कारगिल की हार को जीत बताया था पाकिस्तान ने
   दिनांक 22-जुलाई-2019

कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मिली फटकार को पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तानी फौज प्रशस्ति पत्र की तरह पेश कर रही है. वह बतला रहे हैं की भारत की करारी हार हुई है क्योंकि कुलभूषण को रिहा करने का आदेश नहीं दिया गया है और फांसी की सजा पर सिर्फ रोक लगाई गई है इसलिए यह पाकिस्तान की जीत है.
पाकिस्तान की यह पुरानी फितरत है. हार को जीत बतलाना, अपनी पिटाई के किस्से को पराक्रम की गाथा बनाकर पेश करना. 1965 का विजय दिवस पाकिस्तान में हर साल धूमधाम से मनाया जाता है.
कारगिल को लेकर भी पाकिस्तान ने अपने आवाम से इसी तरह का झूठ बोला. कारगिल की मुंहतोड़ पराजय को पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ अपनी शानदार रणनीति की सफलता के रूप में पेश करते हैं. उन्हीं के शब्दों में " कारगिल में हमने हिंदुस्तान को उसकी गर्दन से पकड़ लिया था." अब यह सवाल तो उठेगा ही कि गर्दन पकड़ ली थी छोड़ क्यों दी? मुशर्रफ इसका जवाब देते हैं, कि नवाज शरीफ ने अमेरिका के दबाव में फौज को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. सचाई यह है कि जब कारगिल में पाकिस्तानियों की लाशें गिरने लगी, और जब चीन और अमेरिका दोनों ने उन्हें मायूस कर दिया, मुशर्रफ तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सामने गिड़गिड़ाने लगे कि वो अमेरिका से बात करके जंग बंद करवा दें . नवाज शरीफ ने भागदौड़ की, पर बेअसर रही. जब पाकिस्तान ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी अपनी बची खुची फौज को वापस बुलाना शुरू कर दिया, परवेज मुशर्रफ ने फौजियों के बीच इसका जश्न मनाया, और जैसे कि उनकी आदत थी, सर पर गिलास रख कर नाचे.
एक दुखती रग 
सियाचिन पाक फौज की दुखती रग है. जिस प्रकार का दुस्साहस पाकिस्तान ने कारगिल में किया, वैसा ही दुस्साहस उसने सियाचिन में करने का प्रयास किया था. सियाचिन ग्लेशियर भारत और पाकिस्तान के इलाकों के लिए मीठे पानी का स्रोत है. विशेष रूप से पाकिस्तान के हिस्से के पंजाब की अधिकांश जलापूर्ति इस ग्लेशियर के पिघलने से होती है. चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए यह कश्मीर में घुसने का रास्ता भी है. अत्याधिक ठंड पड़ने के कारण शीत ऋतु में दोनों देशों की सेनाएं इस एक खाली कर देती थी. 1984 में पाक फौज ने सियाचिन पर चुपके से कब्जा करने की योजना बनाई. महीना तय हुआ अप्रैल का. और तैयारी शुरू हो गई. बड़े पैमाने पर बर्फ में पहनने वाले जूते और विशेष गर्म कपड़े खरीदें गए. यही पाकिस्तान से चूक हो गई, क्योंकि जिस कंपनी से पाकिस्तान या सामग्री खरीद रहा था, भारतीय सेना भी वहीं से खरीदती थी. इस खरीद की खुफिया जानकारी मिलते ही हमारी सेना चौकन्नी हो गई, और यह अंदाज लगाते देर नहीं लगी, कि यह सारी तैयारी सियाचिन को लेकर हो रही है.
परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तानी सेना यह सोच कर सियाचिन ग्लेशियर पर पहुंची, कि वहाँ चुपचाप जाकर मोर्चा बांधकर भारत को चौका देंगे, लेकिन वो भारत की सेना को वहां पहले से मोर्चा बांधे देखकर हतप्रभ रह गए. एक खूनी लड़ाई हुई, जिसमें भारत ने पाकिस्तानियों को मार भगाया, और समूचे सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा कर लिया. बाद में पाकिस्तान ने अनेक बार सियाचिन पर हमले का प्रयास किया लेकिन सफल कभी नहीं हो सके. पाक फौज को ये मलाल आज तक है. इसी का बदला लेकर इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाने का ख्वाब सँजोए जनरल मुशर्रफ ने कारगिल घुसपैठ कि योजना बनाई थी.
 अपने जवानों की लाशें पहचानने से भी पाकिस्तान ने कर दिया था इंकार
कारगिल में मुशर्रफ की रणनीति यह थी कि जब भारत कारगिल की चोटियों पर चुपके से आकर जम गई पाकिस्तानी फौज को निकालने के लिए सैन्य कार्यवाई शुरू करेगा, और युद्ध का दायरा बढ़ने लगेगा, तो पाकिस्तान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की गीदड़ भभकी देकर युद्धविराम करवा लेगा और उसके सैनिक कारगिल की चोटियों पर जमे रहेंगे, जैसे लद्दाख और सियाचिन की सुरक्षा करना भारत की सेना के लिए असंभव सा हो जाएगा, क्योंकि कारगिल की चोटियों पर बैठे पाकिस्तानी घुसपैठिए लद्दाख और सियाचिन की सड़कों को काट कर रख देंगे. मुशर्रफ को चीन की यारी और अमेरिका की मजबूरी पर भी भरोसा था. चीन तो उसके हर पाप में साथी रहा ही है, और अमेरिका किसी भी कीमत पर युद्ध को भड़कने से रोकने के लिए भारत पर दबाव बनाएगा, ऐसा मुशर्रफ मान कर बैठे थे. पर दाल नहीं गली. हालत यह हुई प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने अमेरिका के बातचीत के किसी भी प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया, और "किसी भी कीमत पर" कारगिल को मुक्त करवाने का संकल्प क्लिंटन को बतला दिया. फौज की हालत पतली हो गई, और जब युद्ध विराम हुआ, मुशर्रफ और उनके जनरलों ने कारगिल में मारे गए अपने फौजियों की लाशों को पहचानने और लेने से इनकार कर दिया. भारतीय सेना ने उनका अंतिम संस्कार किया.