''अगर जॉर्ज वाशिंगटन आतंकवादी नहीं थे, तो बलूच कैसे''
   दिनांक 29-जुलाई-2019
क्वेटा से हुनक बलोच
दशकों से बलूचिस्तान की आजादी के लिए गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहे डॉ. अल्लाह निजार बलोच ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के नाम एक खुली चिट्ठी लिखकर कहा कि बलोच आतंकवादी नहीं हैं। अगर 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ताकत से अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेकर निकले जॉर्ज वाशिंगटन को दुनिया ने आतंकवादी मान लिया होता तो अमेरिका आजाद नहीं हुआ होता

 
अपने 'गुमशुदा' बेटे की तस्वीर को निहारती एक आहत बलूच मां। डॉ. अल्लाह निजार बलोच (ऊपर प्रकोष्ठ में) 
तालीम के लिहाज से वह डॉक्टर हैं। बलूचिस्तान में, जहां तमाम मुश्किलों के बीच ऊंची तालीम हासिल करना कोई आसान काम नहीं, वहां उन्होंने डॉक्टरी तक की पढ़ाई की। बलूचिस्तान स्टूडेंट्स आर्गनाइजेशन के प्रमुख रहे। फिर पाकिस्तान के गैर-वाजिब कब्जे से बलूचिस्तान को आजाद कराने के लिए जद्दोजहद कर रहे बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट के सिरमौर बने। नाम है अल्लाह निजार बलोच। वही डॉ. अल्लाह निजर बलोच जिन्होंने चंद दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक खुला खत लिखकर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को दहशतगर्द करार दिए जाने पर सख्त ऐतराज जताया है। ट्रंप को लिखा यह खत दुनिया की उन तमाम ताकतों के लिए भी एक पैगाम है जो जम्हूरियत, इनसानी हकों और इन्साफ की पैरोकार हैं।
डॉ. बलोच ने अपने खत में बड़ा ही तार्किक सवाल उठाया है, 'सोचकर देखिए, अमेरिका आज कैसा होता अगर 1776 में फ्रांस और दूसरी यूरोपीय ताकतों ने जॉर्ज वाशिंगटन और उनके जैसों को दहशतगर्द करार दिया होता और स्थानीय लोगों को दबाने के लिए ब्रिटेन का हाथ थाम लिया होता? तब अमेरिका, ब्रिटेन की कॉलोनी रहता और जम्हूरियत और कामयाबी की मिसाल नहीं बनता। अगर जॉर्ज वाशिंगटन दहशतगर्द नहीं तो बलूच भी नहीं।'
कभी इंग्लैंड की फौज में काम कर चुके छह फुट लंबे जॉर्ज वाशिंगटन रिटायर होकर खेती में जुट गए थे। तब अंग्रेज अमेरिका पर एक के बाद एक टैक्स लगाते जा रहे थे। शुरुआती जीवन में शर्मीले वाशिंगटन को महसूस हुआ कि अगर यही चलता रहा तो स्थानीय लोगों का जीना मुहाल हो जाएगा। उन्होंने कब्जागीर अंग्रेजों को लड़कर भगाने का फैसला किया। इस काम में खास तौर पर फ्रांस और स्पेन ने उनकी मदद की और वाशिंगटन अपने मकसद में कामयाब हुए। आखिरकार 4 जुलाई, 1776 को अमेरिका, ब्रिटेन से आजाद होने वाला पहला मुल्क बना।
अमेरिकी जद्दोजहद की दो बातों पर गौर कीजिए। एक, बुनियादी तौर पर अमेरिका के लोगों की जद्दोजहद बेहिसाब टैक्स के खिलाफ थी। और दूसरी, अमेरिका के लोगों ने उनके घर में जबरन घुस आए लोगों को ताकत के बूते बाहर निकालने का फैसला किया। तब जॉर्ज वाशिंगटन की रहनुमाई में भूखी-नंगी फौज ने बिना कोई वेतन लिए ब्रिटेन की फौज का मुकाबला किया था। मतलब, दुनिया पाई-पाई के लिए, इंच-इंच जमीन के लिए लड़ रही है, फिर बलोच क्या गलत कर रहे हैं? डॉ. बलोच लिखते हैं, 'आखिर दुनिया हमसे चाहती क्या है? आप खुद तो एक-एक सेंट के लिए जंग लड़ते हैं, लेकिन बलूचों से उम्मीद करते हैं कि अपने सोने, तांबे, गैस की दोनों हाथों से हो रही लूट पर खामोश रहें। हमारे बंदरगाह का इस्तेमाल किसी और की हुकूमत को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। फिर भी हम दहशतगर्द हैं?' गौरतलब है कि अमेरिका ने चंद दिनों पहले ही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) को ऐसी 'हथियारबंद अलगाववादी तंजीम' बताया जो फौजियों और आम लोगों को निशाना बनाती है। पाकिस्तान और ब्रिटेन ने पहले से बीएलए को दहशतगर्द करार दे रखा है। लेकिन इसमें कोई अजूबा नहीं है। सब जानते हैं, पाकिस्तान ऐसा मुल्क है जो दुनियाभर में दहशतगर्दी फैला रहा है, उसकी खुफिया एजेंसी का तमाम दहशतगर्द तंजीमों से वास्ता है, ऐसे में उसके सर्टिफिकेट का कोई मतलब नहीं। आधी दुनिया जिस मुल्क के जुल्म से हाय-तौबा कर चुकी हो, उस ब्रिटेन का ऐलान भी बेमानी है। लेकिन अमेरिका की बात और है। वह पूरी दुनिया से दहशतगर्दी को खत्म करने की बात करता है, ऐसे में अगर वह बलूचिस्तान में चल रही जद्दोजहद को दहशतगर्दी के नजरिये से देखता है, तो यह सोचने की बात है। जिन हालात में अमेरिका के लोगों ने हथियार उठाए, उससे तो कहीं खराब हालत बलूचिस्तान के हैं। हमें हमारे कुदरती प्राकृतिक संसाधनों से महरूम किया ही जा रहा है, लोगों के साथ भी निहायत दरिंदगी से पेश आ रहे हैं। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी अमेरिका में नहीं किया। अल्लाह निजार कहते हैं, 'हमने तो कभी अमेरिका को नुकसान नहीं पहुंचाया, फिर भी आपकी हुकूमत हम पर पाबंदी लगाती है। हम बलूच पिछले सात दशकों से पाकिस्तान में सरकारी सरपरस्ती में हो रही दहशतगर्दी का मुकाबला कर रहे हैं। अमेरिका की ही फौजी मदद से पाकिस्तानी फौज ने हजारों बलूचों को मार डाला। मारे गए लोगों के शरीर के हिस्सों को बेच डाला, हमारी बच्चियों के साथ बलात्कर किया। पाकिस्तान जिन लड़ाकू जहाजों और हथियारों का इस्तेमाल बलूचों के खिलाफ कर रहा है, वे आपसे पहले दफ्तर संभालने वालों ने ही तो मुहैया कराए। लेकिन आपने तो उन्हें भी पीछे छोड़ दिया। आपकी हुकूमत ने हमें दहशतगर्द करार दिया क्योंकि हम पाकिस्तान और चीन को इस बात की इजाजत देने को तैयार नहीं कि वे हमारे संसाधनों को लूट लें। अगर आप एक-एक बलूच को दहशतगर्द ठहरा देंगे, तो भी हम अपने चाकुओं और कलाशनिकोव के बूते लड़ना बरकरार रखेंगे।...इस इलाके में हम अकेले हैं जो मजहबी दहशतगर्दी का मुकाबला कर रहे हैं।'
आज पूरी दुनिया जिस इस्लामी दहशतगर्दी का खामियाजा भुगत रही है, उससे मुकाबले के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसका अंदाजा ट्रंप को जरूर होगा। उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर कामकाज संभालते ही इस्लामी दहशतगर्दी पर सख्ती का ऐलान भी किया था। ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान की जमीन पर मिलने के क्या मायने हैं, यह अमेरिका से बेहतर कौन समझ सकता है? बलूचों की छोडि़ए, दुनिया को अगर महफूज रखना है तो पाकिस्तान की बांहें मरोड़नी होगी, और दुनिया में इस तरह की राय बननी शुरू हो गई है। निजार बलोच ने ट्रंप को लिखा है, 'दुनिया के नेताओं को छोटे फायदे के लिए सेकुलर उसूलों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। एक बार आप बलूचों जैसे स्वाभाविक दोस्तों को हाशिए पर डालने लगेंगे, तो आपके दुश्मन आपको हाशिए पर डालने में देर नहीं करेंगे। आप पाकिस्तान से दोस्ती करें, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अपने मुल्क के बुनियादी उसूलों और संविधान की बुनियादी बातों को याद रखें।' सोचने की बात है कि किसी इलाके में इतनी बड़ी तादाद में लोग मौत को गले लगाने के लिए क्यों तैयार हैं? बात उस इलाके की है जिसने पाकिस्तानी फौज के हाथों हर जुल्म को सहा है। अपनों को लाशों में बदलते और हमेशा-हमेशा के लिए गायब होते देखा है। इसलिए आज बीएलए में हजारों की तादाद में ऐसे लोग हैं जो बलूचिस्तान के कल को महफूज करने के लिए अपना आज कुर्बान कर रहे हैं। अल्लाह निजार बलोच ने चिट्ठी में लिखा है, 'तारीख में कम से कम दो बार, 1941 (पर्ल हार्बर पर जापानी हमला) और फिर 2001 (डब्ल्यूटीसी हमला) में अमेरिका के लोगों ने दुनिया को बताया कि वे इस तरह मरना नहीं चाहते। जनाब ट्रंप, आपको पता है कि मुझे बलूचों की कौन सी बात पसंद है? वे भी मारा जाना नहीं चाहते।' अमेरिका ने इन दोनों मौकों पर क्या किया, दुनिया जानती है। यह वैसे मुल्क का जवाब था जिसे अपने अवाम के कल को महफूज रखने के लिए किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं था। बलूच भला, इससे अलग क्या कर रहे हैं?
जनाब ट्रंप, आपके अहसास में कहीं मार्टिन लूथर किंग नाम का कोई इनसान जिंदा है क्या? वह आपके ही मुल्क का ऐसा शख्स था जिसने इनसानी हकों की बात की। हर इनसान, चाहे वह गोरा हो या काला, के साथ एक जैसे सलूक की पैरोकारी की। अगर उनका अक्स उभर रहा हो तो उनकी वह बात भी याद कर लें-कहीं भी नाइंसाफी का होना हर जगह इंसाफ के लिए खतरा है।'