पुरानी दिल्ली के हिंदुओं की नई पीड़ा
   दिनांक 29-जुलाई-2019
 
पुरानी दिल्ली के अनेक इलाकों में हिंदुओं की संख्या कम हो चुकी है। पहले हिंदू व्यापारी वहीं रहकर अपना कारोबार करते थे। अब केवल कारोबार है। ज्यादातर हिंदू व्यापारियों ने अपने निवास बदल लिए हैं। इसके कई कारण हैं, उनमें एक कारण मजहबी उन्माद भी है
 
पिछले दिनों लालकुंआ में मंदिर पर हुए हमले के बाद शांति बहाल करने के लिए तैनात सुरक्षाकर्मी
 
उस दिन उमस भरी दोपहर में लगभग दो बज रहे थे। हौजकाजी (पुरानी दिल्ली) से लालकुआं की ओर जा रही सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं थी। भीड़ इतनी कि पैदल चलने वालों के कंधे एक-दूसरे से टकरा रहे थे। हर कोई पसीने से लथपथ। इस हालत में सर पर सामान लादकर चलने वाले मजदूर और सवारी खींच रहे रिक्शाचालक बेदम हो रहे थे। सड़क के दोनों ओर कुछ-कुछ दूरी पर सुरक्षाकर्मी खड़े थे। वे लोग भी गर्मी से परेशान। सिरकीवालान में एक दुकानदार कमलकांत शर्मा अपनी दुकान से बाहर झांक रहे थे। हम दोनों की नजरें मिलीं तो मेरे कदम रुक गए। उन्होंने पीने के लिए पानी दिया। पानी पीते-पीते उनसे कुछ बातें भी हुईं। इतनी पुलिस क्यों है, यह पूछने पर कहने लगे, ''इस व्यस्त बाजार में पुलिस का पहरा कई दिनों से है। समझ नहीं आता कि छोटी-छोटी बातों पर लोग बड़े-बड़े कुकर्म क्यों कर रहे हैं? इससे करोड़ों रुपए का नुकसान होता है।''
उनका इशारा 30 जून की रात को इस इलाके के लालकुआं क्षेत्र में हुई घटना की ओर था। उल्लेखनीय है कि उस रात पार्किंग को लेकर एक हिंदू और मुसलमान के बीच झगड़ा हुआ था। बाद में मुसलमानों की एक उग्र भीड़ ने स्थानीय दुर्गा मंदिर पर हमला करके देव प्रतिमाओं को खंडित कर दिया। तभी से वहां पुलिसकर्मी तैनात हैं। इस मामले में कुछ लोग बंद हैं।
हालांकि अब मंदिर में पुन: देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी गई है, लेकिन इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उनमें एक प्रमुख सवाल है कि छोटी-सी बात पर मंदिर पर हमला क्यों किया गया? इसका जवाब दिया नवसंवत् आयोजन समिति, चांदनी चौक के अध्यक्ष सुशील कुमार जैन ने। उन्होंने कहा, ''जिस मंदिर पर हमला हुआ उसके आसपास पहले हिंदुओं की अच्छी संख्या थी। अब पूरा इलाका मुस्लिम-बहुल हो गया है। हिंदुओं की आबादी सिर्फ चार-पांच प्रतिशत रह गई है। उन्हें भी इलाके से भगाने की साजिश चल रही है। उसी साजिश के तहत मंदिर पर हमला किया गया, ताकि हिंदू दहशत में आ जाएं और वहां से मकान-दुकान बेचकर भाग जाएं।''
उनकी बातोें से यह तो स्पष्ट हुआ कि इस इलाके में हिंदुओं की आबादी कम क्यों हो रही है? लेकिन इसके अलावा भी कुछ अन्य कारण भी हैं, जिनकी वजह से हिंदू वहां से बाहर निकल रहे हैं। एक कारण कमलकांत शर्मा ने ही बताया। वे कहते हैं, ''मैं 60 वर्ष का हूं। मेरा जन्म इसी इलाके में हुआ, यहीं पला-बढ़ा। पर अब मैं यहां अपने बच्चों को नहीं रखना चाहता। इसलिए नोएडा में रहता हूं। केवल व्यापार के लिए आता हूं और शाम को नोएडा वापस लौट जाता हूं।'' बच्चों को यहां क्यों नहीं रखना चाहते? इस सवाल पर कमलकांत कहते हैं, ''यह इलाका संकरा है। आमतौर पर लोगों के घर भी छोटे-छोटे हैं। परिवार बढ़ने पर उन घरों में अच्छी तरह नहीं रहा जा सकता। इसलिए लोग बाहर निकल जाते हैं।'' उन्होंने यह भी कहा, ''यहां का माहौल भी कुछ ऐसा हो गया है कि लोग (हिंदू) अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं।'' यही कारण है कि इस इलाके से हिंदू निकल रहे हैं और उनकी जगह मुसलमान बस रहे हैं। इस कारण लालकुआं इलाके में ज्यादातर गलियां मुस्लिम-बहुल हो गई हैं। ज्यादातर दुकानदार हिंदू हैं, पर वहां रहने वालों में 95 प्रतिशत मुसलमान हैं। ऐसी ही स्थिति चितली कबर, ईदगाह, चितला गेट, सूईवालान, बल्लीमारान, पायवालान, दरियागंज आदि जगहों की हो गई है। इतिहास साक्षी है कि जब कोई इलाका मुस्लिम-बहुल हो जाता है तो वहां गैर-मुस्लिमों का रहना दूभर कर दिया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश गुप्ता कहते हैं, ''हिंदुओं को परेशान करने के लिए उनके घरों के बाहर ही बकरे-मुर्गे काटे जाते हैं और मंदिरों को भी अपवित्र करने की कोशिश होती है। विरोध करने पर उन्मादियों की भीड़ हिंदुओं पर टूट पड़ती है और यही उस दिन भी हुआ।'' इन इलाकों में हिंदुओं की जनसंख्या कम होने से सुशील कुमार जैन बहुत चितिंत हैं। वे कहते हैं, ''यदि हिंदुओं के पलायन की यही स्थिति रही तो आने वाले समय में दिल्ली-6 और दिल्ली-2 पूरी तरह मुस्लिम-बहुल हो जाएंगे।'' वे यह भी कहते हैं कि पारिवारिक, सामाजिक और विषम स्थिति के कारण भी इन इलाकों से हिंदू जा रहे हैं। हिंदुओं के पलायन का एक और मुख्य कारण उन्होंने बताया कि इन इलाकों में भवन निर्माण करने वाले (बिल्डर लॉबी) कई गुट सक्रिय हैं। इन लोगों को राजनीतिक संरक्षण भी मिला हुआ है। ये लोग बाजार भाव से ज्यादा कीमत पर घर-मकान खरीद कर व्यावसायिक केंद्र बना रहे हैं। चूंकि हिंदुओं के लिए स्थितियां ठीक नहीं रह गई हैं इसलिए वही लोग मकान बेच रहे हैं और खरीदने वाले मुसलमान होते हैं।
किताब-कॉपी के बाजार के लिए दुनियाभर में मशहूर नई सड़क की भी स्थितियां बदल गई हैं। अब यहां केवल दिन में रौनक रहती है, जब बाजार खुला रहता है। रात में पूरी तरह सन्नाटा रहने लगा है। यहां बहुमंजिली इमारतें हैं। पहले लोग यहीं रहते थे और कारोबार भी यहीं करते थे। इनमें ज्यादातर हिंदू थे, लेकिन अब लोग यहां नहीं रहते हैं। सुबह बाजार के समय आते हैं और शाम को चले जाते हैं। इसका फायदा आसपास में रहने वाले मुसलमान उठा रहे हैं। इस इलाके में भी मुसलमानों की घुसपैठ हो चुकी है। नई सड़क पर बरसों से रह रहे संदीप बुमराह ने बताया, ''यहां पहले एक-एक मकान में 90-90 लोग रहते थे, जिनमें वहां काम करने वाले लोग भी शामिल होते थे। अब पूरे इलाके में 90 लोग भी नहीं रहते हैं। दिन में चलने की जगह नहीं होती है और रात में पूरी सड़क पर कोई भी नहीं मिलता। केवल शरारती तत्व मिलते हैं, जो हर प्रकार के गलत कार्य करते हैं। आने वाले समय में यही तत्व इस बाजार पर भी कब्जा कर सकते हैं।''
रामद्वारा(कटरा नील), हनुमान मंदिर (रंगमहल), हनुमान मंदिर(नाई बाड़ा), हनुमान मंदिर(नई बस्ती, नया बाजार) जैसे मंदिर अब नहीं रहे। लालकुआं के फराशखाने में पहले बहुत ज्यादा मंदिर थे। अब वहां चार-पांच मंदिर ही बचे हैं। इन पर भी भूमाफिया की नजर है। खारी बावली के कटरा मेदगिरान स्थित श्रीराम मंदिर के पुजारी योगेश कहते हैं,''यह मंदिर 100 साल पुराना है। इस पर यहां के भूमाफिया की नजर गड़ी हुई है। इसे बचाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है।'' खारी बावली के पूर्व निवासी और समाजसेवी शुभेश शर्मन इन इलाकों में हिंदुओं की घटती संख्या को खतरनाक बताते हैं। वे कहते हैं, ''पूरे इलाके की हर गली में कई-कई मंदिर थे। व्यवसायीकरण से गलियां तंग हो गईं और इस कारण हिंदू दूसरी जगह रहने लगे। उनकी जगह मुसलमान आ गए। जब हिंदू ही नहीं रहे तो मंदिरों की आय कम हो गई। इस कारण इनकी देखरेख भी ठीक से नहीं हो पाती है। अब उन मंदिरों पर भूमाफिया का कब्जा है।'' वहीं कुछ लोग मानते हैं कि स्थितियां बदल सकती हैं। ऐसे लोगों में अमन कमेटी, लालकुआं के मुख्य सचिव ताराचंद सक्सेना उर्फ बिट्टू एक हैं। वे कहते हैं, ''हिंदू धैर्य रखें और अपनी संपत्ति बेचने से पहले सोचें कि वे कुछ गलती तो नहीं करने जा रहे हैं। यह सोच ही स्थिति बदल सकती है।'' हिंदुओं से बात करने पर एक निष्कर्ष निकलता है कि वहां हिंदू अपने साथ हो रहे अन्याय का विरोध करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। जब तक वे विपरीत स्थितियों को सहन कर सकते हैं तब तक वे वहां हैं, अन्यथा पुरानी दिल्ली से हिंदुओं का रिश्ता इतिहास बन सकता है।