‘बहन जी’ के साथ साथ बढ़ती गई उनके भाई की दौलत
   दिनांक 23-जुलाई-2019

मायावती ने कांशीराम के साथ राजनीतिक संघर्ष शुरू किया. वर्ष 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई. एक लम्बे राजनीतिक सफ़र के बाद 2 जून 1995 की रात में मायावती, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद ‘दलित की बेटी’ को लोग ‘दौलत की बेटी’ के नाम से जानने लगे. मायावती के जन्म दिन की तारीख ‘15 जनवरी’ को भव्य बनाने के लिए बहुजन समाज पार्टी के सभी नेताओं को बकायदे जिम्मेदारी सौपीं जाती थी. मुख्यमंत्री रहते हुए जब भी उन्होंने अपना जन्म दिन मनाया. तब सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग तो बस देखते ही बनता था. यह तब बंद हुआ जब मायावती के जन्म दिन को भव्य बनाने के लिए बसपा के तत्कालीन विधायक शेखर तिवारी के गुर्गे, एक अभियंता से और अधिक चंदे की मांग कर रहे थे. चंदे का लक्ष्य पूरा ना हो पाने पर अभियन्ता को पीट – पीट कर मार डाला गया था. इस मामले में बदनामी हद से ज्यादा बढ़ जाने के बाद मायवाती ने बयान जारी करके कहा था कि “मेरे जन्म दिन पर किसी भी प्रकार का चन्दा किसी से नहीं लिया जाएगा.”
मायावती शनैः – शनैः राजनीति में ताकतवर होती गईं. उनका रसूख बढ़ता गया. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम बीमार रहने लगे और मायावती ही बसपा की सर्वमान्य नेता हो गईं. कांशीराम ने जिस बसपा की स्थापना की थी. उसमें परिवारवाद की कोई गुंजाइश नहीं थी. मायावती के भी शुरुआती कार्यकाल को देख कर ऐसा ही लगता था कि मायावती, बसपा में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देंगी. मायावती ने एक बार अपने जन्म दिन पर कहा भी था कि “ मेरा उत्तराधिकारी तय हो चुका है. वह मेरी ही बिरादरी का है.” इसके बाद अनुमान लगाया गया था कि बहुजन समाज पार्टी के राजाराम ही उनके अगले उत्तराधिकारी होंगे. कुछ समय बाद मायावती ने उन्हें राज्यसभा का सांसद भी बनवाया था. इसके बाद, सभी को पूरी तरह विश्वास हो गया था कि मायावती के उत्तराधिकारी राजाराम ही होंगे. मगर धीरे – धीरे मायावती ने अपने भतीजे आकाश को राजनीतिक मंचों पर ले जाना शुरू किया. कई जनसभाओं के मंच पर बैठाने के बाद मायावती ने आकाश को पार्टी में प्रवेश देने के साथ ही परिवारवाद की खुलेआम घोषणा कर दी.
दरअसल, मायावती ने शुरुआत में अपने भाई और भतीजे को परदे के पीछे रखा. भतीजा –आकाश, मायावती के नई दिल्ली स्थित आवास पर ही रह कर पढ़ाई कर रहा था. मायावती को पहली बार सत्ता की चाभी वर्ष 1995 में मिली और वह सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं. उनका पहला कार्यकाल बहुत छोटा था. मगर उसके बाद जब वह मुख्यमंत्री बनीं तब तक उनके भाई आनन्द कुमार, सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करना सीख चुके थे. बसपा की सरकार में आनन्द कुमार के नोएडा स्थित आवास पर समानांतर सत्ता का संचालन किया जाने लगा. जानकार बताते हैं कि आवास विकास एवं शहरी नियोजन और खनन जैसे मलाईदार विभागों की नीतियों में परिवर्तन आनंद कुमार की मर्जी से होता था. सत्ता के गलियारे में तगड़ी पकड़ रखने वाले आनन्द कुमार के यहां शासन के बड़े – बड़े अफसर हाजिरी लगाया करते थे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बेशकीमती भूखंडों और बिल्डरों से सम्बंधित मामले आनन्द कुमार की मर्जी से ही डील हुआ करते थे.
 बार – बार यह सवाल उठता है कि एक साधारण परिवार में जन्मे आनन्द कुमार और उनकी पत्नी विचित्र लता के नाम इतनी बेशकीमती चल – अचल सम्पत्ति आखिर कहाँ से आई ? इसका सीधा उत्तर यही है कि जब – जब बहन मायावती सत्ता में आईं तब आनन्द कुमार ने सरकारी मशीनरी को अपने पक्ष में करके बेहिसाब धनार्जन किया. अब उन सब जमा सम्पत्तियों पर जांच बैठ चुकी है. आनन्द कुमार के पास कोई जवाब नहीं है कि यह सब सम्पत्ति कहां से उनके पास आई ? हां, मायावती के पास अपना एक रटा – रटाया जवाब जरूर है जिसे वह हर बार बताती रहती हैं. इस बार भी उन्होंने ट्वीट कर के बता दिया कि उनके भाई और भाभी की सम्पत्ति जब्त करने की कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है. यही प्रतिक्रया मायावती वर्षों से देती चली आ रही हैं.
मायावती के कार्यकाल में हुए घोटालों की जांच का दायरा अब बढ़ता जा रहा है. इस जांच के दायरे में उनके भाई आनन्द कुमार भी आ चुके हैं. आयकर विभाग ने नोएडा स्थित 400 करोड़ रूपये की कीमत का भूखंड जब्त कर लिया. यह भूखंड सात एकड़ में फैला हुआ है और इस भूखंड का मालिकाना हक़ आनंद कुमार और उनकी पत्नी विचित्र लता के नाम पर था. 16 जुलाई को नई दिल्ली स्थित आयकर विभाग की बेनामी निषेध इकाई ने इस बेशकीमती भूखंड को जब्त करने का आदेश जारी किया था. जानकारी के अनुसार 400 करोड़ रूपये की कीमत के इस भूखंड को बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम के तहत जब्त किया गया. आयकर विभाग के आदेश के मुताबिक़ अब इस सम्पत्ति को आनन्द कुमार और विचित्र लता की बेनामी सम्पत्ति समझा जाएगा.
बता दें कि बेनामी सम्पत्ति का कानून निष्क्रिय पड़ा हुआ था. वर्ष 2016 में केंद्र सरकार ने इस कानून को सक्रियता प्रदान की. इस कानून के अनुसार बेनामी सम्पत्ति का दोषी पाए जाने पर सात वर्ष के कारावास की सजा भी हो सकती है. इसके अतिरिक्त बेनामी सम्पत्ति की जितनी कीमत बाजार में होगी उसका 25 प्रतिशत अर्थदंड के तौर पर जमा करना पड़ेगा.

 
आयकर की जांच में जहां आनन्द कुमार फंसते नजर आ रहे हैं. वहीं मायावती के मुख्यमंत्री रहने के दौरान हुए घोटालों पर सी..बी.आई. का शिकंजा कसता जा रहा है. मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं. उस समय 21 चीनी मिलों को कौड़ियों के भाव बेच दिया गया था. वर्ष 2019 के मई माह में सी.बी.आई. ने सात अभियुक्तों के खिलाफ नामजद एफ.आई.आर. दर्ज की. आरोप है कि चीनी मिलों को बेचने एवं विनिवेश करने में हर कदम पर घोटाला किया गया था. घोटाले की रकम 1,179 करोड़ रुपए आंकी गई है.
बता दें कि वर्ष 2010 -11 में उत्तर प्रदेश की 21 चीनी मिलों में हुए घोटाले का खुलासा पहली बार आडिट रिपोर्ट में पकड़ में आया था. आडिट रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि बुलंदशहर जनपद की चीनी मिल को खरीदने के लिए वेब इंडस्ट्रीज एवं सहारनपुर की चीनी मिल को खरीदने के लिए पी. बी. एस. फूड्स प्राइवेट लिमिटेड ने ही बोली लगाई थी. मतलब यह कि एक चीनी मिल को खरीदने के लिए एक ही खरीददार बुलाया गया था. यह सब कुछ पहले से तय किया गया था ताकि जब चीनी मिल की बोली लगे तो कोई अन्य वहां पर बोली लगाने के लिए मौजूद न हो. वर्ष 2012 में सीएजी की रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई थी जिसमें यह साफ़ कहा गया था कि सभी मिल वर्ष 2009 - 10 तक चालू हालत में थीं. जरवल रोड , सिसवा बाजार और महराजगंज आदि मिल तो लाभ में ही थीं फिर भी इन्हें बेच दिया गया. चीनी मीलों के प्लांट को कबाड़ बताकर उसकी बाजार की कीमत 114.96 करोड़ बताई गई बाद में इसे घटाकर 32.88 करोड़ कर दिया गया था.
इस मामले में कुछ समय पहले लखनऊ के गोमती नगर थाने में एफ.आई.आर दर्ज कराई गई थी. उसी समय उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (गृह ) ने इस मामले की जांच सी.बी.आई. से कराने का आग्रह, केंद सरकार से किया था. सी.बी.आई. ने सभी प्राथमिक जानकारी जुटाने के बाद एफ.आई.आर दर्ज कराई. सी.बी.आई. ने 7 चीनी मिलों के विनिवेश घोटाले का मामला पकड़ा है. अन्य 14 चीनी मिलों को बेचने की प्रक्रिया में भी गड़बड़ी पायी गयी है. इन 14 चीनी मिलों के प्रकरण में सी.बी.आई. ने प्राथमिक जांच दर्ज की है. प्रारम्भिक जांच में ठोस सबूत मिलने के बाद इन 14 चीनी मिलों के मामले में एफ.आई.आर दर्ज की जा सकती है. जो लोग सी.बी.आई. की एफ.आई.आर. में नामजद हुए हैं उनसे पूछताछ होने पर मायावती की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।