पश्चिमबंगाल: ममता का रक्त-पथ
   दिनांक 30-जुलाई-2019
पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन का अंत जरूर हुआ, लेकिन सत्ता में आईं ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने उसी हिंसक परंपरा को आगे बढ़ाया जो वामपंथियों द्वारा सत्ता पाने के लिए उनका मुख्य हथियार रही थी। विरोधी विचारधारा के कार्यकर्ताओं के प्रति हिंसा के रास्ते तृणमूल ने राज्य की राजनीति का चरित्र निर्दोष कार्यकर्ताओं के रक्त से सराबोर कर दिया है
 पुरुलिया में त्रिलोचन महतो की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वह भाजपा का कार्यकर्ता था। (प्रकोष्ठ में) वह पत्र जिसमें हत्यारे ने लिखा कि वह पंचायत चुनाव के समय से ही महतो की हत्या करने की कोशिश में था।
हाल के कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल से सियासत का ऐसा वीभत्स चेहरा सामने आया है, जिसकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप उठती है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सत्ता के लिए किसी का भी खून बहाने के लिए तैयार तृणमूल के गुंडे बेखौफ होकर अपने काम को अंजाम देते हैं, लेकिन मजाल कि कोई चूं तक कर जाए! कई बार ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल में शासन-प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। इसकी बानगी समय-समय पर दिखाई भी दी है। मौजूदा समय में राज्य में वैचारिक विरोध का हाल यह है कि जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोबारा ताजपोशी का जश्न मना रहा था तो बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रताडि़त किया जा रहा था, उनकी हत्या की जा रही थी। वर्धमान के केतुग्राम में भाजपा कार्यकर्ता सुशील मंडल की तृणमूल के गुंडों ने महज इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह मोदी सरकार बनने की खुशी में जगह-जगह पार्टी के झंडे लगा रहा था। अराजक तत्वों ने इसका विरोध किया तो सुशील मंडल ने 'जय श्रीराम' का उद्घोष करते हुए उनकी बात को अनसुना किया। अतंत: बात बढ़ने पर हत्यारों ने चाकू से हमला करके सुशील की नृशंस हत्या कर दी। ममता बनर्जी के प्रशासन ने राजनीतिक हत्या को आपसी झगड़े और रंजिश में बदलने के भरपूर प्रयास किए। 'लुटियन मीडिया' ने भी पूरी जोर अजमाइश की मामले को दबाने के लिए, लेकिन सोशल मीडिया की सजगता के चलते सच सामने आ ही गया। राज्य की यह अकेली घटना नहीं है। सैकड़ों घटनाएं हैं, जहां बेकसूर कार्यकर्ताओं को फांसी पर लटका दिया गया, उनके घरों को आग लगा दी गई, चाकू से गोद कर हत्या कर दी गई। ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या स्वस्थ राजनीति में विचार अलग नहीं हो सकते? क्यों राज्य में जय श्रीराम का नाम लेने भर से खून बहने लगता है? एक दल विशेष के ही कार्यकर्ताओं पर क्यों हिंसा ढहाई जाती है, उनका कत्ल क्यों किया जाता है?
घटनाएं जो भुलाए नहीं भूलतीं
ल्ल बीती 30 मई को पुरुलिया जिले में 18 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो का शव पेड़ से लटकता पाया गया। महतो की पीठ पर एक पोस्टर चिपका मिला था, जिस पर लिखा था कि पंचायत चुनाव में भाजपा का समर्थन करने के कारण उसकी हत्या की गई है। यह वह समय था जब पंचायत चुनाव समाप्त हो चुके थे। इसी तरह 2 जून को भी पुरुलिया में ही एक अन्य भाजपा कार्यकर्ता दुलार का शव बिजली के खंभे से लटकता पाया गया। इस हत्या के पीछे भी राजनीतिक संघर्ष ही था।
ल्ल जून के अंतिम सप्ताह में राज्य के झाड़ग्राम में भाजपा कार्यकर्ता खगापति महतो जब भाजपा के एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे तो तृणमूल के अराजक तत्वों ने महतो को घेरकर उनके साथ अभद्रता की। नशे की हालत में अराजक तत्वों के झुंड ने बात बढ़ने पर महतो के सीने में गोली उतार दी। सूचना मिलने पर भाजपा कार्यकर्ता उन्हें कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल ले गए, लेकिन अधिक खून बहने के कारण उनकी मौत हो गई।
24 मई को नदिया जिले के चकदाहा कस्बे में भाजपा के 23 वर्षीय कार्यकर्ता संतु घोष की गोली मारकर हत्या कर दी गई। राजनीतिक संघर्ष की भेंट चढ़े संतु घोष की हत्या तृणमूल के हत्यारों ने उस समय की जब वह अपने घर के बाहर किसी से फोन पर बात कर रहे थे। पहले से ताक लगाए हत्यारों ने मौका भांपते हुए अपने काम को अंजाम दिया और पास आकर उनके सीने में गोली उतार दी। जब तक संतु को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया तब तक उन्होंने दम तोड़ दिया। स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने घटना के पीछे तृणमूल का स्पष्ट हाथ बताया और कहा कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव के चलते संतु की हत्या की गई।
लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद भी राज्य में हिंसा खत्म नहीं हुई। इसी का परिणाम है कि 8 जून की शाम को 24 परगना में तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई। बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र के संदेशखली इलाके में भाजपा का झंडा खोलने को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते गहराता चला गया और जो लड़ाई हाथापाई से शुरू हुई थी वह रणक्षेत्र मे तब्दील हो गई। इस दौरान तृणमूल के हत्यारों ने भाजपा कार्यकर्ता सुकांत मंडल, प्रदीप मंडल और तपन मंडल की गोली मारकर हत्या कर दी।
ल्ल जून के दूसरे सप्ताह में उत्तर 24 परगना जिले के हस्नाबाद इलाके के तोकीपुर गांव में भारतीय जनता पार्टी की महिला कार्यकर्ता सरस्वती दास की तृणमूल के गुंडों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पार्टी की सक्रिय कार्यकर्ता सरस्वती को तृणमूल की ओर से आए दिन धमकियां मिल रही थीं और उन्हें भाजपा के साथ काम न करने के लिए कहा जा रहा था। लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज किया। इससे बौखलाए गुंडों ने एक दिन घर में घुसकर उन पर अंधाधुंध गोलियों से हमला किया। उन्हें 9 गोलियां मारीं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
मई के पहले सप्ताह में पुरुलिया के बगमंुडी विधानसभा क्षेत्र में सिकराबंद पंचायत के सोनाबाना गांव के निवासी 22 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता शिशुपाल सहिश की ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) के गुंडों ने निर्मम हत्या करके शव को पेड़ पर लटका दिया। दरअसल शिशुपाल भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता थे और उनके पिता भी पार्टी के ग्राम पंचायत सदस्य हैं।
दरअसल, रक्त रंजित बंगाल की सियासत का यह वह अक्स है, जो दशकों से उसके साथ चला आ रहा है। पार्टी बदली लेकिन रवायत वही रही। वामपंथी शासन का अंत जरूर हुआ लेकिन एआईटीसी ने उसी की कार्यप्रणाली को अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने का जरिया बनाया। यानी वैचारिक विरोधियों को हिंसा के जरिए हटा देना। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में तृणमूल की सियासी हिंसा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है।
आंकड़ों की मानें तो पांच दशक के दौरान बंगाल की राजनीतिक हिंसा में हजारों लोग जान गंवा चुके हैं। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में राज्य में हुई राजनीतिक हिंसा और हत्याओं का आंकड़ा भी किसी को भी विचलित करने पर मजबूर कर देता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार साल 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। 2015 में कुल 131 घटनाएं दर्ज की गई थीं और 184 लोग इसके शिकार हुए थे। साल, 2013 में 26 लोगों की हत्या हुईं, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। यकीनन ये आंकड़े राजनीतिक हिंसा की भयावह तस्वीर पेश करते हैं।
हिंसा की भेंट चढ़े चुनाव
हाल के कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में कोई भी ऐसा चुनाव नहीं गया, जिसमें हिंसा, हत्या, आगजनी न हुई हो। जहां पंचायत चुनाव में भाजपा के सैकड़ों उम्मीदवारों को नामांकन तक भरने नहीं दिया गया, जिसने भरा उसे मारा, हत्या की। तो वहीं लोकसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही कुछ नजारा दिखाई दिया। राज्य में स्थान-स्थान पर हत्या, आगजनी, हमले के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक के रोड शो पर हमला और आगजनी की गई। बहरहाल, कुछ रपटों की मानें तो राज्य में कुछ सालों के दौरान राजनीतिक संघर्ष के चलते भाजपा के 80 कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन सारे सबूतों, गवाहों को नकारती, झुठलाती रही हैं। पर सत्य सत्य होता है, जो छिपता नहीं। *