आरोपी तो आरोपी होता है, हिन्दू या मुसलमान नहीं
   दिनांक 02-जुलाई-2019

 
झारखंड के सरायकेला में हुआ ताजा प्रकरण स्तब्ध करने वाला है। यहां पुलिस हिरासत में जिस तबरेज अंसारी की मौत हुई वह चोरी के आरोप में भीड़ द्वारा पीटे जाने के बाद यहां लाया गया था।
प्रथम दृष्टया मामले के दो पहलू हैं। एक, लोगों द्वारा कानून हाथ में लेना। दूसरा, मौत, जिसकी हत्या होने का भी अंदेशा है। यह शक किस पर है? पुलिस पर या समाज पर.. या कोई और भी हो सकता है?
सूत्रों के अनुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आंतरिक चोटों की बात सामने नहीं आई है। गांव वाले कह रहे हैं कि चोरी के अंदेशे में पिटाई जरूर हुई किन्तु गंभीर चोट नहीं पहुंची थी। फिर मौत हुई कैसे! पुलिस-प्रशासन तथा स्थानीय लोग दबी जबान में एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। गहन-निष्पक्ष जांच से मामला साफ हो सकेगा, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए। किन्तु इसे सिर्फ एक घटना मानना भूल होगी। पुलिस या भीड़ के स्तर पर यह एक प्रवृत्ति है जो बार-बार आहत करने वाली झलक दिखाती है। कुछ लोग ऐसी घटनाओं की खास मजहबी-राजनीतिक व्याख्या से समाज का गुस्सा और भड़काते हैं। ऐसे हर प्रकरण में दोषी जो भी हो वह यह भूल जाता है कि संविधान से चलने वाले देश में कानून को हाथ में लेना अपराध है। इस मामले के मूल को समझे बिना और इस मुद्दे की आड़ में समाज को बांटने वाली, नफरत की राजनीति करने वालों की पहचान किए बिना बात अधूरी रहेगी।
याद कीजिए पलवल का जुनैद प्रकरण। ट्रेन में ‘सीट’ को लेकर हुई मारपीट में दुर्भाग्य से एक की जान गई, लेकिन कुछ लोगों ने जांच और न्याय से पहले अपने ही स्तर पर ‘सीट’ को ‘बीफ’ घोषित करते हुए ‘गैर इरादतन’ हत्या के मामले को मजहबी पहचान से जुड़ी हत्या ठहरा दिया!
ध्यान देने वाली बात है कि तबरेज की मौत ने हिंसा और विद्वेष की राजनीति करने वालों को पसंदीदा मुद्दा थमा दिया है। अपराध को अपराध की तरह देखने की बजाय गुत्थी को ‘मुस्लिम उत्पीड़न’ का रंग देने वाले तत्वों के लिए यह मौत एक मौका थी, जहां वे चूके नहीं।
24 जून को धातकीडीह गांव में सुबह 11 बजे राजनीतिक झंडे-डंडे, हॉकियों से लैस पांच गाड़ियां पहुंचीं और बदमाशों ने ‘हिन्दुओं’ को सबक सिखाने के लिए अल्लाहू-अकबर के नारे लगाए। महिलाओं को घर में घुसकर बलात्कार तथा लोगों को दिनदहाड़े बम से उड़ाने की धमकियां मिलीं ! इससे एक रोज पहले मुस्लिम महिलाओं ने मार्च निकाला। सवाल यह है कि तबरेज से किसी हुड़दंगी द्वारा जबरन लगवाए नारे में ‘हिंदू उन्माद’ पहचान लेने वाली बुद्धिजीवी आंखों को धातकीडीह में सायास ललकारते मजहबी नारे और चेहरे पहचान क्यों नहीं आते ! क्या यह मामले को खास दिशा में मोड़ने की साजिश है?
इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि दिल्ली में डॉ. नारंग की हत्या को ‘लिंचिंग’ न मानने वाले या आगरा में अरुण माहौर की हत्या को ‘मजहबी उन्मादियों द्वारा हत्या’ न मानने वाले जब ‘मुस्लिम’ शब्द पर जोर देते हैं तो सोशल मीडिया से लेकर अन्य विश्वसनीय बौद्धिक दायरों में सवाल उठने लगते हैं। अपराध को वर्ग, मजहब और जातियों में बांट मुद्दा गरमाना आसान है, सुलझाना मुश्किल। नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस से निराश समाज और अपराध को राजनीतिक प्रश्रय से तपते पुलिस तंत्र द्वारा ‘मौके पर फैसला’ करने की घटनाएं होती रही हैं।
यह गुस्सा है, जो भीतर ही भीतर खदबदा रहा है। न्याय व्यवस्था पर या तो भरोसा छीज रहा है या न्याय की राह में आने वाली अड़चनों ने आक्रोश पैदा कर दिया है। यह गुस्सा जब-तब फूट पड़ता है। ऐसे में घटनाओं को खास तरह से घुमा देने वाले तत्व समाज में और गहरी खाई पैदा कर देते हैं। क्रूर अपराधियों से निपटने में भ्रष्ट अधिकारियों/राजनेताओं की अड़चन पर गंगाजल जैसी फिल्म 2003 में बनी है। वर्ष 2017 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाली ‘द आइज ऑफ डार्कनेस’ का विषय भी लोगों द्वारा कानून को हाथ में लेना था। सवाल यह है कि घटनाएं होने, इन पर फिल्में बनने के बाद ऐसे कौन से कदम उठें कि लोगों का न्याय व्यवस्था में भरोसा बहाल हो! जब तक त्वरित, निष्पक्ष, पारदर्शी न्याय का भरोसा नहीं होगा तब तक ऐसी घटनाओं की आशंका बनी रहेगी। आरोपी में हिन्दू-मुसलमान देखने वाले, ‘सीट’ में ‘बीफ’ देखने वाले कथित बुद्धिजीवी और व्यवस्था की बजाय खुद मौके पर फैसला करने वाले ‘रॉबिनहुड’, देश और समाज के लिए दोनों बराबर खतरनाक हैं, जब तक यह बात नहीं समझेंगे, बात नहीं बनेगी।