लिंचिंग के बहाने सेलिब्रेटी गैंग ने पीएम मोदी को लिखी रामद्रोही चिट्ठी
   दिनांक 24-जुलाई-2019
कुछ कथित सेकुलर बुद्धिजीवी और सेलिब्रेटी प्रधानमंत्री से लिंचिंग पर जवाब चाहते हैं, दुनिया में हर आत्मघाती हमले के समय हमलावर अल्लाह हू अकबर का नारा लगाता है, वह लाखों लोगों की मौत के बाद इनके कान तक नहीं पहुंचा. लेकिन इन्हें जय श्री राम में युद्ध घोष सुनाई जरूर देने लगा है.

मॉब लिंचिंग का फर्जी कथ्य गढ़ने वाले नहीं चाहते, इसका शोर थमे. ये अपनी पसंद से हिंसा की घटनाओं को देखते हैं, फिर उसे बदनाम करने का हथियार बनाते हैं. कांग्रेस राज में हर सुख, सम्मान और सुविधा से नवाजे गए ये कथित सेलिब्रिटी अपने नाम का जाना-पहचाना होने का बेजा इस्तेमाल उस दिन से कर रहे हैं, जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है. हाल ही में अलवर में एक दलित की मुस्लिमों द्वारा लिंचिंग की घटना से बेअसर 49 शहरी नक्सलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी है. ये प्रधानमंत्री से लिंचिंग पर जवाब चाहते हैं, दखल चाहते हैं. हिंदू प्रतीकों, चिह्नों, आस्था के विषयों के साथ अब ये भगवान श्री राम के नाम को बदनाम करने पर उतर आए हैं. दुनिया में हर आत्मघाती हमले के समय हमलावर अल्लाह हू अकबर का नारा लगाता है, वह लाखों लोगों की मौत के बाद इनके कान तक नहीं पहुंचा. लेकिन इन्हें जय श्री राम में युद्ध घोष सुनाई जरूर देने लगा है.
प्रधानमंत्री को लिखी इस चिट्ठी की शुरुआत ही झूठ से होती है. ये कहते हैं कि हम शांति प्रिय एवं गर्वित भारतीय हैं. यदि ये शांति प्रिय होते, तो देश में लिंचिंग के नाम पर इस तरह भ्रम न फैला रहे होते.
पहला बिंदू- हिंदू को बांटने की साजिश, फर्जी आंकड़े
ये चिट्ठी बहुत खतरनाक है. शब्दशः मुस्लिमों, दलितों एवं अन्य अल्पसंख्यकों की लिंचिंग को तुरंत जोड़ा जाए. कितने शरारतपूर्ण तरीके से इन्होंने मुस्लिमों के साथ दलितों को अल्पसंख्यकों में जोड़ लिया है. ये भारतीय संघ के खिलाफ एक खतरनाक लेकिन विफल सोच को पानी देने जैसा है. जय भीम जय मीम का फर्जी नैरेटिव तैयार करके हिंदू समाज को बांटने की कोशिश में अपनी विफलता के बावजूद ये इस काम में लगातार रहे हुए हैं. यह कहते हैं कि 2016 के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर अत्याचार की 840 घटनाएं हुई हैं. यह नहीं बताते कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर अत्याचार निवारण के लिए एक कानून है. हर कानून के तहत पिछले दस साल में आबादी के सापेक्ष आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है. बहरहाल दलितों के खिलाफ अपराध की चिंता क्यों है इन्हें, यह आगे की बात से समझिए. अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के मामले में ये 2016 से आंकड़े पेश करते हैं. लेकिन जब धार्मिक आधार पर होने वाले घृणा अपराधों का नंबर आता है, तो इनका आंकड़ा 2009 से 2018 तक पहुंच जाता है. इसमें यह बात खामोश से छिपा जाते हैं कि 2009 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार थी. इनका दावा है कि मजहबी आधार पर होने वाले घृणा अपराधों में 62 प्रतिशत मुस्लिम हैं. कुल 254 घटनाएं नौ साल में. यानी 130 करोड़ की आबादी में तकरीबन 29 घटनाएं प्रतिवर्ष. दस साल का आंकड़ा देते हुए बहुत चालाकी से इन्होंने इल्जाम चस्पा किया है कि 90 प्रतिशत घटनाएं मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद की हैं. ये नब्बे प्रतिशत के साथ इन घटनाओं की संख्या नहीं दे सके क्योंकि इन्हें पता ही नहीं है. इन ज्ञानियों को बता देना जरूरी है कि अकेले 2017 में अमेरिका में घृणा अपराधों की 7100 घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें आधी से अधिक अल्पसंख्यक आबादी के खिलाफ थीं. क्या इन्हें ये नहीं मान लेना चाहिए कि जहां से ये परिभाषाएं सीखते हैं, वहां घृणा अपराध ज्यादा है. तुलनात्मक रूप से अमेरिका, पाकिस्तान या चीन के मुकाबले अल्पसंख्यक भारत में ज्यादा सुरक्षित हैं, इसके आंकड़े सार्वजनिक हैं. पाकिस्तान में हिंदुओं की क्या हालत है, चीन में ऊइगर मुस्लमानों के साथ क्या हो रहा है और अमेरिका में तो घुसने भर पर मुस्लिम सेलेब्रिटी नेताओं के कपड़े उतरवा लिए जाते हैं. लेकिन इनका चश्मा सुविधा के हिसाब से देखता है. इन घृणा अपराधों का जिक्र करते हुए इन्होंने एक बार भी इस बात का जिक्र नहीं किया कि गौकशी, मंदिरों पर हमलों, हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों पर हमलों की कुल कितनी घटनाएं देश में हुईं.
लिंचिंग के राग में कानून भी भूले
ये कहते हैं कि लिंचिंग के मामलों में क्या कार्रवाई की गई. ये नहीं बताते कि कहां कार्रवाई नहीं की गई. तबरेज अंसारी की हिरासत में मौत के मामले से लेकर पहलू खान के मामले में मुकदमे चल रहे हैं. ये क्यों नहीं बताते कि लिंचिंग के कौन से मामले में कौन छोड़ दिया गया. कहते हैं घृणा में आपका अज्ञान बाहर आता है. कहते हैं कि लिंचिग गैर जमानती अपराध होना चाहिए. पर ये तो पहले से गैर जमानती अपराध है. भारतीय दंड संहिता में इसकी व्यवस्था पहले से है. फिर आगे सुनिए. कहते हैं कि अगर हत्या में किसी को आजीवन कारावास हो सकती है, तो लिंचिंग में क्यों नहीं. हत्या चाहे रुपये के लेन-देन को लेकर की गई हो या कोई शख्स गौकशी करते हुए भीड़ के गुस्से का शिकार बना हो, सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है. ये कहते हैं कि कोई भी नागरिक अपने देश में डरकर नहीं जीना चाहिए. बिल्कुल सही, लेकिन इनका क्या ये पैमाना उन कश्मीरी पंडितों पर भी लागू होता है, जो अपने ही देश में दरबदर होकर शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं. आप गारंटी से कह सकते हैं कि इन लोगों ने कभी कश्मीरी पंडितों के लिए किसी कांग्रेसी प्रधानमंत्री, किसी अलगाववादी नेता, जम्मू-कश्मीर के किसी मुख्यमंत्री को कोई चिट्ठी लिखी हो.

 
                                                       प्रधानमंत्री को लिखी गई इस चिट्ठी में फर्जी आंकड़े दिए गए हैं
इस पूरी चिट्ठी का उद्देश्य यहां सामने आता है. ये लोग कहते हैं कि जय श्री राम भड़काऊ युद्धघोष बन चुका है, जिससे आज कानून-व्यवस्था में दिक्कत हो रही है और इस नाम पर कई लिंचिंग हुई हैं. धर्म के नाम पर इस तरह की हिंसा चौंकाने वाली नहीं है. हम मध्य युग में नहीं रह रहे हैं. इन लोगों को हमारा जवाब है कि हम सच में मध्य युग में किसी मुगल बादशाह के गुलाम नहीं हैं. जय श्री राम से तब जिन्हें दिक्कत थी, उन्हें आज भी है और कल भी रहेगी. हमारे लिए जय श्री राम तब भी जीवनशैली का हिस्सा था, आज भी है. इन लोगों का उद्देश्य ये है कि किसी तरह वंदे मातरम् की तरह राम के नाम को भी विवादित कर दें. हिंदू जनमानस को न तो ये जानते हैं, न समझते हैं. जो रामद्रोही है, वह रावण है. उसे राम का नाम ऐसे ही खटकता है, जैसा इन्हें खटकता है. इन्हें दुनिया भर में अल्लाह हू अकबर के नारे के साथ होने वाली हिंसा से एतराज नहीं है. देश में जिहाद के नाम पर होने वाली मारकाट को लेकर इन्होंने कभी कोई चिट्ठी नहीं लिखी.
चोर की दाढ़ी में तिनका
कहते हैं न कि चोर की दाड़ी में तिनका. ये लोग लिखते हैं कि सरकार विरोधी भावनाओं को राष्ट्र विरोधी नहीं कहा जा सकता. लेकिन इन लोगों की पूरी चिट्ठी में भावनाएं हिंदू धर्म विरोधी हैं. ये पूरी चिट्ठी सांप्रदायिक है और देश के ताने-बाने में तनाव पैदा करने का प्रयास है.
इस चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वाले वही नाम हैं, जो हमेशा हिंदू विरोध और देश विरोध में होते हैं. जो मुस्लिम हत्या को सांप्रदायिक और हिंदू हत्या को सेक्यूलर एवं जायज मानते हैं. वैसे नाम बता देने जरूरी हैं, इसलिए पढ़िए क्योंकि नाम ही काफी हैं. अदिति बसु, अदूर गोपालकृष्णन, अमित चौधरी, अंजन दत्त, अनुपम रॉय, अनुराधा कपूर, अनुराग कश्यप, अपर्णा सेन, आशा अचय जोसफ, अशीस नंदी, बैसाखी घोष, बिनायक सेन, बोलन, गंगोपाध्याय, बोनानी कक्कर, चित्रा सिरकर, दर्शन शाह, देबल सेन, गौतम घोष, इफ्तिखार अहसान, जयश्री बर्मन, जोया मित्रा, कनी कुस्रुती.