''भारत के एकीकरण में संस्कृत की अग्रणी भूमिका है''
   दिनांक 29-जुलाई-2019


दीप प्रज्जवलित कर समारोह का शुभारंभ करते केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन
गत दिनों नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में संस्कृत भारती ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें लोकसभा के उन सांसदों का सम्मान किया गया, जिन्होंने संस्कृत में संसद की सदस्यता की शपथ ली थी। इस अवसर पर संस्कृत भारती के राष्ट्रीय महासचिव श्री दिनेश कामत ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर चाहते थे कि संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाया जाय। संस्कृत भाषा को 'ब्राह्मणों' से जोड़कर देखा जाता है और उन्हें इसका प्रचार नहीं करना चाहिए, के प्रश्न पर डॉ. आंबेडकर ने अपने अनुयायियों से कहा था कि महान कवि व्यास, वाल्मीकि और कालिदास आदि भी ब्राह्मण नहीं थे, जिन्होंने संस्कृत के सर्वमान्य महान ग्रंथों की रचना की थी। भारत के एकीकरण और सांस्कृतिक विकास में संस्कृत की भूमिका अग्रणी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में संस्कृत भारती के देशभर में 585 केंद्र हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद 37 सांसदों ने संस्कृत में शपथ ली थी और 2019 में यह संख्या बढ़कर 47 हो गई। वर्तमान में न केवल भारत के सांसदों ने संस्कृत में दिलचस्पी दिखाई है, बल्कि चीन सहित 40 देशों और विश्व में 254 विश्वविद्यालयों में संस्कृत का अध्ययन और इस पर शोध किया जा रहा है। समारोह में संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. भक्त वत्सल विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस मौके पर सर्वश्री दिलीप घोष, पुष्पेंद्र सिंह चंदेल, छतर सिंह, पर्वत पटेल, प्रो. रमेश पांडेय, सुनीता दुग्गल, गिरीश बापट, सुनील मेढ़े, सुदांत मजूमदार, डॉ. श्रेयांश द्विवेदी सहित कई विशिष्टजन को संस्कृत सम्मान से सम्मानित किया गया।