गैंग ऑफ वा(मपंथ) से(कुलर) पुर
   दिनांक 26-जुलाई-2019

 
  
ट्विटर-फेसबुक के दौर में कोई पाती लिखे, यह बड़ी बात है।
बॉलीवुड और वामपंथ से जुड़े कुछ बड़े लोगों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। बडे़ लोगों की बड़ी-बड़ी बातें। इनकी कही-अनकही संवेदनशीलता और समझ का सार लें तो-
— जय श्रीराम का उद्घोष भड़काऊ नारा बनता जा रहा है!
— भारत में असहिष्णुता का प्रेत पैर पसार रहा है !
भारत की जनता मुसलमानों के प्रति इस कदर गुस्से से भरी बैठी है कि पीट-पीटकर उनकी जान ले रही है।
 
अगर ऐसा है तो स्थिति भयानक है ! चित्र भारत की भद्द पिटवाने वाला है !
लेकिन यह चित्र असली है! है भी या नहीं! .. या कुछ लोगों से अपनी 'फोटोशॉप' कलाकारी से घटनाओं को बैनर की तरह तानने-भुनाने लायक बना दिया !
सतह पर कलाकार हैं, बीच-बीच में राजनीति के रंग और मीडिया का मंच भी झलक जाता है। ..कुछ कलाकारी तो जरूर हुई है।
वरना ऐसा क्या था कि अपराध और इसके विरोध में आक्रोश का मुद्दा आने पर अपराध को 'दर्दमंदी' की चादर से ढका जाता और सिर्फ आक्रोश की खबर ली जाती।
ऐसा क्या था कि छपरा में गुस्साई भीड़ की पिटाई से दो हिन्दुओं और एक मुसलमान की जान जाने पर मातम का काफिला सिर्फ एक ओर कदम बढ़ाता? खबर को शीर्षक दिया जाता- क्या मुसलमान को जीने का हक नहीं है?
झारखंड में ऐसा क्या था कि चोरी के संदेह में 'सोनू' को पीट रही भीड़ को 'हिन्दू' और सोनू को 'तबरेज' बताना जरूरी था, मगर भिवाड़ी में भीड़ के मुस्लिम होने और पिटते-पिटते जान गंवाने वाले हरीश जाटव की हिन्दू अनुसूचित जाति की पहचान छिपाना जरूरी हो गया!
और अंत में- ऐसा क्या था कि जय श्रीराम का नारा न लगाने पर पीटने की करीब दर्जनभर घटनाएं झूठी निकलने के बाद भी इस नारे, नाम और हिन्दू पहचान को लांछित करने का खेल बेधड़क चलता रहा!
दरअसल, भारतीय संस्कृति, इतिहास और न्याय दर्शन में कहीं भीड़ द्वारा हत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया गया। इसलिए कहा जा सकता है कि असहिष्णुता और मॉब लिंचिंग जैसी बर्बरता हाल में केंद्र में राजग शासन की वापसी के बाद छेड़े गए राग से बहुत-बहुत ज्यादा पुरानी है।
मॉब लिंचिंग का इतिहास देखें तो पाएंगे कि प्राचीन या मध्यकालीन भारत से इसका कोई लेना-देना नहीं रहा। लिंचिंग शब्द तो भारतीय में संदर्भ ढूंढे नहीं मिलेगा। दरअसल, यह शब्द और इसकी अवधारणा की धुरी भारत से परे है। 1780 में अमेरिका के सर्वथा अराजक दौर में विलियम और चार्ल्स लिंच के नाम पर बने 'लिंचिग लॉ' से यह शब्द अमल में आया। दूसरी ओर देखें तो इस्लामी देशों में कानून हाथ में लेकर भीड़ के 'संगसार' सरीखे कृत्य या मौलवियों द्वारा बर्बर सजाएं देने की खबरें मध्यकाल से आज तक, आम हैं।
जिन्हें इतिहास से आपत्ति है उन्हें खासतौर पर ध्यान देना चाहिए कि :
— यीशु की बातों से सहमत न होने के कारण उन्हें सूली पर लटकाने वाले भारतीय नहीं थे !
— हजरत मोहम्मद के नवासों को कर्बला में किसी हिन्दू ने कत्ल नहीं किया था !
— कॉपरनिकस और गैलीलियों के विज्ञानसम्मत तर्कों को ठुकराने और उन्हें प्रताडि़त करने के लिए भारत से लोग नहीं गए थे !
..और ये बातें तबकी हैं जब संघ, जनसंघ या भाजपा का अंकुर भी नहीं फूटा था !
इसके बरक्स आधुनिक भारत में 'भीड़ द्वारा' भी कुछ हत्याएं जरूर हुईं और 'भीड़ की हत्या' भी हुई। लोगों द्वारा कानून हाथ में लेने की हर घटना को निंदनीय-दंडनीय मानते हुए भी इतना तो कहना होगा कि हाल-फिलहाल में हुई अपराध-आक्रोश की घटनाओं के उलट ये मामले ऐसे थे जहां निरपराध लोगों की जानें गईं और मुख्यधारा में विमर्श पैदा करने की नीयत से कहीं कोई वामपंथी-सेकुलर आवाज नहीं उठी। असहिष्णुता का हल्ला उठाने वाली ऊपर से गैर राजनीतिक दिखती इस लामबंदी में कई लोगों की उम्र इतनी है जिनसे सामाजिक घटनाक्रमों और उनकी प्रतिक्रयाओं से जुड़े कुछ पुराने सवाल पूछे जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए:
— 7 नवंबर, 1966, कार्तिक शुक्ल की अष्टमी यानी गोपाष्टमी पर दिल्ली में हुआ नरसंहार। गोरक्षा आंदोलन के लिए राजधानी में जुटे हजारों संत-श्रद्धालुओं पर सरकार के एक संकेत पर गोलियां बरसाई गईं, कितने   निर्दोष  भारतीयों की लाशें गिरीं, इसका कोई ठीक आंकड़ा, 'संवेदनशील-प्रगतिशील' प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती। उनका क्या अपराध था ! क्या धार्मिक पहचान थी ! क्या कभी चर्चा हुई ?
— याद कीजिए एक नवंबर, 1984 का वह मनहूस दिन। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली सहित पूरे देश में सिखों को चुन-चुनकर मारा गया, गले में जलते टायर बांधकर फूंका गया। क्या अपराध था हाहाकार में डूबे उन परिवारों का! उस भीषण नरसंहार के बीच 'बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है' जैसी बात कहने वाले राजीव गांधी 'सिविल सोसाइटी' के लिए क्यों और कैसे 'मिस्टर क्लीन' बने रहे !
— सितंबर, 1989 में भाजपा के नेता पंडित टीकालाल टपलू को कई लोगों के सामने मार देने वाले कौन थे? इसके डेढ़ महीने बाद सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या करने वाले कौन थे? इनमें से कुछ की पहचान हो सकती है। किन्तु असली पहचान उन ठंडे-पत्थर चेहरों की होनी चाहिए, जो पं. टीकालाल जैसे लोकतंत्र के सिपाही, न्यायमूर्ति नीलकंठ जैसे सच और समानता के निर्भीक पहरुए की हत्याओं के वक्त चेहरे पर चुप्पी की बुक्कल मारे बैठे थे ।
तब मॉब लिंचिंग पर चुप और नई राजनीतिक परिस्थिति में असहिष्णुता को मुद्दे की शक्ल देती लामबंदियों का खेल नया है और पकड़ा भी जा चुका है ।
'रोहित वेमुला' पर 'दलित' का ठप्पा लगाकर राजनीतिक मंशा से किए आयोजन सबने देखे। पहलू खान को आदतन अपराधी की बजाय डेयरी चलाने वाला बताती 'खबरों' की कलई भी जांच में खुली। अब जरूरत है कि किसी टकराव को नफरत की शक्ल देने वाले, लोगों को खास तरीके से सहलाते या गरमाते गिरोहों से सावधान रहा जाए।
उन्मादी भीड़ की बर्बरता को सही ठहराने का कोई प्रश्न ही नहीं है। भीड़ कानून हाथ में न ले उसका न्यायतंत्र पर भरोसा बहाल हो, इसकी भारी जरूरत है, किन्तु भारी हस्ताक्षरों से लदी, मीडिया के माध्यम से समाज विभाजन का मसाला तैयार करती और खास किस्म की चिट्ठियों का मजमून लिफाफा खोलने से पहले ही भांपने की जरूरत अवश्य है। क्योंकि शांति का सफेद परचम लहराते, चौंच में जैतून की पत्ती दबाए फाख्ता का भरम पैदा करते कुछ चेहरे ऐसे भी हैं, जो मानते हैं कि वर्ग क्रांति जरूरी है, और यह भी कि 'सत्ता बंदूक की नली से निकलती है'।