''बंगाल में लड़ी जा रही सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई''
   दिनांक 30-जुलाई-2019

लोकतंत्र में हिंसा का न तो कोई स्थान हो सकता है और न ही कोई उसका समर्थन कर सकता है
पुस्तक का विमोचन करते (बाएं से) सर्वश्री हितेश शंकर, गौतम लाहिड़ी,प्रमोद मजूमदार,कंचन गुप्ता, प्रभात कुमार, दिलीप घोष,मनोज वर्मा,राकेश आर्य एवं हर्षवर्धन त्रिपाठी
 
गत 19 जुलाई को नई दिल्ली स्थित नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय में नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) और प्रभात प्रकाशन द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित शोध पुस्तक 'ब्लीडिंग बंगाल' का विमोचन किया गया। पुस्तक मई 2019 से अब तक राज्य में हुई राजनीतिक हिंसा की घटनाओं का तथ्यात्मक ब्यौरा सामने रखती है। इसमें हिंसा के शिकार सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं, पत्रकार एवं आम नागरिकों का जहां विवरण शामिल है वहीं राज्य मेंं राजनीतिक तथा प्रशासन के गिरते स्तर को ठोस घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। 
पुस्तक के विमोचन के अवसर पर मुख्य रूप से उपस्थित थे पश्चिम बंगाल,भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष एवं सांसद श्री दिलीप घोष। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कला, साहित्य, दर्शन, संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम की चेतना वाले राज्य को अफगानिस्तान में तब्दील कर दिया है, जहां समाज को राजनीतिक कबीलों में बांट कर खूनी खेल खेला जा रहा है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ी जा रही है। ममता बनर्जी कहा करती थीं कि वह दार्जिलिंग को स्विट्जरलैंड, दीघा को गोवा और कोलकाता को लंदन बना देंगी, लेकिन आज हालत यह है कि उन्होंने बंगाल को अफगानिस्तान बना दिया है। राज्य में फिल्म कलाकार, डॉक्टर, वकील, पत्रकार सभी राज्य की सत्ता से भयभीत हैं और उससे घृणा करने लगे हैं। विरोधी विचारधारा की हत्या एवं उत्पीड़न को जायज ठहराया जाता है। उन्होंने कहा कि देश के अनेक राज्यों में राजनीतिक हिंसा का इतिहास रहा है। यह हिंसा चुनावों के लिये होती रही है। मगर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विचारधारा के लिए हत्याएं हो रहीं हैं। राज्य में सामाजिक जात-पात नहीं है लेकिन राजनीतिक दलों से प्रतिबद्धताओं के हिसाब से समाज में भी ध्रुवीकरण हो गया है। विरोधी विचारधारा की हत्या एवं उत्पीड़न को जायज ठहराया जाता है। हालत यह है कि वामपंथी शासन में शुरू हुई इस बुराई के खिलाफ जीत कर सत्ता में आईं ममता बनर्जी भी इसी राह पर चलने लगी हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने कहा कि देश में फासीवाद का कोई खतरा है तो पश्चिम बंगाल में है। उन्होंने अफसोस जताया कि बंगाल में अधिकांश मीडिया बिना कहे ही सरकार के आगे समर्पण कर गया है और सत्तारूढ़ दल की गलतियों को छापा नहीं जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी ने कहा कि राजनतिक हिंसा के चलते बंगाल की जो छवि बन रही है, उसे देख कर, सुन कर शर्म आती है। लोकतंत्र में हिंसा का न तो कोई स्थान हो सकता है और न ही कोई उसका समर्थन कर सकता है। एनयूजेआई के राष्ट्रीय महासचिव मनोज वर्मा ने कहा कि मीडिया समाज का आईना है और यदि किसी राज्य में लगातार राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, उसे देखकर मीडिया मूक दर्शक नहीं बना रह सकता। एनयूजेआई के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राकेश आर्य ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा और मीडिया की भूमिका पर अपनी बात रखी। इस अवसर पर राज्यसभा टीवी के मुख्य संपादक राहुल महाजन, लोकसभा टीवी के संपादक श्याम सहाय, पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर,वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार, संध्या जैन, अजय सेतिया, राम नारायण श्रीवास्तव, प्रमोद मजूमदार, योजना गोसाई, अनिल पांडे, अतुल गंगवार, पारिजात कौल, अनुराग पुनेठा सहित अनेक पत्रकार उपस्थित थे।