#चंद्रयान-2 प्रतिभा की चांदनी
   दिनांक 29-जुलाई-2019
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला भारत दुनिया का पहला देश होगा। देश की इस गौरवशाली और ऐतिहासिक उपलब्धि में इसरो की दो महिला वैज्ञानिकों की भूमिका सर्वोपरि है। अपने दूसरे अभियान में भारत स्वदेश निर्मित लैंडर और रोवर को चांद के उस हिस्से में उतारेगा, जो अब तक अनछुआ और अंजाना है। इस अभियान से अंतरिक्ष विज्ञान में भारत के कई उद्देश्य पूरे होंगे
मिशन चंद्रयान-2
978 करोड़ रुपये अभियान की कुल लागत
3,877 किलो वजन
चंद्रयान-1 मिशन (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा है
2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की योजना
“चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है। इसका मकसद, चंद्रमा की जानकारी जुटाना है। ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा।       --इसरो”
अंतरिक्ष की दुनिया में भारत ने एक बार फिर इतिहास रचा है। पहली बार दो महिलाओं ऋतु करिधल श्रीवास्तव और मुथैया वनिता की अगुआई में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 22 जुलाई, 2019 को अपने दूसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-2 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया है। चांद पर कदम रखने वाला यह हिन्दुस्थान का दूसरा सबसे बड़ा अभियान है। इसे देश के सबसे ताकतवर रॉकेट जीएसएलवी-एमके3 से प्रक्षेपित किया गया। प्रक्षेपण के करीब 16.23 मिनट बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी से करीब 182 किमी. की ऊंचाई पर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट से अलग होकर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाने लगा। इसी के साथ चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने के लिए इस यान की 48 दिन की यात्रा शुरू हो गई है।
चंद्रयान-2 वास्तव में चंद्रयान-1 अभियान का ही नया संस्करण है। इसमें ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं। चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा। 7 सितंबर को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर रोवर की 'सॉफ्ट लैंडिंग' कराई जाएगी। लैंडर के उतरने के बाद इसके अंदर से रोवर 'प्रज्ञान' बाहर निकलेगा।
चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाने के लिए इसरो ने अपने सबसे शक्तिशाली रॉकेट जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल- मार्क3 (जीएसएलवी-एमके 3) पर भरोसा किया। इस रॉकेट को स्थानीय मीडिया से 'बाहुबली' नाम दिया गया है। 640 टन वजनी इस रॉकेट पर 375 करोड़ रुपये की लागत आई है। चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो है, जो चंद्रयान-1 (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा है। इसमें लैंडर के अंदर मौजूद रोवर की रफ्तार 1 सेमी प्रति सेकंड है। इस अभियान की कुल लागत 978 करोड़ रुपये है। अलग-अलग चरणों में सफर पूरा करते हुए यान चांद के दक्षिणी ध्रुव की निर्धारित जगह पर उतरेगा। अब तक विश्व के केवल तीन देशों अमेरिका, रूस व चीन ने चांद पर अपना यान उतारा है। चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण 15 जुलाई को होना था, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण इसे टाल दिया गया। इससे पहले 2008 में भारत ने चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण किया था, जो एक ऑर्बिटर अभियान था। ऑर्बिटर ने 10 माह तक चांद का चक्कर लगाया था। चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण के बाद भारत एक बार फिर अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया है। इस अभियान के दो महत्वपूर्ण उद्देश्य चांद पर पानी की खोज और इनसानों के रहने की संभावनाओं का पता लगाना है।
स्वदेशी लैंडर-रोवर
नवंबर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि 'वह चंद्रयान-2 परियोजना में भारत के साथ काम करेगा। इसके लिए वह इसरो को लैंडर देगा।' इस अभियान के लिए 2008 में सरकार से अनुमति मिली थी। 2009 में चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया गया। इसका प्रक्षेपण जनवरी 2013 में ही किया जाना था, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी लैंडर नहीं दे पाई या जानबूझकर नहीं दिया, जिसे इसरो ने एक चुनौती की तरह लिया। बाद में भारत ने स्वदेशी तकनीक से अपना लैंडर-रोवर बनाया। चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं- आठ ऑर्बिटर में, तीन लैंडर विक्रम और दो पेलोड रोवर प्रज्ञान में हैं। लैंडर विक्रम का नाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के जनक डॉक्टर विक्रम ए. साराभाई के नाम पर रखा गया है। रोवर प्रज्ञान का नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है बुद्धिमता। कुल मिलाकर इस अभियान की सफलता से यह साफ हो गया है कि हमारे वैज्ञानिकों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है और इसके लिए वे किसी के मोहताज नहीं हैं।
अंतरिक्ष बाजार में संभावनाएं बढ़ीं
एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों का प्रक्षेपण करने से इनकार कर दिया था। लेकिन आज अमेरिका सहित दुनिया के तमाम देश देश भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करा रहे हैं। अब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष शोध और अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी, क्योंकि जैसे-जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा। इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना होगा, जो अभी नासा के मुकाबले काफी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए हमें पीएसएलवी के साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। हालांकि पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है, पर भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग अब बहुतायत में करना होगा।
वैसे भारत के पहले सफल चंद्र अभियान और मंगल अभियान के बाद से ही इसरो व्यावसायिक तौर पर काफी सफल रहा है। प्रक्षेपण की लागत बेहद कम होने के कारण दुनियाभर के कई देश अब इसरो से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करा रहे हैं। अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसरो ने इस क्षेत्र में अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। असल में, इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफलता हासिल करता रहा तो उनका न केवल उपग्रह प्रक्षेपण के कारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा, बल्कि मिसाइल की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगेगा।
2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की योजना
भारत ने लगभग 50 साल पहले अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू किया था। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद भारत ने अपनी तकनीक और रॉकेट विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया। इसरो ने तभी से आयात पर निर्भरता कम कर दी। चंद्रयान-2 के बाद इसरो की योजना 2022 तक 'गगनयान' से एक भारतीय को अंतरिक्ष में भेजने की है।
चांद पर क्या करेगा चंद्रयान-2
इसरो के अनुसार, चंद्रयान-2 का उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर ऐसी खोज करना है, जिससे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। अभियान के मुख्य उद्देश्यों में चंद्रमा पर पानी की मात्रा का अनुमान लगाना, मिट्टी व उसमें मौजूद खनिजों, रसायनों का अध्ययन, उसकी भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन तथा चंद्रमा के बाहरी वातावरण की ताप-भौतिकी गुणों का विश्लेषण करना शामिल है। अभियान में तरह-तरह के कैमरे, स्पेक्ट्रोमीटर, रडार, प्रोब और सिस्मोमीटर भेजे गए हैं।
ऊर्जा भंडार पर निगाह
चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर अभी तक किसी देश ने कदम नहीं रखा है। इसलिए चांद के इस हिस्से के बारे में अभी तक खास जानकारी सामने नहीं आ सकी है। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा के दक्षिणी क्षेत्र में बर्फ की मौजूदगी का पता लगाया था। माना जा रहा है कि भारत चंद्र अभियान के जरिए दूसरे देशों पर बढ़त हासिल कर लेगा। चंद्रयान-2 के जरिए भारत ऐसे अनमोल खजाने की खोज कर सकता है जिससे न केवल अगले करीब 500 साल तक ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है, बल्कि खरबों डॉलर की कमाई भी हो सकती है। चांद से मिलने वाली यह ऊर्जा न केवल सुरक्षित होगी, बल्कि तेल, कोयला और परमाणु कचरे से होने वाले प्रदूषण से मुक्त होगी। एक विशेषज्ञ का अनुमान है कि एक टन हीलियम-3 की कीमत करीब 5 अरब डॉलर हो सकती है। चंद्रमा से 2,50,000 टन हीलियम-3 लाया जा सकता है जिसकी कीमत कई खरब डॉलर हो सकती है। चीन ने इसी साल हीलियम-3 की खोज के लिए चांग ई-4 यान भेजा था। इसे देखते हुए अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय देश भी अब चंद्रमा पर कदम रखने जा रहे हैं। यही नहीं, एमेजॉन कंपनी के मालिक जेफ बेजोस चंद्रमा पर कॉलोनी बसाने की चाहत रखते हैं।
 
 
 
(लेखक मेवाड़ विवि. में निदेशक और टेक्निकल टुडे पत्रिका के संपादक हैं )