बंधी नदी की वजह से आती है बाढ़
   दिनांक 29-जुलाई-2019
 
-दिनेश मिश्रा                                     
 
देश के विभिन्न राज्यों में हर साल आने वाली बाढ़ ही समस्या है या समस्या कुछ और है। दरअसल बाढ़ का पानी अगर समस्या रहा होता तो लोग हर साल बाढ़ में डूबने वाले इलाके छोड़ कर कम पानी वाले इलाकों में चले गए होते |
वर्तमान स्थिति इस रिपोर्ट को लिखे जाते समय (23 जुलाई, 2019) -बिहार में 12 जिले बाढ़ में फंसे हुए हैं जिसने 105 प्रखंडों, 1238 ग्राम पंचायतों और करीब 80.86 लाख लोगों को घेर रखा है। इनकी मदद के लिए इस व़क्त 54 राहत शिविर चल रहे हैं और 29, 400 लोग इन शिविरों में अभी भी हैं। सरकार 812 सामूहिक रसोई संभाले हुए है, जहां जरूरतमंद लोगों को भोजन मिल रहा है। इस समय प्रांत में एन.डी.आर.एफ., एस.डी.आर.एफ. और सीमा सुरक्षा बल की 26 टुकडि़यों के 796 जवान 125 मोटर नौकाओं के साथ राहत और बचाव कार्यों में जुटे हुए हैं। राज्य में अब तक 106 लोग बाढ़ में मारे जा चुके हुए हैं। 1987 की बाढ़ में मौजूदा बिहार के 26 जिले, 359 प्रखंड, 23,852 गांव, और 2.82 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे जिनमें से 1373 लोग मारे गए थे। 47 लाख हेक्टेयर जमीन पर बाढ़ का पानी फैला था और 16.82 लाख घर गिर गए थे। पर साल दर साल ऐसा कैसे होता है, यहां हम उसके बारे में थोड़ी चर्चा करेंगे।
बाढ़ से बचाव का ऐतिहासिक प्रयास। राज्य में आजादी के बाद से ही बाढ़ को नियंत्रित करने के प्रयास चल रहे हैं मगर बाढ़ है कि मानती ही नहीं। साल दर साल बिहार इसके चलते खबरों में बना रहता है। इसका एक बड़ा कारण तो राज्य की भौगोलिक परिस्थिति है। हिमालय के क्षेत्र में होने वाली वर्षा के पानी की निकासी के रास्ते में बिहार का अधिकांश भाग पड़ता है और उसे यह त्रासदी भोगनी पड़ती है। इसे त्रासदी कहना कहां तक उचित है, यह एक विवाद का विषय है, क्योंकि हिमालय का निर्माण भूवैज्ञानिक दृष्टि से नया-नया हुआ है और यह भुरभुरी मिट्टी का पहाड़ भर है। इस पर जब बारिश की बूंदें पड़ती हैं तो वह इस मिट्टी को नदियों के माध्यम से नीचे तक पहुंचा देता है। भारतीय मुख्य भूमि के उत्तर दिशा में खिसकने और एशियाई मुख्य भूमि पर वर्षा के कारण आई मिट्टी की वजह से ही गंगा के मैदानी क्षेत्र का निर्माण हुआ।
कहते हैं कि मनुष्य ने अन्न की खोज आज से कोई नौ हजार साल पहले की थी और तब उसे अपना घुमंतू जीवन छोड़ कर एक निश्चित स्थान पर रहने को बाध्य होना पड़ा होगा। खेती और घुमंतू जीवन शैली एक साथ नहीं चल सकती, इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। फिर भी ऐसी मान्यता है कि मनुष्य की पहली स्थायी रिहाइश नदियों से कुछ फासले पर पहाड़ों या ऊंची जमीन पर हुई। बाद में खेती की सुविधा, नौ-परिवहन की सुविधा और मछलियों आदि के प्राचुर्य ने मनुष्य को नदियों के पास ही रहने के लिए प्रेरित किया होगा। बरसात के मौसम में नदियां उन्हें परेशान जरूर करती रही होगीं। मगर कुछ दिनों की बाढ़ की तकलीफ के बदले पूरे साल की खुशगवार जिन्दगी की उम्मीद पर लोगों ने नदियों के पास बस्तियां बसाई होंगी। कालांतर में उन्होंने अपने घरों को बाढ़ से बचाने के लिए नदियों के चारों तरफ बांध बना दिए होंगे। लेकिन धीरे-धीरे इन बांधों का आकार और ऊंचाई बढ़ाने की आपस में प्रतियोगिता चल पड़ी होगी ताकि अपना घर पड़ोसी से ज्यादा सुरक्षित रह सके। ये भी नदी के पानी के दबाव से टूटते रहे होंगे और तब बात घरों को घेरने की जगह गांव को उसी तरह के बांध से घेरने की चली होगी। गांव के घिर जाने के बाद आपसी प्रतियोगिता तो समाप्त हो गई होगी मगर पड़ोस के गांव पर इसका दुष्प्रभाव पड़ा होगा, क्योंकि गांव के घेर लेने के बाद पानी पड़ोस के गांव की तरफ गया होगा। अब प्रतियोगिता दूसरे गांव से शुरू हुई होगी और अंतत: यह मसला उस समय जो भी प्रशासनिक व्यवस्था रही हो, चाहे वह कबीले का सरदार रहा हो या राजा हो, उसके पास गया होगा। उसने अपने सलाहकारों, मंत्रियों या नवरत्नों को बुला कर इस समस्या का समाधान खोजने और उसके लिए खजाना खोल देने की बात कही होगी। उसने अपने किसी काबिल सिपहसालार को यह जिम्मा दिया होगा कि लोगों की तकलीफ को दूर किया जाए।
इस सिपहसालार की नजर घर और गांव से ऊपर उठ कर नदी पर पड़ी होगी कि नदी को ही बांध देने से सारी समस्या समाप्त हो जायेगी। राजा ने इस आदमी को सारे अधिकार दिए होंगे कि वह जिसे चाहे उसे काम का जिम्मा दे दे और लोगों की नदी की बाढ़ से रक्षा करे। इस तरह से समाज में एक इंजीनियर, ठेकेदार और एक ऐसे विभाग का जन्म हुआ होगा जो नदी पर नियंत्रण के प्रयास के लिए जिम्मेवार था। राजा खुद इसके लिए आर्थिक स्रोत था। अमेरिका में मिसिसिप्पी नदी के किनारे जब यूरोपियनों की बस्तियां बसनी शुरू हुईं तब ऐसा ही कुछ हुआ था, जिसकी कहानियां आज भी सुनने को मिलती हैं।
 
तटबंधों का प्रादुर्भाव
चीन में ह्वांग हो नदी पर ऐतिहासिक रूप से दुनिया में सबसे पुराने तटबंध मौजूद हैं जिनका निर्माण ईसा से सात शताब्दी पहले शुरू किया गया था। इन्हें पूरा होने में कई शताब्दियां लगी थीं। इन तटबंधों के निर्माण पर कोई बहस हुई होगी इसका कोई साक्ष्य नहीं मिलता। ऐसा शायद इसलिए भी हुआ हो क्योंकि जब ये तटबंध बने थे तब इसके निर्माणकर्ताओं को इतना ही मालूम रहा होगा कि अगर रिहाइशी इलाकों और नदी के बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाए तो नदी की बाढ़ का पानी रिहाइशी इलाके तक नहीं पहुंचेगा और बाढ़ की समस्या का हल निकल जाएगा। यह व्यवस्था मिट्टी के बांध बना कर ही होनी थी और इस सामग्री का उपयोग आज भी निर्माण सामग्री के तौर पर किया जाता है। वास्तव में पानी की अधिकता अकेले बाढ़ की समस्या का कारण नहीं होती और असली परेशानी बाढ़ के पानी के साथ आने वाली गाद (सिल्ट) से पैदा होती है। यह गाद नदी की पेंदी में बैठ जाती है और आने वाले वर्ष में जब नदी में फिर पानी आता है तो उसके रास्ते का रोड़ा बनती है। पानी तो किसी भी हालत में नहीं रूकता, नदियां इसी तरह से अपनी धारा परिवर्तित करती हैं, इसमें गाद का प्रमुख योगदान होता है और इसी वजह से ह्वांग हो और मिसिसिप्पी नदियां अपनी धारा बदलने के लिए बदनाम थीं। उत्तर बिहार की अधिकांश नदियों में गाद की अधिक मात्रा मौजूद होने के कारण वे भी अस्थिर रहती हैं और उनकी धाराएं बदलती रहती हैं। यहां की कोसी नदी इस तरह के परिवर्तन के लिए कुख्यात रही है।
चीन की ह्वांग हो नदी को नियंत्रित करने के लिए आज से ढाई हजार साल से अधिक पहले वहां जो भी या जैसे भी इंजीनियर रहे होंगें, उन्हें नदियों को नियंत्रित करने का सारा विज्ञान अपने अनुभव से ही सीखना पड़ा होगा। ह्वांग हो नदी अपने मुक्त प्रवाह के समय वर्षा काल में प्रवाह बढ़ने पर अपने किनारों के ऊपर से बह कर बाहर आती रही होगी और अपनी मर्जी का रास्ता अख्तियार करती रही होगी मगर तटबंधों के निर्माण के बाद उसने उन्हें तोड़ कर बाहर आने की कोशिश की होगी और जिधर मर्जी होगी उस रास्ते से बढ़ी होगी। उस समय के नदी विशेषज्ञों ने अपनी सूझ-बूझ से तय किया होगा कि अगर पानी के प्रवाहक्षेत्र (फैलाव) को घटा दिया जाए, जोकि नदी के दोनों किनारों पर तटबंधों के निर्माण से हो जाता था, तो पानी के कम क्षेत्र से गुजरने के कारण उसका वेग बढ़ जाएगा। वेग बढ़ने से पानी की कटाव क्षमता बढ़ेगी और नदी अपने किनारों को काटने के साथ अपनी पेंदी को भी खंगालने में सक्षम होगी। नदी का आकार बढ़ने से उसकी पानी बहा ले जाने की क्षमता बढ़ेगी और बाढ़ का प्रकोप घटेगा। पानी अपने वेग के कारण गाद को भी बहा कर ले जाएगा और उसे समुद्र में ले जाकर छोड़ देगा। गाद रहेगी ही नहीं तो धारा परिवर्तन भी नहीं होगा। मूलत: यह एक परिकल्पना मात्र थी, मगर ऐसा हुआ नहीं।
 
जो हुआ वह यह था कि गाद नदी की पेंदी में जमा होना शुरू हुई, नदी का तल ऊपर उठा और उसी के अनुरूप तटबंध को ऊंचा करना पड़ा। तटबंध के बाहर का पानी, जो स्वाभाविक तौर पर नदी में आ जाता था, वह जल-जमाव के रूप में बाहर ही रह गया। फिर पानी के दबाव के कारण तटबंध का टूटना शुरू हुआ। बीजिंग विश्वविद्यालय में ह्वांग हो नदी के तटबंधों के टूटने का इतिहास उपलब्ध है जिसके अनुसार 1047 से लेकर 1954 के बीच ह्वांग हो के तटबंध 1500 से अधिक बार टूटे, 26 बार नदी की धारा बदली और नौ बार नदी की धारा को वापस तटबंधों के बीच वापस नहीं लाया जा सका। 1933 की प्रलयंकारी बाढ़ में ये तटबंध 50 जगहों पर टूटे और 18,000 लोगों की मृत्यु का कारण बने। 1938 में जब जापानी सेना ने चीन पर आक्रमण किया तब तत्कालीन शासक च्यांग काई शेक ने ह्वांग हो नदी के तटबंध पर बम गिरा दिया जिससे पूरी जापानी सेना बह गयी पर चीन की खुद की 8,90,000 आबादी को जान से हाथ धोने पड़े। 1855 से लेकर 1954 के बीच यह तटबंध दो सौ बार टूटे थे। चीन के उप-प्रधानमंत्री तेंग-त्से व्हे (1955) ने अपने एक भाषण में कहा था- 'यह दिखाता है कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान कहां जाकर सीमित हो गया था जो यह समझते थे कि तटबंधों का निर्माण कर नदी का प्रवाह क्षेत्र घटा दो और बालू को समुद्र में उड़ेल दो।'
अमेरिका की मिसिसिप्पी की कहानी भी अलग नहीं थी। लगभग यही स्थिति अमेरिका में मिसिसिप्पी नदी के तटबंधों की भी थी जहां उनका निर्माण सत्रहवीं शताब्दी से शुरू किया गया था। इस नदी के तटबंधों को 1833 और 1927 के बीच 16 फुट ऊंचा करना पड़ा। इसके बावजूद इन तटबंधों में दरारें पड़ना और नदी के पानी का तटबंधों के ऊपर से बहना जारी था। 1912 की बाढ़ में इस नदी के तटबंधों में कम से कम 300 स्थानों पर दरारें पड़ीं और नदी के कुल 1640 कि. मी. लम्बे तटबंधों में से 96 कि. मी. लम्बे तटबंध साफ हो गए थे। 1927 में नदी ने अपने सारे बन्धनों को तोड़ दिया जिसकी वजह से साढ़े सात लाख लोग बेघर हो गए थे और लगभग छह लाख लोगों को रेडक्रॉस की राहत पर लम्बा समय गुजारना पड़ा था।
अंग्रेजी हुकूमत की तटबंधों के विरुद्ध नीति
इतना कहने का मकसद सिर्फ यही था कि इसी ह्वांग हो और मिसिसिप्पी नदी के तटबंधों का वास्ता देकर भारत की सबसे जीवन्त नदी कोसी को तटबंधों के माध्यम से नियंत्रित करने की योजना 1950 के दशक में देश के आजाद होने के बाद बनी। अंग्रेजों के जमाने में चर्चा तो बहुत हुई मगर काम कुछ नहीं हुआ। अंग्रेजों ने अपने शासन काल में पहले तो तटबंध बना कर नदियों को नियंत्रित करने का काम किया मगर उन्हें बाद में लगा कि ऐसा करने से बाढ़ का पानी तो तटबंध के बाहर नहीं जाएगा, पर उसके साथ फैलाने वाली गाद भी तटबंध के बीच ही रह जायेगी जो नदी की पेंदी को धीरे-धीरे ऊपर उठाएगी। सुरक्षा की दृष्टि से उसी अनुपात में तटबंध को भी ऊंचा करना पड़ेगा और उसी के साथ उसकी मरम्मत और रख-रखाव का खर्च बढ़ेगा। तटबंध के बाहर पानी जाने से रुकने के कारण जमीन की उर्वरा शक्ति घटेगी और भूमिगत जल पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा तटबंध के बाहर का जो पानी स्वाभाविक रूप से नदी में आता था, वह भी बाहर रह जाएगा और जल-जमाव की समस्या को जन्म देगा। तटबंध बनने के बाद बाहर के पानी को नदी तक पहुंचाने के लिए स्लूइस गेट लगाने पड़ेंगे जिन्हें बरसात के समय खुला नहीं रखा जा सकता क्योंकि तब नदी का ही पानी निकल कर पहले की ही तरह सुरक्षित क्षेत्र को डुबो सकता था। तटबंध कभी टूटेंगे नहीं, इसकी गारंटी कोई भी नहीं दे सकता था। दस साल ठीक-ठाक काम करने के बाद 11वें साल अगर तटबंध टूट जाता है तो दस वर्षों में जितना फायदा नहीं हुआ, उससे कहीं अधिक खर्च तटबंध को पुनर्स्थापित करने तथा राहत और बचाव कार्यों में खर्च कर देना पड़ेगा। उनको लगा यह फायदे का सौदा नहीं है। दामोदर नदी पर बनाए गए तटबंधों को इन्हीं कारणों से उन्हें जमींदोज कर देना पड़ा था।
आजाद भारत में बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों की वापसी की एक योजना 1950 के दशक में बनी थी और उस पर काम 1955 के जनवरी महीने में शुरू किया गया था। इस फैसले पर पहुंचने के पहले बिहार में बाढ़ नियंत्रण का अधिकांश काम आजादी के बाद शुरू हुआ और इसके लिए नदियों के किनारे तटबंध बनाए गए ताकि नदी का पानी रिहाइशी इलाकों में न घुसने पाए। निशाने पर थी बिहार और देश की सबसे जीवन्त नदी जो अपनी धारा बदलने के लिए कुख्यात थी। कोसी पर तटबंध बने या न बने और यह काम तकनीकी दृष्टि से उचित है, या नहीं यह समझने के लिए हमारे देश के दो बड़े इंजीनियरों को चीन भेजा गया जहां वह अक्सर धारा बदलने के लिए बदनाम ह्वांग हो नदी के तटबंधों का अध्ययन करके कोसी नदी पर प्रस्तावित तटबंधों के बारे में अपनी राय दे सकें। धारा परिवर्तन के नाम पर कोसी का भी यही हाल था और इसीलिए हमारे विशेषज्ञ 1954 में मई से सितम्बर के बीच चीन भेजे गए थे। इन विशेषज्ञों की सलाह पर कि चीन में ह्वांग हो नदी के तटबंध दुरुस्त तरीके से काम कर रहे हैं। यह काम 1955 में शुरू कर के 1963 में पूरा कर लिया गया। इतना काम करने के लिए उपर्युक्त सारे ज्ञात दोषों के बावजूद जो तकनीकी, राजनीतिक और सामाजिक तिकड़म देश के कर्णधारों को करनी पड़ी, उसके विस्तार में गए बिना सिर्फ इतना ही कहना काफी होगा कि कोसी को नियंत्रित करने या उसे स्वाभाविक रूप से बहने देने के लिए लगभग सौ साल तक बहस चलती रही थी और अंग्रेज शासक उसे तटबंधों में कैद करने के हक में नहीं थे। उनके जाने के बाद सत्ता बदली और भारतीय इंजीनियरों की चिंतन प्रक्रिया में भी बदलाव आया। शुरू-शुरू में तो उन्होंने इसे तटबंधों के बीच घेर लेने में किसी भी आशंका से इनकार किया, लेकिन वक्त के साथ उन्होंने राजनीतिकों की मर्जी के आगे हथियार डाल दिए और केन्द्रीय जल आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष कंवर सैन उस समय (1956) बस इतना भर कह सके थे कि अगर हम कोसी को नियंत्रित करने के लिए किसी शत-प्रशिशत सुरक्षित समाधान की तलाश में हैं तो यह निश्चित है कि लम्बे समय तक बाढ़ नियंत्रण की दिशा में कोई काम नहीं हो पायेगा और उनकी बात मानी गई। एक बार कोसी पर यह फैसला ले लिया गया तब बाकी नदियों की कोई औकात ही नहीं थी और उन्हें भी बिना किसी खास बहस या तैयारी के बांध दिया गया। सरकार के इस प्रयास का परिणाम वही हुआ जैसा ह्वांग हो या मिसिसिप्पी के मामले में हुआ था यद्यपि ये सभी नदियां उसके मुकाबले उतनी भयंकर नहीं हैं। फिर भी नुकसान तो हुआ ही।
राज्य में नदियों के किनारे अनियंत्रित तटबंधों, सिंचाई परियोजनाओं की नहरों, सड़कों और रेल लाइन के फैलाव ने यहां की जल-निकासी प्रणाली को बहुत क्षति पहुंचाई है विकास के यह काम रोके नहीं जा सकते और जल-निकासी की समस्या पर विचार या क्रियान्वयन नहीं होता जिसकी वजह से राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र दिनोंदिन बढ़ता है। सरकार के अनुसार राज्य में 1952 में बाढ़ प्रवण क्षेत्र मात्र 25 लाख हेक्टेयर था जो अब बढ़ते-बढ़ते 68.8 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इस दौरान राज्य में नदियों के किनारे बने तटबंधों की लम्बाई 160 कि. मी. से बढ़कर 3800 कि. मी. हो गयी है। बाढ़ नियंत्रण के लिए यही काम मुख्य तौर पर किया गया है। इससे एक निष्कर्ष तो निश्चित रूप से निकलता है कि राज्य में बाढ़ नियंत्रण पर किया गया खर्च फायदे के स्थान पर नुकसान पहुंचा रहा है। एक अनुमान के अनुसार उत्तर बिहार का लगभग 73 प्रतिशत इलाका बाढ़ प्रवण है जबकि अभी भी लगभग 80 प्रतिशत जनता की जीविका कृषि पर निर्भर करती है। जाहिर है, यहां के लोग इस तरह की बाढ़ ग्रस्त जमीन पर जीविका के लिए निर्भर नहीं रह सकते और उन्हें रोजगार के लिए अन्यत्र भटकना पड़ता है और दूसरी जगहों में नाना प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
जल निकासी को सरकार भूल ही गई
जल-निकासी की समुचित व्यवस्था न हो पाने के कारण बाढ़ का पानी अब गांवों के अलावा शहरों की बढ़ रहा है और गांवों की जिस बाढ़ को ढाई दिन की बाढ़ कहा जाता था, वह अब ढाई महीने की बाढ़ बन गई है। पानी आता तो है पर उसके जाने के रास्ते या तो बंद हो गए हैं या बहुत ही संकरे हो गए। 2007 में बिहार में 34 स्थानों पर नदियों के किनारे बने तटबंध टूटे, 54 जगहों पर राष्ट्रीय और प्रांतीय मार्गों की सड़कें टूटीं और 829 स्थानों पर ग्रामीण रास्ते ध्वस्त हुए थे। इन दरारों के कारण बाढ़ का पानी चारों तरफ फैल गया और बाढ़ के पानी का स्तर बहुत घट गया और आश्चर्य रूप से कोई भी नदी अपने सर्वाधिक स्तर के पास नहीं पहुंची। सामान्य बुद्धि कहती है कि इन स्थानों से पानी निकलने का रास्ता खोज रहा था और जब वह नहीं मिला तो उसने संरचना को तोड़ कर रास्ता बना लिया। जवाब में सरकार ने किया क्या? उसने इन सारी दरारों को मजबूती से बंद कर दिया ताकि वहां से पानी फिर निकल कर न जा सके। बाढ़ का स्तर घटने के बावजूद उस वर्ष बाढ़ का पानी बहुत से जिलों में नवम्बर तक टिका रहा। इसका यह भी मतलब था कि पानी की निकासी के प्राय: सारे रास्ते बंद थे और पानी या तो रिस कर जमीन के नीचे जा सकता था या भाप बन कर उड़ सकता था। प्रशासन ने इस प्रक्रिया का संज्ञान ही नहीं लिया। गाद की समस्या का क्या हुआ? अगर किसी भी इंजीनियर से बात करें तो वह यही कहता हुआ मिलेगा कि पानी कोई समस्या नहीं है, जो भी समस्या है वह गाद की है। यह अगर सच है तो फिर गाद को कम करने या समाप्त करने के प्रयास क्या किये जाते हैं, इसके बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। 1950 के दशक में जब कोसी योजना पर काम शुरू हुआ था तब नेपाल में 'नेपाल को धन हरीओ वन' के नारे के साथ एक जंगल लगाने का काम शुरू हुआ था मगर यह कार्यक्रम अधिकारियों और कर्मचारियों की अरुचि के कारण बंद कर देना पड़ा था। वास्तव में अगर देखा जाय तो नदी जब मुक्त थी, तब वह यह काम अपने आप किया करती थी क्योंकि भूमि निर्माण उसका एक स्वाभाविक गुण है जिसे तटबंध बना कर रोका गया। उसे अपने जल-ग्रहण क्षेत्र से पानी की निकासी करने से भी रोका गया। आज हम ऐसे स्थान पर खड़े हैं जहां रास्ता नहीं दिखाई पड़ता है। अब गाद है तो कहीं न कहीं जाएगी। तटबंध बना कर इतना तो मालूम पड़ गया कि वह कहां जायेगी। बाढ़, गाद और जल-निकासी का मसला केवल बिहार का ही नहीं है। यह राष्ट्रीय स्तर की समस्या है क्योंकि वहां भी देश का बाढ़ प्रवण क्षेत्र, जो 1952 में मात्र दो करोड़ पचास लाख हेक्टेयर था वह अब बढ़ कर चार करोड़ अट्ठानबे लाख हेक्टेयर, प्राय: दोगुना हो चुका है। इस पर विचार करके प्रभावी कदम उठाये जाने चाहिए जिसकी फिलहाल कोई सूरत नजर नहीं आती। पर यह काम होना चाहिए। जल-निकासी को मुख्य आयाम बनाना पड़ेगा। पानी का ठहराव अब केवल गांवों की समस्या नहीं रही, शहर भी एक के बाद एक इसकी चपेट में आ रहे हैं।
 
रास्ते अभी भी खुले हैं। सरकार के पास इंजीनियरों की एक बड़ी जमात मौजूद है। उनको बुला कर यह कहना चाहिए कि देखिए, नेपाल में बांध कब बनेगा, बनेगा भी या नहीं इसका कोई भरोसा नहीं है, तटबंधों की वजह से राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र पहले के मुकाबले तीन गुना हो चुका है, आप लोग मिल बैठ कर इस समस्या का समाधान खोजिए। तब हो सकता है कि वे लोग जल निकासी की बात करें, गाद को फैलाने की बात करें, बाढ़ क्षेत्र में उपयुक्त गृह निर्माण का सुझाव दें, बाढ़ को पूरी तरह से समाप्त न करने की बात करके बाढ़ की अनिवार्यता की बात करें। याद रखें, इस इलाके की पूरी समृद्धि प्रचुर जल और उर्वर धरती के कारण है। पानी अगर समस्या रहा होता तो लोग इलाका छोड़ कर कम पानी वाले इलाके में चले गए होते। यहां का जनसंख्या घनत्व इस बात का साक्षी है कि लोगों को पानी या बाढ़ से कोई शिकायत नहीं है। बस उसके परिमाण और उसके कुप्रबंधन से है।
विशेषज्ञ ऐसे तरीके सुझाएं जिसमें कम से कम जान-माल को नुकसान की बात कही जाए. इंजीनियर लोग राज नेताओं को दृढ़तापूर्वक अपनी बात कहें कि किसी योजना के क्या क्या परिणाम और दुष्परिणाम होने वाले हैं। तकनीकी फैसले इंजीनियरों को ही करने दें तो बेहतर होगा।
 
 
(लेखक बाढ़ मुक्ति अभियान, बिहार के संयोजक हैं)