उतर रहा है नकाब आहिस्ता-आहिस्ता
   दिनांक 22-जुलाई-2019

 
हाल के दिनों में कुछ खबरों ने खासा कोलाहल पैदा किया। ये ऐसी खबरें थीं जिनकी मीमांसा मीडिया की जिम्मेदारी थी, किन्तु इन खबरों को मिर्च-मसाला लगाकर फूहड़ तरीके से परोसा गया और पृष्ठभूमि में छिपे प्रश्न गौण हो गए।
पहला मामला बरेली के एक विधायक की पुत्री के 'प्रेम विवाह' का था। यह ऐसे ही अन्य अनेक मामलों की तरह सामान्य हो सकता था यदि कुछ लोगों की रुचि विधायक की पार्टी और युवक की जाति पर केंद्रित न होती। भाजपा का नाम दिखते ही कुछ लोग इस पर 'जातिवाद' का तथा खुद पर प्रगतिशील या सेकुलर होने का ठप्पा चिपकाने लगते हैं। किन्तु ऐसी कोशिश करने वाले इस प्रकरण में यह भूल गए कि यहां मामला उलटा है। विधायक परिवार ने तो अनुसूचित जाति के युवक को स्नेह और निकटता दी थी! उसे अपने घर में जहां चाहे आ—जा सकने की छूट दी थी। साफ है कि इस मामले में संबधों में कृतघ्नता का आरोप भले लगे, जातिगत वैमनस्य तो दूर-दूर तक नहीं है! लड़की के पिता ने भी यह साफ कहा कि उनकी आपत्ति लड़के की बड़ी आयु को लेकर है, जाति पर नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को लक्षित कर परोक्ष रूप से 'हिन्दू' को लांछित करने की मंशाओं के पीछे लक्ष्य क्या है?
जातिगत भेदभाव एक बुराई है, यह बात ध्यान में रखते हुए इस भेदभाव को मिटाने के लिए राजनीति में भाजपा से ज्यादा गहराई और प्रामाणिकता से किसने काम किया! एक ऐसा दल जो राजनीति में अंत्योदय का विचार देता है और जाति को ताक पर रख प्रतिभा, संगठन कुशलता, नेतृत्व क्षमता को ध्यान रखते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था को हीरे जैसे लोग देता है, उस पर संकीर्णता, पिछड़ेपन का ठप्पा लगाने का क्या मतलब!
पिछड़ापन देखना हो तो यह बरेली की घटना से ज्यादा मुरादाबाद की एक अन्य घटना में दिखता है जो बरेली से ज्यादा दूर नहीं है। यह खबर हैरान करने वाली थी कि मुरादाबाद में मुसलमान नाइयों ने अनुसूचित जाति के ग्राहकों के दाढ़ी-बाल काटने से इनकार कर दिया। मुसलमान नाइयों के इस कदम के पीछे उनकी यह सोच थी कि अनुसूचित जाति के लोग अछूत हैं, इन ग्राहकों के 'गंदे' तौलियों से 'ईमान वाले ग्राहक' भी खराब होते हैं!
यह कैसी सोच है! हिन्दू जातियों में ऐसे भेदभाव का कौन सा उदाहरण दिख रहा है? किन्तु मुरादाबाद में मध्यकालीन कबीलाई मानसिकता अनुसूचित जातियों के प्रति घृणा का खुला प्रदर्शन करती है तो इसमें मीडिया की रुचि नहीं होती! मीडिया इस खबर से भी आंख फेर लेता है कि नागपुर में एक मुस्लिम युवक ने उस पर पूरा भरोसा करने वाली 19 साल की एक हिन्दू लड़की की कितनी वीभत्सता के साथ हत्या कर दी। एक और घटना जिस पर मीडिया के उस वर्ग का ध्यान नहीं गया जो सावन लगते ही 'बरखा—बरखा' की रट लगाता दिख रहा है। उस घटना में एक दलित वर्ग के युवक का दोष इतना भर था कि उसने एक मुस्लिम लड़की से शादी की 'हिमाकत' की थी। केरल, प. बंगाल, कश्मीर के हिन्दुओं की पीड़ा को अखबारों के पन्नों और टेलीविजन चैनलों के पर्दों से लगभग दूर रखने वाले लुटियन जोन और खान मार्किट के मीडिया का हिन्दू विरोधी रुख सामने आ चुका है।
मीडिया के लिए भी यह चेतने का समय है। हिन्दू विचार इस देश का विचार है। समस्त प्राणिजगत के कल्याण की कामना करने वाला विचार, मानवमात्र में भेद के स्थान पर सौहार्द का दर्शन विश्व के सामने रखने वाला विचार है। इस विचार को कोसते हुए आप कहां जाना चाहते हैं!
'बिलीवर' या 'ईमान वाले' विचार, अपने अलावा शेष मानवता को 'काफिर' बताते हुए उनके खिलाफ जिहाद छेड़ने वाले विचार का परिष्कार यदि भारत से नहीं हुआ, संवाद और विमर्श के सूत्र-संयोजक मीडिया के माध्यम से नहीं हुआ तो मीडिया के भारतीय होने का क्या अर्थ रह जाता है! यही समय है जब भारत का होकर भारत से दूर भागने में शान समझने वाले मीडिया को अपने अंतर में झांककर इन प्रश्नों पर मंथन करना होगा, इनका समाधान करना होगा।