिंह का स्वभाव बहुत विनोदी, सरल, सादगीपूर्ण, निरभिमानी तथा प्रत्युत्पन्नमति वाला था। वे हर समस्या का समाधान हंसते हुए निकालते थे। सायं शाखा, बाल स्वयंसेवक, वन-विहार, चंदन, सहभोज, शिविर आदि की ओर उनका विशेष ध्यान रहता था। छात्रावासों में व्यापक संपर्क के कारण उन्होंने हर जगह नये और युवा कार्यकर्ताओं की अच्छी टोली खड़ी कर दी।
भाइयों में सबसे बड़े, परिवार में सर्वाधिक शिक्षित तथा पिताजी का देहांत हो जाने के कारण सबकी इच्छा थी कि वे नौकरी और विवाह करें। उनकी शिक्षा पर काफी धन भी लगा था; पर वे प्रचारक बन गये। एक बार उनकी माताजी कानपुर कार्यालय पर उन्हें समझाने आयीं; पर वे अपने निश्चय से पीछे नहीं हटे। उन्होंने माताजी से कहा कि यदि आप मुझे खुश देखना चाहती हैं, तो मुझे यही काम करने दें। इस पर वे आशीर्वाद देकर लौट गयीं।
हृदयरोग से ग्रस्त होने पर भी मई-जून के संघ शिक्षा वर्गों में अपने लिए निर्धारित प्रवास उन्होंने पूरा किया। वहां की व्यस्तता और थकान के कारण 17 जून, 2013 को हृदयाघात से वाराणसी में ही उनका निधन हुआ।