समाज के सामने आने दो सच
   दिनांक 15-जुलाई-2019
यह दुराग्रही प्रवृत्ति का ही नतीजा है कि राहुल गांधी आज कचहरी-कचहरी जा रहे हैं, जमानत पा रहे हैं और बाहर आकर सच की लड़ाई का झूठा नारा लगा रहे हैं। अगर उनके आरोपों में दम था तो उन्हें टिके रहना चाहिए था। राहुल गांधी की जमानत इस बात का 'सर्टिफिकेट' है कि वे लोक को जो पाठ पढ़ा रहे हैं, वह कितना थोथा है।
क्या किसी पुस्तक की समीक्षा बिना उसे पढ़े हो सकती है? किसी भी सामान्य तर्कशील व्यक्ति का जवाब होगा-नहीं। लेकिन कुछ ऐसे तत्व हैं, जो लोगों को समीक्षा तो पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन जब पुस्तक पढ़ने की बात आती है तो ऐसे उछलते हैं मानो पैरों के नीचे अंगारे आ गए हों। इसके उदाहरण समय-समय पर कभी यहां, कभी वहां मिलते रहते हैं। ताजा संदर्भ है राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पढ़ाने का। बी.ए. तीसरे वर्ष की पढ़ाई में इसे शामिल करने की बात है। लेकिन कुछ लोग बौखलाए हुए हैं। ये वही लोग हैं, जो संघ पर हल्ला बोलते रहे हैं। जरूरी है कि इस हल्ले के सार को तलाशने की कोशिश की जाए।
इस भूमि का संस्कार साक्षी है, हमने पढ़ने-जानने में अस्पृश्यता को पैठ नहीं बनाने दी। हां, जानने के बाद वैयक्तिक समझ को आकार लेने की पूरी छूट दी। यह हमारे समाज में व्यक्त-अव्यक्त रूप से आज भी विद्यमान है। हमने बाबर को पढ़ा, नानक को भी। खिलजी को पढ़ा, कबीर को भी।
बात को समझकर राय बनाने का अपने यहां कोई निषेध नहीं।
और तो और भारतीय समाज में विमर्श का स्वभाव यहां तक है कि गलत सबक और उलटी पट्टी पढ़ाने वालों को यह अपने आंगन से बुहारता चलता है।
यही कारण है कि खुद को नेहरूवादी या मार्क्सवादी लिखने वाले कथित इतिहासकारों द्वारा औरंगजेब या अकबर को उदार, दयालु, प्रगतिशील बताने-रटाने और सावरकर को वीर न बताने, महाराणा को महान न ठहराने और भगत सिंह पर आतंकी का ठप्पा चिपकाने के बावजूद लोग राजनीति से निर्देशित इतिहास के झांसे में नहीं आए।
इस समाज ने आततायियों को दुत्कारा, राष्ट्रनायकों के लिए आंदोलन चलाए और बांटने वाली राजनीति और भ्रम फैलाने वाले इतिहासकारों को हाशिए पर पटक दिया।
ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि सही-गलत का फैसला करने में सक्षम समाज की नजरों से कोई बात दूर क्यों रहनी चाहिए? समाज को सोचने का मौका देने से पहले किसी बात पर अपनी राय समाज पर थोपने वाले हल्लेबाज कौन हैं?
अगर कोई विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रम में, वह भी बी.ए. तीसरे वर्ष की पढ़ाई में जब छात्र के सोचने-समझने की शक्ति परिपक्व आकार ले चुकी होती है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को शामिल करता है तो आपत्ति क्यों? कथित सतरंगे समाज के आग्रही इकरंगे का हठ क्यों पाल लेते हैं? खुद फैसला लेने के लिए पढ़ने का फैसला लेने वाले समाज को टीका टिकाना चाहते हैं? या फिर कुछ ऐसे तत्व हैं, जो संघ, भाजपा, हिन्दुत्व का ठप्पा लगाकर हर चीज का ठीकरा फोड़ते हैं, लेकिन इसके बरक्स दूसरी तरह की राजनीति पालते हैं?
अगर वर्तमान में कोई सवाल करे तो भूत की यात्रा करते हुए वापस आना बढि़या होता है। यह इत्तेफाक नहीं है कि समय की यात्रा करते हुए जब पीछे जाते हैं तो नेहरू काल में जा ठिठकते हैं। मनोहर मलगांवकर की पुस्तक है 'दि मैन हू किल्ड गांधी'। इसमें जिक्र है कि एल. बी. भोपतकर से बातचीत में तत्कालीन विधि मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वयं बताया था कि कहीं कोई सबूत नहीं होने के बाद भी नेहरू किसी भी कीमत पर सावरकर को इस हत्याकांड से जोड़ना चाहते थे। इस हठ का कारण? जवाहरलाल नेहरू की आंखों पर चढ़े साम्यवादी चश्मे से जो अक्स उभरता था, उसे भारत का चिरंतन मन अवरुद्ध करता था। इसी कारणवश उन्हें प्रखर सांस्कृतिक विचारक सावरकर और सांस्कृतिक चेतना जगाने में जुटा संघ, फूटी आंखों नहीं सुहाते थे। यदि ऐसा नहीं था तो आखिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकरण में संघ को हर आरोप से बेदाग ठहराए जाने के बाद भी इस पर प्रतिबंध लगा क्यों रहता? यह बात समाज के सामने आने की बजाय संघ विरोध का नेहरूवादी नगाड़ा कौन लोग बजाते रहना चाहते हैं?
नेहरू काल की उस सोच की निरंतरता आज भी मिलती है। हिंदू या सनातन विचार को दूषित करने के प्रयास आज भी जारी हैं। संप्रग राज में 'हिंदू आतंकवाद' की 'पैकेजिंग' इस तरह कर दी गई थी कि आने वाले समय में इसके रंग के गहराने का अंदेशा होने लगा था। वह तो उनकी बदनसीबी थी कि अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया, वर्ना तो मुंबई हमले को 'हिंदू आतंकवाद' से जोड़ ही दिया गया होता। जरा सोचिए, कसाब के जिंदा पकड़े जाने के बाद भी अजीज बर्नी यह किताब लिखते हैं- 'मुंबई हमला : आरएसएस की साजिश।' और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह इसका विमोचन करते हैं। दिग्विजय के लिए ओसामा बिन लादेन और हाफिज सईद जैसे आतंकवादियों के लिए भी 'जी' बिना संबोधन पूरा नहीं होता। इन महाशय को नफरत का पाठ पढ़ाने वाला जाकिर नायक 'शांतिदूत' नजर आता है।
संघ के प्रति बौखलाहट उधर बंगाल में भी मिलती है। गांधी जयंती पर कोलकाता के दमदम बाजार में बम फटता है और इसमें आठ साल का बच्चा मारा जाता है। पुलिस अभी जांच शुरू भी नहीं करती है कि ममता बनर्जी के मंत्री पूर्णेंदू बोस इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। ऐसा ही एक मामला इस्लामपुर के दरीभीत स्कूल का है। शिक्षकों की भर्ती के मामले में छात्रों ने विरोध किया तो पुलिस ने गोली चला दी और इसमें दो छात्र मारे गए। गोली किसने चलाई? ममता की पुलिस ने। लेकिन इस मामले में तो खुद ममता ने संघ को दोषी ठहरा दिया। संघ प्रांत कार्यवाह जिष्णु बसु ने इस मामले में टीएमसी को कानूनी नोटिस भेजा है। बिना किसी सबूत संघ पर उंगली उठाने वाली ममता के राज में पश्चिम बंगाल कैसे आतंकवाद का अड्डा बन गया है, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पिछले 30 साल में भारत में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सबसे ज्यादा एजेंट बंगाल से ही पकड़े गए। इसे ममता के कांग्रेसी डीएनए का असर कहें, तो गलत नहीं होगा।
अंग्रेजों से शासन का गुर सीखने वाले देसी अंग्रेजों के डीएनए में अपनी धारणा का हठ कितना मजबूत था, इसका उदाहरण है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी उनके मन में सावरकर और संघ का कांटा फंसा रहा और आज कांग्रेस के 'युवराज' राहुल गांधी तक गांधी की हत्या के लिए संघ को कसूरवार ठहराने से नहीं हिचकते। इसी दुराग्रही प्रवृत्ति का नतीजा है कि राहुल गांधी आज कचहरी-कचहरी जा रहे हैं, जमानत पा रहे हैं और बाहर आकर सच की लड़ाई का झूठा नारा लगा रहे हैं। अगर उनके आरोपों में दम था तो उन्हें टिके रहना चाहिए था। राहुल गांधी की जमानत इस बात का 'सर्टिफिकेट' है कि वे लोक को जो पाठ पढ़ा रहे हैं, वह कितना थोथा है। थोथे आधारों पर विरोध करने और लोगों के हाथ में पुस्तक की जगह समीक्षा थमाने वाले लोगों के लिए बेचैन होने का समय है, क्योंकि लोगों में मूल को जानने-समझने की प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है और आने वाले समय में ऐसे थोथे विरोधियों के लिए हाय-तौबा मचाने के तमाम कारण होंगे।