हिंदुओं के साथ हो रही 'मॉब लिंचिंग' पर चुप्पी क्यों
   दिनांक 10-जुलाई-2019
तबरेज अंसारी की मौत पर पूरे देश में हंगामा मचा दिया गया है। उसकी मौत के बाद तत्काल कार्रवाई किए जाने के बाद भी सेकुलर जमात द्वारा इस मामले को तूल देकर ऐसा रंग दिया जा रहा है कि जिससे लगे कि देश में ‘मुसलमानों पर अत्याचार’ हो रहे हैं। तबरेज की मौत की आड़ में तोड़फोड़ की जा रही है, पथराव किया जा रहा है
 मेरठ में प्रदर्शन के नाम पर खूब तोड़फोड़ हुई, पुलिस ने बड़ी मुश्किल से स्थिति को काबू में किया।
ऊभी हाल में झारखंड के जिले सरायकेला के धातकीडीह गांव में चोरी के आरोप में पकड़े गए तबरेज अंसारी की मौत के बाद पूरे देश में सेकुलर जमात का साजिशी खेल चल रहा है। जगह—जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसकी मौत का कारण स्पष्ट नहीं है लेकिन इसे ‘मॉब लिचिंग’ बताया जा रहा है। यदि भीड़ द्वारा पिटाई किए जाने से तबरेज की मौत हुई तो यह सभ्य समाज की निशानी तो नहीं है। भीड़ के द्वारा किसी को पीट—पीटकर मार देना निंदनीय तो है ही दंडनीय भी है। दोषियों पर कठोर से कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए लेकिन तबरेज की मौत के बाद देश में जो स्थिति बना दी गई है उसका क्या कारण है? जगह—जगह हिंसक प्रदर्शन किए गए। पुलिस पर पथराव हुआ। इस मामले को तूल देकर ऐसा रंग दिया जा रहा है जिससे लगे कि देश में ‘मुसलमानों पर अत्याचार’ हो रहे हैं।
अब इस मामले के दूसरे पहलू को देखें। तबरेज की मौत के बाद 24 जून को धातकीडीह गांव में सुबह 11 बजे राजनीतिक झंडों-डंडों और हॉकियों से लैस पांच गाड़ियां पहुंचीं और बदमाशों ने ‘हिन्दुओं’ को सबक सिखाने की धमकी दी, अल्लाह-हो-अकबर के नारे लगाए। महिलाओं को घर में घुसकर बलात्कार तथा लोगों को दिनदहाड़े बम से उड़ाने की धमकियां दी गई! यह सब क्या है? आगरा और मेरठ में हिंसक प्रदर्शन हुए। पथराव हुआ, हिन्दुओं की दुकानें तोड़ दी गई लेकिन सब चुप है क्यों?
इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया’ पर शोध करने वाले बिनय कुमार सिंह का कहना है कि ऐसे मामले में जो भी शोर मचा रहे हैं उनको किसी तबरेज के सुख और दुख से कोई लेना देना नहीं है। अपने पेशे को चमकाने और राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए ये लोग ऐसा करते हैं। ये लोग किसी एक घटना को इस तरीके से दुनिया को बताने और जताने का प्रयास करते हैं मानो पूरे भारतवर्ष का यही माहौल हो। जबकि इसके उलट जो मामले इनको ‘फायदे वाले’ नहीं लगते उन पर चुप्पी साध लेते हैं। दिल्ली में हाल ही में हुई ध्रुव त्यागी की हत्या और पिछले साल हुई अंकित सक्सेना की हत्या ऐसे ही दो उदाहरण हैं। पुलिस की मानें तो तबरेज चोरी करते हुए पकड़ा गया और आक्रोशित भीड़ ने उसकी पिटाई की। (हालांकि अभी साफ नहीं है कि उसकी मौत भीड़ द्वारा की गई मार—पीट के कारण ही हुई है।) जबकि एक कड़वी सचाई यह है कि कुछ मुद्दे इस देश में सुनियोजित ढंग से उठाए जाते हैं। चाहे वह उत्तर प्रदेश में गोमांस के मामले में अखलाक की हत्या का हो या फिर झारखंड में चोरी के अपराध में तबरेज व कठुआ में मासूम की हत्या का। ऐसे ही पूरे देश में इन सभी मामलों को इस तरह से तूल दिया गया कि मानो पूरे देश का ही ऐसा माहौल हो। 
आगरा में हिंसक प्रदर्शन करते मुस्लिमों को खदेड़ती पुलिस
 
इसके उलट यदि कोई हिंदू इस तरह की घटना में मारा जाता है तो चुप्पी साध ली जाती है। स्क्रीन काली कर डालने वाले, हर चीज में लिंचिंग ढूंढने वाले मीडिया के एक खास वर्ग के लिए यह खबर नहीं होती। सेकुलरिज्म का चश्मा लगाए चैनलों पर बहस करने वाले पत्रकार ऐसी घटनाओं पर खामोश हो जाते हैं। कथित बुद्धिजीवी दलीलें देते हैं कि मामले को हिंदू—मुस्लिम के नजरिए से न देखा जाए। ‘सलेक्टिव जर्नलिज्म’ (मजहब, जात, सुविधा देखकर होने वाली पत्रकारिता) और ‘सलेक्टिव क्रिटिसिज्म’ (सुविधा के हिसाब से मुद्दों को आलोचना के लिए चुनना) वाला एक तबका लंबे समय से देश के मीडिया पर काबिज है। ये वही लोग हैं। अपराध में जहां मुसलमान शामिल हों, उसके लिए इनकी परिभाषा बहुत सरल है- अपराध का और अपराधियों का कोई मजहब नहीं होता। पूरी दुनिया में फैले मजहबी आतंकवाद का इनकी निगाह में ‘कोई मजहब नहीं’ है। लेकिन ये किस हिसाब से एजेंड निर्धारित करते हैं, जरा गौर कीजिए। 21 मार्च 2019 को गुरुग्राम में एक घटना हुई। क्रिकेट खेलने को लेकर विवाद हुआ, जिसने दो पक्षों के बीच मारपीट का रूप ले लिया। इस मामले का वीडियो सामने आने पर बार—बार इस घटना को प्राइम टाइम में चैनलों पर दिखाया गया। दो पक्षों में हुए इस झगड़े पर इस तरह का विमर्श तय किया गया मानो मुसलमानों पर बड़ा जुल्म हुआ हो। अखबारों में पहले पेज पर खबरें दी गई। कई दिनों तक मामला लगातार सुर्खियों में रहा।
फरवरी 2018 में दिल्ली में एक मुस्लिम परिवार द्वारा अंकित सक्सेना की सरेराह हत्या कर दी गई थी। मुसलमान लड़की से दोस्ती के चलते दिल्ली में अंकित की हत्या को लेकर कथित सेकुलर मीडिया ने जिस तरह रिपोर्टिंग की थी उसे देखकर मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया स्पष्ट नजर आता है। क्योंकि यहां मरने वाला हिंदू युवक था और मारने वाले मुसलमान, इसलिए यह खबर सेकुलर मीडिया के एजेंडे में फिट नहीं बैठी। इस खबर पर न चैनलों में पैनल बिठाए गए, न ही संपादकीय लिखे गए। वहीं 22 जून 2017 को ट्रेन में सीट के विवाद के चलते जुनैद की हत्या को तुरंत असहिष्णुता करार दे दिया था। मीडिया ने इस मामले में यह धारणा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि भीड़ द्वारा नफरत के चलते मुसलमान युवक की हत्या की गई। ऐसा ही अखलाक और पहलू खान की हत्या के मामले में भी मीडिया ने किया था और मामले को पूरी तरह हिंदू और मुस्लिम बना दिया था।
हाल ही में बेटी से हुई छेड़खानी का विरोध करने पर दिल्ली के बसईदारापुर में ध्रुव त्यागी की हत्या कर दी गई थी। घटना 11 मई की है। मोहल्ले के ही एक आपराधिक मुस्लिम परिवार के युवकों ने ध्रुव त्यागी की बेटी से छेड़छाड़ की। जब उन्होंने एतराज किया, तो पूरा परिवार उन पर टूट पड़ा। 11 लोगों ने घेरकर ध्रुव त्यागी और उनके बेटे को चाकुओं से गोद दिया। चार महिलाएं भी इसमें शामिल थीं। ध्रुव का पेट चीर डालने के लिए बड़ा चाकू एक महिला ने ही घर से लाकर दिया था। रमजान के महीने में पूरा परिवार इस हत्या को अंजाम देने में जुटा था, लेकिन यहां किसी को ‘मॉब लिचिंग’ नहीं दिखाई दी।
तबरेज की हत्या के बाद जो कथित ‘शांति मार्च’ निकाले गए उसमें उत्तर प्रदेश के आगरा एवं मेरठ आदि जनपदों में जमकर हिंसा हुई। 30 जून की शाम मेरठ जनपद के फैज-ए-आम कॉलेज से मुसलमानों की भीड़ निकल कर सड़क पर आई और उसके बाद बिना अनुमति लिए जुलूस निकालने का प्रयास किया। पुलिस ने जुलूस निकालने से रोक दिया। मगर वहां पर मौजूद भीड़ ने पुलिस से धक्का मुक्की शुरू कर दी। कानून-व्यवस्था बिगड़ती देख पुलिस ने लाठी चार्ज करके जुलूस निकालने वालों को खदेड़ दिया। इसके अगले दिन सोमवार को मेरठ के मवाना में भी हजारों की संख्या में मुसलमानों ने एक मस्जिद के बाहर जुलूस निकालने का प्रयास किया। स्थिति बिगड़ते देख वहां पर भी पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
इसी प्रकार आगरा में कुछ मुसलमान, तबरेज के मामले में जामा मस्जिद के सामने ज्ञापन देना चाहते थे। आगरा जनपद के अपर जिलाधिकारी (नगर) के.पी. सिंह को ज्ञापन देने के बाद करीब दो हजार मुसलमान युवकों ने ऐलान किया कि अब वह कलेक्ट्रेट परिसर में जाकर जिलाधिकारी से वार्ता करेंगे। वे वहां से जुलूस निकालते हुए आगे बढ़ने लगे। पुलिस को लगा कि ये लोग कलेक्ट्रेट की तरफ जा रहे हैं मगर अचानक से वह मंटोला मोहल्ले की तरफ मुड़ गए। मुसलमान युवक, मंटोला थाने से कुछ दूर पहले एक मिठाई की दुकान को जबरदस्ती बंद कराने पर आमादा हो गए। दुकान मालिक के विरोध करने पर विवाद बढ़ गया। मुसलमानों ने पथराव शुरू कर दिया। पथराव में एक युवक घायल हो गया। प्रदर्शन करने वालों ने पुलिस पर भी पथराव किया। मौके पर पहुंच कर पुलिस ने भीड़ को वहां से खदेड़ा। पुलिस ने शहर में दंगा नियंत्रण धारा लागू कर दी। पूरे शहर में पुलिस को चौंकन्ना कर दिया गया। पुलिस का कहना है कि जुलूस की कोई अनुमति नहीं दी गई थी।
पिछले साल उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद में चंदन गुप्ता की महज इसलिए हत्या कर दी गई थी कि क्योंकि वह 26 जनवरी को तिरंगा फहराने के लिए निकाले जा रहे जुलूस में शामिल थे। वह भारत माता जय के नारे लगा रहे था। मुस्लिम बहुल इलाके से निकली तिरंगा यात्रा के दौरान कुछ मुसलमानों ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। तिरंगा यात्रा निकाल रहे लोगों पर पथराव किया गया। इस दौरान मुसलमानों की तरफ से चलाई गई गोली से चंदन गुप्ता की मौत हो गई। इस खबर पर सेकुलर मीडिया ने हमेशा की तरह अपराध को अपराध की तरह देखने, किसी मजहब से जोड़कर न देखने की दलीलें दीं। देश में असहिष्णुता का झंडा उठाने वाले कथित बुद्धिजीवियों ने चुप्पी साध ली, आखिर क्यों ?
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सरदाना का कहना है कि तबरेज के मामले में झारखंड सरकार द्वारा तत्काल कार्रवाई की गई। स्वयं प्रधानमंत्री ने भी घटना की निंदा की। बावजूद इसके माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है। घटना झारखंड की है लेकिन प्रदर्शन के नाम पर आगरा और मेरठ में तोड़फोड़ की गई। जिस तरह से एक एजेंडे के तहत यह हो रहा है उससे साजिश की बू आती है। दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अमानतुल्लाह खान ने तबरेज की पत्नी को 5 लाख रुपया और नौकरी देने की घोषणा भी कर दी।
वक्फ बोर्ड की तरफ से यह भी कहा गया है कि तबरेज को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई का जिम्मा भी वक्फ बोर्ड उठाएगा। अरे, कार्रवाई की जा रही है। राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी भी बनाई है। इस तरह की घटना निंदनीय है लेकिन ऐसी घटनाओं की आड़ में जिस तरह एक एजेंडे के तहत देश में एक अलग तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया जाता है वह और भी ज्यादा निंदनीय है।
लेखक व स्तंभकार डॉ. गुलरज शेख का कहना है कि किसी भी आपराधिक घटना को सिर्फ एक ही दृष्टि से देखा जाना चाहिए। अपराधी किसी भी पंथ या मजहब का क्यों न हो, उसके खिलाफ कानूनी तरीके से कार्रवाई की जानी चाहिए। घटना का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। तबरेज अंसारी के मामले में या अन्य किसी ऐसे मामले में जिस तरह से कथित बुद्धिजीवी और सेकुलर मीडिया एक धारणा बनाकर चीजों को प्रस्तुत करते हैं, वह सही नहीं है।